देश में लगे लॉकडाउन के कारम कामगार काम-धंधा छोड़कर पैदल घरों को लौटने पर विवश हुए
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लोक कल्याण बनाम राजनीतिक रेवड़ी
25 मार्च 2020 को जब देश में लॉकडाउन लगा, तो मजदूर रोजी-रोटी के लिए तबाह हो गए। पलायन हुआ। कामगार काम-धंधा छोड़कर पैदल घरों को लौटने पर विवश हुए। तब से अभी तक जमीनी स्तर पर हालात बहुत हद तक बदले नहीं हैं। हां, आर्थिक गतिविधियां चालू हो गई हैं। अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगी है।
ब्रिटेन को पछाड़ कर देश पांचवीं अर्थव्यवस्था के साथ-साथ तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। अग्रिम कर (एडवांस टैक्स) में वृद्धि हुई है, लेकिन महंगाई अब भी बेलगाम है। गांवों, कस्बों, छोटे शहरों में रोजगार का संकट पहले की तरह बरकरार है।
केंद्र सरकार ने रसोई गैस की सब्सिडी पूरी तरह से बंद कर दी है। ऐसे में यदि सरकार की आमदनी में इजाफा हुआ है और अर्थव्यवस्था संतोषजनक पटरी पर है, तो गरीबों को मिलनेवाली सहूलियतों पर सवाल उठाया जाना कहां से बाजिब है।
कल्याणकारी राष्ट्र का मतलब है कि देश को अपने नागरिकों के आर्थिक-सामाजिक हितों की रक्षा करना। कोरोना काल में मुफ्त वैक्सीन देकर मोदी सरकार ने लोककल्याण की दिशा में बड़ा कदम उठाया था। अब जब मोदी कैबिनेट ने लॉकडाउन के बाद सातवीं बार मुफ्त राशन की पीएम गरीब कल्याण योजना को अगले 3 महीने के लिए विस्तार दिया है, तो यह निश्चित तौर पर स्वागत योग्य कदम है।
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