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नेहरू बनाम मोदी और चीन-6: नेहरू से लेकर अब तक सरकारों की नीतियों में चीन के प्रति आखिर क्या बदला?

सार

  • चीन से यूपीए सरकार की दोस्ती किसी से छुपी नहीं थी।
  • चीन में यूं अचानक मोदी के आ जाने से भारत के राजदूत भी हक्का-बक्का रह गए।
  • मोदी ने चीन की विस्तारवादी नीतियों के प्रति चिंता जताते हुए आरोप लगाया था कि यूपीए ने चीन को भारतीय भूभाग में घुसपैठ और कब्जा करने दिया।
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क्या मोदी सरकार चीन का सही आंकलन नहीं कर पाई? - फोटो : social media
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विस्तार
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प्रधानमंत्री चाऊएन के प्रेम में नेहरू बहुत आगे निकल गए थे। मौजूदा घटनाक्रम के बीच क्या यह कहा जाए की मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के रिश्ते निभाने में उससे भी आगे निकल गए? मोदी सरकार ने, यूपीए-2 के चीन प्रेम को पंख दे दिए और ड्रैगन (पंख वाला अजगर) जैसे हवा में उड़ने लगा?

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21वीं सदी की शुरुआत का वक्त कूटनीति की नई इबारत लिखने का वक्त था। विदेश नीति को फिर से लिखे जाने का समय था। दुनिया बदल रही थी। सोवियत रूस खत्म हो चुका था उसकी जगह चीन एक नए लाल सितारे के रूप में दुनिया के आसमान में चमक रहा था।

दुनिया में दो बड़ी ताकतों अमेरिका और चीन के बीच एक तीसरे ध्रुव की जरूरत थी जो दोनों में संतुलन बना सके। नेहरू की गुट निरपेक्षता की थ्योरी पहले ही फेल हो चुकी थी। रूस और अमेरिका के बीच अपना संतुलन बनाने में हमने बहुत कुछ खोया जबकि चीन इसमें उलझने के बजाए अपने आपको आर्थिक रूप से मजबूत बनाता चला गया।
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मोदी से पहले दिल्ली में दस साल तक मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार थी। चीन से यूपीए सरकार की दोस्ती किसी से छुपी नहीं थी। चीन से कांग्रेस और सरकार के बेहतरीन रिश्ते थे। जैसा कि अभी पिछले महीने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने 'खुलासा' किया कि 2005-06 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से 3 लाख डॉलर मिले थे।

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एक मुख्यमंत्री के रूप में यह सोच गलत नहीं कही जा सकती थी...

गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी चीन आने-जाने लगे- फाइल फोटो - फोटो : social media
फांउडेशन की सालाना रिपोर्ट में बाकायदा ये दर्ज है। 2005-06 की सालाना रिपोर्ट में फाउंडेशन को डोनेशन देने वालों की लिस्ट में चीन का भी नाम है। जब चीनी सेना आपकी सीमा पर कब्जा किए बैठी हो और आप सरकार पर सवाल उठा रहे हों तब कोई कागज दिखा दे कि आप जब सरकार में थे तो ऐसे दुश्मन देश से निजी फायदा उठा रहे थे।

एक ऐसा फाउंडेशन जिसकी चेयरपर्सन सोनिया गांधी हों। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम उसके ट्रस्टी हैं। लेकिन कांग्रेस ने डंके की चोट पर माना इसमें चोरी कैसी? फाउंडेशन ने चीन से चंदा लिया। अब लाखों करोड़ों का चंदा कोई देश फ्री में नहीं देता. बदले में सरदार मनमोहन सिंह ने अपने बाजार में चीन के लिए दरवाजे खोल दिए।

आयात की शर्तें और आसान कर दीं और देखते देखते भारत का बाजार चीनी माल से पटने लगा। इसमें कोई शक नहीं कि नरेन्द्र मोदी एक विजनरी मुख्यमंत्री थे। चीन जितनी रफ्तार से प्रगति कर रहा है ये उनकी नजरों से छुपा नहीं था। गुजरात का मुख्यमंत्री रहते उन्हें महसूस हुआ कि चीन से दोस्ती करके वह गुजरात में विकास की गति को और रफ्तार दे सकते हैं।

एक मुख्यमंत्री के रूप में यह सोच गलत नहीं कही जा सकती थी। सो गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी चीन आने-जाने लगे। एक बार तो मोदी हांगकांग होते हुए चीन जा पहुंचे। मोदी सीधे बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास पहुंच गए। और जैसा कि चौंकाने वाला उनका अंदाज है, वहां के राजनयिकों और कर्मचारियों से वे व्यक्तिगत रूप से मिले।

चीन में यूं अचानक मोदी के आ जाने से भारत के राजदूत भी हक्का-बक्का रह गए। जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे और चार बार चीन के दौरे पर आए थे और अपने राज्य के लिए मिलियनों डॉलर के निवेश करवाने में सफल रहे। और मुझे याद आता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने यूपीए की चीन नीति का माखौल उड़ाया था।

मोदी ने चीन की विस्तारवादी नीतियों के प्रति चिंता जताते हुए आरोप लगाया था कि यूपीए ने चीन को भारतीय भूभाग में घुसपैठ और कब्जा करने दिया। तब मोदी और उनके सिपाहसलार अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि मोदी प्रधानमंत्री बने तो चीन भारत का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा। जबकि ऐसा नहीं हुआ और पूर्वी लद्दाख की सीमा पर हमारे 20 जवान शहीद हो गए।

जारी...


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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