मृणाल सेन की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। मृणाल सेन की पहली रंगीन फिल्म थी ‘मृगया’ और इस फिल्म के नायक के रूप में उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती को चुना। सेन ने मिथुन को उनके बेझिझक व्यवहार के लिए चुना। सेन ने मिथुन को पुणे फिल्म संस्थान के ग्रेजुएशन समारोह के अवसर पर देखा था।
उस समय उन्हें मिथुन का बेझिझक व्यवहार जंचा नहीं था मगर जब वे ‘मृगया’ (1976) बनाने चले तो उन्हें वही लंबे बाल वाला 1973 बैच का सांवला लड़का याद आया और उन्होंने अपने काबिल सिनेमाटोग्राफर के. के. महाजन की सहायता से उससे संपर्क किया और उसे फिल्म में मुख्य भूमिका दी। सेन की पारखी नजर और निर्देशन तथा मिथुन के अभिनय का कमाल था, मिथुन को सर्वोत्तम अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। जबकि यह उनकी पहली फिल्म थी।
जल्द ही मिथुन चक्रवर्ती युवाओं के क्रेज बन गए। 1982 में आई फिल्म ‘डिस्को डॉन्सर’ ने हिन्दी सिनेमा को एक नई दिशा दे दी। सिनेमा का समाज खासकर युवा पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। इस फिल्म ने गली-गली में डिस्को डॉन्सर पैदा कर दिए। इसी का गान बज रहा था, इसी पर लोग नाच रहे थे। और इसी साल मिथुन ने ‘कसम पैदा करने वाले की’, ‘डॉन्स डॉन्स’, ‘मुद्दा’, ‘दिलवाला’, ‘प्यार झुकता नहीं’ जैसी सफल फिल्में कीं।
उन्होंने ‘स्वर्ग से सुंदर’ जैसी पारिवारिक फिल्में की साथ ही ‘वतन के रखवाले’ जैसी मल्टीस्टारर फिल्में भी की। उनका कहा संवाद, ‘कोई शक?’ लोगों के सिर चढ़ कर बोला। एक समय था लोग उनकी फिल्म अनदेखी नहीं कर सकते थे। ‘रात के बारह बजे’, ‘बूमूम लाका लाका’ ने लोगों को पागल कर दिया था ऐरा था मिथुन का आकर्षण।
राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बावजूद कुछ समय मिथुन को ढंग का काम नहीं मिला। एक बार फिर रास्ता खुला ‘हम पांच’, ‘गुरु’, ‘मुजरिम’ आदि ने उन्हें फिर से स्थापित किया। और फिर 1992 में आई बुद्धदेब दासगुप्ता की फिल्म ‘तहादेर कथा’ जिसने मिथुन को सर्वोत्तम अभिनय का और बांग्ला फिल्म को सर्वोत्तम फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया। और छ: साल बाद वी जी अय्यर की फिल्म ‘विवेकानंद’ में रामकृष्ण की सहायक भूमिका के लिए मिथुन चक्रवर्ती को एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। अब तक उन्हें फिल्म के 11 पुरस्कार मिले हैं।
आईएमडीबी की मानें तो मिथुन ने 380 फिल्मों मे अभिनय किया है। ‘शौकीन’, ‘तितली’, ‘पसंद अपनी अपनी’, ‘सितारा’, ‘जाग उठा इंसान’, ‘ताशकंद फाइल्स’, अनाड़ी इज बैक’, काश्मीर फाइल्स’ और पिछले वर्ष आई ‘काबुलीवाला’ आदि फिल्मों में मिथुन चक्रवर्ती ने यादगार भूमिकाएं की हैं।
एक समय था उनकी फिल्म देखने केलिए टिकट खिड़की पर लंबी लाइन लगती थी। वे अब भी सक्रिय हैं। यदि ऐसे अभिनेता, सत्तर साल से ऊपर के मिथुन चक्रवर्ती को दादा साहब फ़ालके पुरस्कार मिलता है तो इतनी हाय-तोबा क्यों? मिथुन चक्रवर्ती को इस सर्वोच्च सम्मान हेतु हार्दिक बधाई!
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