तुरंत मदद पहुंचा रहेे हैं जवान, लेकिन अब संसाधन कम पड़ रहे हैं।
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मसीहा बनकर सामने आई है यूपी पुुुुुलिस
राशन और खाना पहुंचाने के ही नहीं, ऐसे बहुत से उदाहरण है जब यूपी पुलिस के ये कोरोना कमांडो लोगों के लिए मसीहा बनकर आए। किसी की दवा खत्म हो रही थी, तो किसी के पास दवा खरीदने के पैसे भी नहीं थे। एक 65 वर्षीय महिला जो साधन न होने के कारण बैंक से पैसे नहीं निकाल पा रही थी, उसे भी इन कोरोना कमांडोज ने बैंक तक पहुंचाया और वापस उसके घर छोड़ा। जबकि एक व्यक्ति के बड़े भाई की मृत्यु होने पर जब अंतिम संस्कार के लिए सामान नहीं मिल रहा था तो उसने भी कोरोना कमांडोज से ही मदद मांगी और मिली भी। यह तो हुआ पुलिस और प्रशासन का मानवीय चेहरा। पर ऐसे समय में आप क्या कर रहे हैं?
कहीं आप भी उन जाहिल और संवेदनाहीन लोगों में से तो नहीं जो हेल्प लाइन पर फोन करके शाम की दारू का इंतजाम करने को कह रहे हैं! कुछ लोग हर जगह को स्टैंडअप कॉमेडियन का मंच बना देते हैं। इन लोगों का मानसिक दिवालियापन इतना अधिक होता है कि ये टीजिंग यानी छेड़छाड़ और मनोरंजन में फर्क करना ही भूल जाते हैं।
ऐसा ही एक व्यक्ति था रामपुर का। जिसने 112 पर कॉल करके अपने लिए पांच पान बंधवा कर लाने का ऑर्डर दिया। ऐसे भी लोग थे जिन्हें बारिश के साथ समोसे की याद आई और उन्होंने 112 पर कॉल कर दिया। बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू और शराब के लिए फोन करने वालों की गिनती जब लगातार बढ़ने लगी तो टीम का परेशान होना स्वभाविक ही है।
अभी तक इस तरह की कॉल इग्नोर की जा रही थी और टीम के जवान इनसे अपने अंदाज में निपट रहे थे। पर रामपुर के डीएम ने पान बंधवाने वाले के पास पहुंचने की ठानी। वे वहां पहुंचे और उस शख्स को सजा बतौर पूरे मुहल्ले में झाड़ू लगाने को कहा गया। ऐसी ही एक और फर्जी कॉल पर जब पुलिस राशन लेकर घर पहुंची तो देखा कि उस घर में राशन की कोई कमी नहीं थी।
यह देखकर अवाक रह गए जवानों ने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। हालांकि इस वीडियो को बाद में खेद प्रकट करते हुए हटा दिया गया। क्योंकि यह एक-दूसरे को बदनाम करने या मजाक बनाने का समय नहीं है, बल्कि हिम्मत के साथ खड़े होने का समय है।
मजनू का टीला स्थित गुरुद्वारे से निकाले गए 300 लोग
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एक बच्ची की ऐसे बची जान
अभी 1 अप्रैल की ही बात है, जब तीन साल की एक छोटी बच्ची ने खेल-खेल में गलती से विषैला पदार्थ पी लिया। बच्ची के घर में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो लॉकडाउन के माहौल में उसे अस्पताल पहुंचा पाता। तब परिवार ने 112 पर कॉल की। और टीम तुरंत मदद के लिए दौड़ी। खुशकिस्मती से समय रहते बच्ची को मदद मिली जिससे उसकी जान बच सकी। पर कल्पना कीजिए अगर आपके वाहियात और फर्जी कॉल्स से परेशान होकर कोई एक जवान झुंझला कर फोन पटक देता और इस बच्ची का कॉल न ले पाता, तो बच्ची की मौत का जिम्मेदार कौन होता? आपका जरा सा मजाक, एक पूरे सिस्टम को पंगु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता।
बात एक और भी है। हर अनावश्यक कॉल, उन कई आवश्यक कॉल्स का रास्ता रोक देती है, जिन्हें सचमुच मदद की दरकार है। लोग शिकायत करते हैं कि वे बहुत देर से फोन लगा रहे थे मगर फोन लग नहीं रहा था। स्वभाविक है जब तक अनावश्यक कॉल आने बंद नहीं होंगे तब तक जरूरतमंदों के कॉल टीम तक नहीं पहुंच पाएंगे।
टीम के पास अब भी हर रोज 28 हजार के लगभग कॉल आ रहे हैं। जबकि 4500 कॉल ड्रॉप हो रहीं हैं। यानी संसाधन अब भी उतने नहीं हैं, जितनी आवश्यकता है। इसलिए जरूरी है कि उन्हें बचत के साथ इस्तेमाल करें। बीमारी और मुसीबत घर देखकर नहीं आती। मुसीबत का मुकाबला हिम्मत, हौंसले और ईमानदारी से ही किया जा सकता है।
संकट के समय में एक-दूसरे की मदद करें। सिस्टम को टिकटॉक वीडियो समझकर चुटकुला न बना दें। वक्त जैसा भी हो गुजर ही जाता है। बस हमारी स्मृतियों में यह दर्ज होता है कि हमने उस वक्त में हिम्मत से काम लिया या मूर्खतापूर्ण हरकतें कीं।
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