हमेशा याद रखी जाएंगी गालिब की गजलें
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जवानी की दहलीज पर पहुंचे तो दूरदर्शन पर मियां गालिब के किरदार के दर्शन किए। गुलजार के सीरियल में नसीरुद्दीन शाह ने क्या खूब किरदार निभाया था। ऐसा लगता था मानों नसीर में गालिब की रूह समा गई हो। बल्लीमारान की वो गलियां और उनके घरों में लटके पोशीदा टाट के परदे। यकीन मानिए मिर्जा के उस युग को ढूंढने मैंने पुरानी दिल्ली के इलाके के कई चक्कर भी काटे।
गालिब उन घरों-गलियों में तो न मिले, अलबत्ता लोगों के दिलों में पैबस्त जरूर मिले। सीरियल के जरिए ही सही, गालिब की दर्दभरी जिंदगी से रूबरू हुआ तो उसके बाद उनकी शायरी और ज्यादा कीमती लगने लगी। कमसिन उम्र के सात-सात बच्चों को गंवाने वाले गालिब दंपति की त्रासदी, पेंशन के लिए दिल्ली से कलकत्ते तक की भागम-भाग और जिंदगी की तल्ख सच्चाइयों की आंच में पगी वो उम्दा शायरी-
दिल ही तो है, न संगोखिस्त, दर्द से भर न आए क्यों, रोएंगे हम हजार बार कोई हमें सताए क्यों, सुनकर कलेजा कट जाता।
यारों के साथ कभी रात में चकल्लस को बैठा तो भी गालिब का ही सहारा रहा, गो हाथ में जुंबिश नहीं, आंखों में तो दम है, रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।
जब भी कभी अपनी इमेज के बारे में सोचा तो यह शेर जुबां पर आया–
ये मसाइल-ए-तसव्वुफ वो तेरा बयान गालिब, तुझे हम वली समझते जो न वादाखार होता।
अपनी फटेहाली बयां करने के लिए गालिब से बेहतर और क्या होगा-
चिपक रहा है बदन पे लहू से पैराहन हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफू क्या है।
जिंदगी को गमों ने घेरा तो-
कैद-ए-हयात बंद-ए-गम असल में दोनों एक हैं, मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों
ये शेर ढाल बन गए। मन कभी रहस्यवाद और तत्वमीमांसा के बारे में फिक्रमंद हुआ और वेदांत की परिभाषा ढूंढनी चाही तो सोचा अपने मियां गालिब को ही पकड़ते हैं और वो शेर मिल गए जिससे रहस्यवाद और वेदांत की परिभाषा गढ़ी जा सकती है।
उग रहा है दर-ओ-दीवार पर सब्ज गालिब, हम बियाबां में हैं और घर में बहार आई है
और न था कुछ तो खुदा था, न होता तो खुदा होता, डुबोया मुझको होने ने, न होता गर तो क्या होता।
संतानों के एक-एक कर मरने का सदमा सहता, सियासी वजहों से अंग्रेजों से पेंशन के लिए संघर्ष करता यह शायर कितना जीवट भरा और जिंदादिल था उसका अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है। हुआ यूं कि एक बार गालिब को पेंशन की कई बकाया किस्तें एक साथ मिल गईं। सारे पैसों की वह शराब खरीद कर लाए।
जब उनसे पूछा गया कि वे खाएंगे क्या तो उन्होंने अपने अलबेले अंदाज में जवाब दिया-खुदा ने जब उन्हें जमीं पर भेजा है तो उन्हें खिलाने की जिम्मेदारी भी उसी की है। लेकिन चूंकि शराब की जिम्मेदारी खुदा ने नहीं ली है लिहाजा यह इंतजाम उन्होंने खुद किया।
यह अजीम शायर अपनी फटेहाली और बदहाली को भी किस कदर तंजिया अंदाज में ढालता है उसकी बानगी देखिए-
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।।
मिर्जा गालिब के शेरों की अनगिनत पैरोडियां गढ़ी गईं। इसी से पता चलता है कि गालिब कितने मकबूल हैं और उनका आम जीवन में कितना असर है। लोग अमरत्व की कल्पना करते हैं, गालिब ने अपनी शायरी के जरिए यह काम करके दिखाया है। मीर, दाग, मोमिन, बहादुर शाह जफर के जैसे शायरों के दौर में गालिब ने अपने लिए अलग राह बनाई तो उसकी वजह भी थी।
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