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कोरोना संकट और मजदूरों का पलायन: आखिर हिंदी पट्टी के राज्य क्यों नहीं दे पाए अपने ही लोगों को रोजगार?

सार

  • एक समय पूरब का मेनचेस्टर कहे जाने वाला कानपूर शहर समय के साथ अपनी चमक खोता गया।
  • भारत के यह राज्य धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से संपन्न हैं।
  • जातिगत दंभ एवं भेदभाव ने भी पलायन में एक अहम भूमिका निभाई है।
  • इन राज्यों की सरकारें भी अब स्थानीय स्तर पर रोजगार दिलाने के लिए प्रयासरत हैं।
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हिंदी भाषी राज्यों में भारी संख्या में पलायन होता है! - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कोरोना महामारी के इस दौर में सारा देश एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। देशभर में लोग भय के इस माहौल में तमाम परेशानियों का सामना कर रहे हैं, लेकिन देश के हिंदी भाषी राज्यों खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में हालात और भी ज्यादा भयावह हैंं। इन राज्यों के लाखों लोग देश के विभिन्न हिस्सों में मजदूरी या छोटी नौकरियां करते हैं।

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कोरोना के कारण हुए आर्थिक मंदी और लॉकडाउन ने उनके सामने गभीर संकट खड़ा कर दिया है। हजारों लाखों की संख्या में मजदूर बेरोजगार हैंं और इन के सामने अपने और परिवार के भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। ऐसी स्थिति में हजारों मजदूरों ने पैदल ही शहरों से अपने अपने गांवों को लौटना शुरू कर दिया और ह्रदय को विचलित कर देते वाली तस्वीरें देखी गई हैं।

केंद्रीय और राज्य सरकार भी उन्हें वापस अपने घरों तक लाने का प्रयास कर रही है, लेकिन सवाल ये उठता है कि इन हिंदी भाषी राज्यों से इंतनी भारी संख्या में पलायन क्यूं होता है? इस सब के लिए कौन जिम्मेदार है? आखिर क्यूं हिंदी भाषी राज्यों के नागरिक ही पलायन के दंश को झेलने के लिए अभिशप्त क्यूं है?
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क्या सिर्फ इन प्रदेशों की सरकारें इस के लिए जिम्मेदार है या फिर समाज भी इनका दोषी है? अगर गहनता से देखेंगे तब पाते है की हिंदी भाषी राज्यों में पलायन एक सतत, लंबी और जटिल प्रक्रिया रही है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य के नागरिकों की जिम्मेदारी सरकार की होती है। हिंदी भाषी राज्यों में भारी संख्या में हुए पलायन के लिए निश्चित तौर पर यहां की सरकारें वो भी विशेष रूप से पूर्ववर्ती सरकारें जिम्मेदार रही हैं। इन राज्यों की सरकारें उद्योगों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, माहौल और निवेश जुटाने में विफल रहीं।

एक समय पूरब का मेनचेस्टर कहे जाने वाला कानपुुर शहर समय के साथ अपनी चमक खोता गया और कालांतर का औद्योगिक शहर वर्तमान में एक कोचिंग हब बन कर रह गया है।

इन राज्यों की सरकारें व्यापार और उद्योगों के लिए आवश्यक कानून व्यवस्था को बनाने में विफल रहे। 70-80 के दशक में यहां अपराध अपने चरम पर था और फिरौती और अपहरण एक रोजगार बन कर रह गए थे।

नतीजतन व्यापारी और उद्योगपति समाज ने इन राज्यों से अपना काम समेत कर अन्य राज्यों को अपना ठिकाना बनाया।

पलायन का दूसरा महत्वपूर्ण कारण समाज का खेती से विमुख होना भी रहा है। यह राज्य अपनी उपजाऊ मिट्टी और प्रचुर जल संसाधन के लिए जाने जाते हैं लेकिन फिर भी खेती करना यहां घाटे का सौदा बना रहा।
 

अगर इस दिशा में गंभीरता से कार्य किया जाता तब न सिर्फ राज्यों के अलग-अलग हिस्सों का विकास होता बल्कि....

लोग खेती से विमुख हुए और शहरों की तरफ रुख किया - फोटो : pixabay
जहां पंजाब, हरियाणा और पहाड़ी राज्यों ने नकदी खेती और महाराष्ट्र और गुजरात ने सहकारी समितियों के सहारे अपने खेती को मजबूती दी। वहीं हिंदी भाषी राज्यों की सरकारों ने इस दिशा में उदाशीन रुख ही अपनाए रखा।

इन राज्यों की सरकारें किसानो को उनके फसल का उचित और समय पर भुकतान दिलवाने में विफल रही हैं। इन राज्यों में साहूकारों और बिचौलियों का एक कुख्यात जाल है जो किसानों के जी का जंजाल रहे हैं और सरकारें उनपर अंकुश लगाने में विफल रहीं।

नतीजन बड़ी संख्या में लोग खेती से विमुख हुए और उन्होंने शहरों की तरफ रुख किया। इन सब के अलावा इन राज्यों में शिक्षा एवं स्वास्थ्य की दहनीय स्थिति भी पलायन का एक बड़ा कारण बनी है। रोजी-रोटी के बाद शिक्षा और स्वास्थ ही जीवन की दो बुनियादी जरूरतें हैं और दुर्भाग्य से इन दोनों ही क्षेत्रो ने ये राज्य देश के बाकि राज्यों से फिसड्डी साबित हुए।

भारत के यह राज्य धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से संपन्न हैं। इन राज्यों के कोने-कोने में धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान हैं, लेकिन यहां की सरकारें इन्हें पर्यटन की दृृृृष्टि से आकर्षक और सुविधा संपन्न बनाने में विफल रहीं।

अगर इस दिशा में गंभीरता से कार्य किया जाता तब न सिर्फ राज्यों के अलग-अलग हिस्सों का विकास होता बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी प्राप्त होते।

इन राज्यों में पलायन कभी बड़ा मुद्दा नहीं रहा समय-समय पर इन के खिलाफ आवाजे उठीं मध्यम हुईं और दब गईं लेकिन कभी कोई ठोस प्रयास परवान नहीं चढ़ सका।

लेकिन सिर्फ सरकार की उदासीनता और उपेक्षा ही पलायन की जिम्मेदार नहीं है। इन राज्यों का सामाजिक विन्यास और कुरीतियां भी पलायन के लिए जिम्मेदार रहें हैं। इन राज्यों की युवाओं में सरकारी नौकरी के लिए एक तरह का जुुुुुनून देखा जाता है।

इस के सकारात्मक पहलू यह है कि देश के कोने-कोने में सरकारी नौकरियों में उत्तर प्रदेश और बिहार के युवा नौकरी करते मिल जाते हैं। लेकिन समय के साथ जहां नौकरियों में कमी आई यहां का समाज सरकारी नौकरी के प्रति अपना मोह कम करके वैकल्पिक उपायों को खोजने में पिछड़ गया।

इन राज्यों में शादी में दहेज जैसे कुरीतियों के कारण लोगों को अधिक रुपए कमाने के कारण भी गांव के संतुष्ट जीवन को छोड़ कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर होना पड़ा।

इन राज्यों में स्वरोजगार या कृषि क्षेत्र में काम कर के आजीविका चलाने वालों को नौकरी करते लोगों की अपेक्षा हेय दृृृृष्टि से देखा जाता है।

विवाह में भी स्वरोजगार और कृषि कार्य करने वालों की जगह शहरों में अपेक्षाकृत छोटी नौकरी करने वालों को तरजीह के कारण भी युवाओं का शहरों को पलायन हुआ।

इन राज्यों में जाति की जड़ें बहुत गहरी हैं और जातिगत दंभ एवं भेदभाव ने भी पलायन में एक अहम भूमिका निभाई है।
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राजनीति और अपराध के गहरी जड़ों के कारण यहां की सहकारी समितियों पर नेताओं और बाहुबलियों का कब्जा हो गया....

देश के कोने-कोने से वापस घरों को लौटते मजदूर - फोटो : PTI
इन राज्यों की तथाकथित ऊंची जातियों के पास कृषि योग्य भूमि का बड़ा रकबा होता था और वो मजदूरों से खेती करते थे, साथ ही इन जातियों के लोग सरकारी नौकरी में भी बड़ी संख्या में कार्यरत थे। लेकिन समय के साथ परिवार के विभाजन के कारण खेती का रकबा घटता गया और सरकारी नौकरी में भी कमी आई।

ऐसे में इस जाति के युवाओं ने जातिगत दंभ के कारण खेती स्वं करने या छोटे धंधे करने के बजाय शहरों की तरफ पलायन करना शुरू कर दिया। वहीं दूसरी तरफ उपेक्षित जातियां में सामाजिक और जातिगत भेदभाव के कारण गांवों के छोड़कर शहरों की तरफ पलायन करना उचित समझा।

इन राज्यों में जातिगत द्वेष और वैमनस्य के कारण 70-80 के दशक में बहुत से संघर्ष हुए। इन संघर्षों के कारण विभिन्न जातियों में कुछ स्वघोषित मसीहा पैदा हुए। इन लोगों ने जातिगत गोलबंदी कर हत्या, लूट, फिरौती और अपहरण जैसे अपराधों को अंजाम दिया।

इन के अनुयायियों ने जाति के कारण इन ही हर गलत कृत्य का न सिर्फ बचाव किया बल्कि रोबिनहुड जैसी छवि पेश कर के इनका महिमामंडन किया गया। लेकिन इन सब अपराध और भय के माहौल में व्यापार और स्वरोजगार को बहुत धक्का लगा और बड़ी संख्या में युवाओं का रोजगार और सुरक्षा के लिए शहरों की ओर पलायन हुआ।

इन राज्यों के किसानों ने भी कृषि में प्रयोगों से दूरी ही बनाए रखी और परंपरागत खेती को ही वरीयता दी। राजनीति और अपराध के गहरी जड़ों के कारण यहां की सहकारी समितियों पर नेताओं और बाहुबलियों का कब्जा हो गया।

यहां के किसान अपने स्तर सहकारी समितियों के बनाने और उनके संचालन में भी विफल रहे। इन समितियों का विफल होने के कारण छोटे और मझोले किसानों के लिए गहरा धक्का लगा और भारी संख्या में किसान मजदूर बने और उनका शहरों में पलायन हुआ। साहूकारों और महाजनों के ब्याज का कुचक्र भी इन राज्यों में बहुत गहरा है और किसानों के पलायन का कारण रहा है।

इस प्रकार सरकारों की उदासीनता और उपेक्षा एवं समाज की जड़ता के कारण भारत के हिंदी भाषी राज्यों में पलायन एक गंभीर समस्या बन गई है। लेकिन समय के साथ हाल के दिनों कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिले हैं। सरकारों के रवैये में बदलाव देखने को मिला है।

इन राज्यों की सरकारें भी अब स्थानीय स्तर पर रोजगार दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। सरकारों की तत्परता और समाज में आई चेतना और मीडिया के प्रचार-प्रसार के कारण अपराधों में भी कमी आई है। इस तरह इन राज्यों में भी व्यापार और रोजगार का माहौल बन रहा है।

विभिन शिक्षा संस्थान भी नवाचार को इच्छुक युवाओं को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं। कुछ सफल युवा विदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से अपनी नौकरियां छोड़ कर अपने गांव की तरफ वापस आए हैं और नए-नए स्टार्ट अप शुरू कर के स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं।

यह युवा सफलता प्राप्त करने के बाद अपनी जड़ों की ओर लौटे हैं,  इस कारण ये समाज में स्वीकार्य हैं और नए लोगो को स्वरोजगार के प्रेरणास्रोत भी बने हैं। कोरोना काल का संकट भी राज्य सरकारों और मजदूरों को तमाम परेशानी के साथ के अवसर भी ले कर आया है।

अगर देश के कोने-कोने से वापस घरों पर लौटे इन मजदूरों के हित में सरकार कुछ प्रयास करे और समाज अपनी गलतियों को स्वीकार कर के एक नई शुरुआत करें तब न सिर्फ पलायन पर अंकुश लगेगा, बल्कि इन मजदूरों के श्रम की बदौलत हिंदी भाषी राज्य भी अपनी बीमारू हालत से निकल पर विकास पथ पर चल पड़ेंगे।

हम सभी जानते हैं कि बदलाव रातों रात नहीं आते लेकिन बदलाव की दिशा में कदम उठाने का यह सही समय है।

डॉ. सुघोष माधव वर्तमान में शहीद भगत सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अतिथि आधार पर सहायक प्रोफेसर (गेस्ट फैकल्टी) के रूप में कार्यरत हैं। जेएनयू, नई दिल्ली से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त डॉ. सुघोष पर्यावरण और समाज से जुड़े मुद्दों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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