मजदूर वर्ग सदियों से शोषण का शिकार होता रहा है
आज अगर महामारी की जगह चुनाव हो रहा होता तो शायद इन मजदूरों को नेतागण अपने निजी वाहनों से रोटी-पानी देकर भेज रहे होते। इस देश की यही विडंबना है कि जय जवान, जय किसान वाले देश में और देश को अपने खून-पसीने से सींचने वाले मजदूर अपने ही लोगों द्वारा नजरअंदाज किए जा रहे हैं। मेरे लिए ये मजदूर महामानव से कम नहीं जो इतने लंबे रास्तों पर चल पड़े हैं ये भी न जानते हुए कि मंजिल मिलेगी कि नहीं।
सवाल यह है कि आज ये मजदूर सभी के लिए इतने बेगाने क्यों हो गए हैं। इसका कारण इनका शोषण सहते चले जाना और प्रतिरोध न करना है। हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है जो लोगों के मानवाधिकार की बात करता है लेकिन
- इनके अधिकार की बात कौन करेगा?
- क्या ये मजदूर नेताओं के वोट बैंक तक सीमित हैं?
भारत के ये मजदूर वर्ग के लोग आज ही शोषण के शिकार नहीं हुए हैं बल्कि सदियों से होते रहे हैं। इनका सबकुछ सहते चले जाना और प्रतिरोध न करना ही इनके शोषण की जड़ है। जो स्थिति है उसी में जीना, थोड़े से ही काम चला लेना। अपने हक और हुकूक के लिए आवाज नहीं उठाना ही इस उत्पीड़िन के केंद्र में है।
पहले पराधीन देश में अंग्रेजों ने इनका खून चूसा अब स्वतंत्र देश में सियासती लोग चूस रहे हैं। अभी हाल में मनोज झा द्वारा लिखित एक उपन्यास पढ़ा जिसका नाम 'कूली लाइंस'है। बड़े सुंदर ढंग से लेखक ने 19सवीं सदी में गुलाम बनाकर भारत से विदेशों में ले जाए जानेवाले गिरमिटियों का वर्णन किया है।
केवल भारत से ही मजदूरों को क्यों ले जा रहे थे फ्रांस, डच और ब्रिटिश लोग क्योंकि ये लोग जीतोड़ मेहनत करते थे। बंजर जमीन को सोना बना देते थे। अंग्रेजों की प्रताड़ना और उल्टे-सीधे नियमों को चुपचाप मान लेते थे। विदेशों की धरती पर काम करने वाले चीनी और अफ्रीकी लोगों को हटाकर केवल भारतीय मजदूरों को ही रखा जाता था। उस समय अशिक्षा, गरीबी और जागरूकता की कमी के कारण वह शोषित थे।
बहुतेरे लोग इन मजदूरों को ही इनकी नियति का जिम्मेदार मान रहे हैं
आज दो सदियों के बाद भी कमोवेश उनकी स्थिति वैसी की वैसी ही है। मैं उन नेताओं को लम्बे समय से ढूंढने का प्रयास कर रही हूं जो खुद को पिछड़ों और गरीबों का मसीहा कहते हैं। मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतों पर अमल करने वाले और गांधी, लोहिया, अम्बेडकर की विचारधारा को मानने वाले वे नेता मैदान से कहां गायब हो गए हैं?
आज जब उनकी सबसे अधिक जरूरत है इन मजदूरों को तब कोई दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है। कुछ संवेदनशील लोग सोशल मीडिया पर लिख और बोल भी रहे हैं लेकिन बहुतेरे लोग इन मजदूरों को ही इनकी नियति का जिम्मेदार मान रहे हैं। ये जो इतने लोगों की भीड़ साथ में आ रही है ये चाहती तो रास्ते में पड़ने वाली दुकानों, हॉटलों, ठेलों आदि को लूट सकती थी और कोई इनका कुछ नहीं बिगाड़ता।
लेकिन ये उन्मादी, जानलेवा और आवारा भीड़ नहीं कि पीट-पीटकर लोगों की जान ले लें। यही भीड़ अगर कुछ धर्मांध संगठनों की होती तो रास्ते भर लोगों, सामानों और दुकानों को लूटकर चल रही होती। लेकिन यह भीड़ खुद्दारी से भरी उन लोगों की है जो लाचार और बेबस भले हैं लेकिन फ़सादी और दंगाई नहीं।
आत्मनिर्भरता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि एक बॉटल पानी, कुछ बिस्किट और चंद रोटोयों के साथ ही ये मजदूर निकल पड़े हैं। इन्हें न तो कोई आशा है न ही कोई उम्मीद। कल इन्हें फिर से प्रलोभन देकर बुला लिया जाएगा और ये लोग फिर से आएंगे अपने खून पसीने से इस देश को सींचने क्योंकि इनके पास और कोई विकल्प नहीं है।
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