हमारा पूर्ण अस्तित्व अतीत की यादों से भरी एक गठरी ही तो है, जिसे हम हर वक़्त सिर पे उठाए या कंधे पर लटकाए चलते रहते हैं। सोते समय भी उसे तकिये की तरह इस्तेमाल करते हैं, और इस तरह जागते-सोते हर समय इन्हीं में उलझे रहते हैं। इसी गठरी की गांठे खोल समय-समय पर अपने मीठे-कड़वे अनुभवों के धागे चुन अपनी हर योजना की रूपरेखा बुनते हैं और उसे कार्यान्वित करने के समय तक का निर्धारण करते हैं। उन्हीं यादों के भंडार से प्रेरणा लेने को मजबूर रहते हैं कि हमें किस कार्य में कब सतर्कता बरतते सावधानी से कदम बढ़ाने हैं या आत्मविश्वास से छलांग भी लगाई जा सकती है।
हमारा उठाया हर कदम, हर फैसला हमारे उन पिछले अनुभवों से प्रेरित भावना द्वारा ही निर्देशित होता है जिन्हें हमने यादों के रूप में सहेजा होता है। लेकिन पकड़ की मजबूती से छूटती-भागती, वक़्त की दूरी का फायदा उठाती शरारती यादें, छल रचना शुरू कर देती हैं। हमारी निजी गैलरी में लटकाए गए चिर-परिचितों के चित्र अपने लेबल खो देते हैं,आकृति और रंगों में फीके पड़ जाते हैं, और गुमनामी के सायों में जा खो जाते हैं।
परिचितता की गर्मजोशी के अहसासों भरी मिठास गुमनामी के भंवर में घुल कर फीकी पड़ जाती है, अनिश्चितताएं भ्रम की चपेट में आकर स्टैंडबाय मोड में चली जाती हैं। जीवन भर के अनुभवों की प्रभाववादी कमाई और उसमें से सहेजी बचत हमारे अस्तित्व की रेत-घड़ी की संकीर्ण गर्दन से फिसलते बारीक कणों की तरह गिर कर कहीं खो जाती है।
यादों की बेवफ़ाई की फितरत के बावजूद हम सब बीते हुए लम्हों की यादों को संजोते हैं। जितनी गहरी यह यादें हमारे मस्तिष्क-पटल रूपी जमीन में जड़ें जमाती हैं, समय बीतते उतने ही मीठे फल बन वे बाहर निकलती हैं। अपने अतीत के समय, स्थानों और लोगों के बारे में उदासीन हो हम अक्सर उन्हें याद करते हैं और उनके बारे में ही सोचते हैं।
जब दो परिचित कुछ अंतराल के बाद मिलते हैं तो वे अक्सर संग-संग लौट जाते हैं साथ बिताए समय में, और उन क्षणों की छोटी-छोटी घटनाओं को और उस समय के साथियों को याद कर रोमांस में आनन्दित होते हैं।
वर्तमान और भविष्य की आशंकाओं से परेशान, हम सभी स्वभाव से अतीत में रहना पसंद करते हैं। सब ने अपने-अपने निजी संग्रहालयों का निर्माण किया होता है, जिसमें उन्होंने अपने अतीत की कथित महिमाओं और गौरवमई लगती उपलब्धियों को संरक्षित किया होता है, जहां वे समय-समय पर उन सुखद बीते क्षणों को फिर से जीने के लिए चले जाया करते हैं। अतीत के उन अधूरे सपनों और इच्छाओं के मोहक सायों के साथ अपने संबंधों को फिर से जोड़ने के लिए जिनका बीते वक्त की तड़प के साथ पैदा होना स्वाभाविक है।
फोटो एल्बम, दीवारों पर टंगे पोर्ट्रेट, पत्र, ग्रीटिंग कार्ड, ऑटोग्राफ, फोटो, दस्तावेज, स्मृति-चिन्ह और आधुनिक टेक्नालजी के वरदान ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग आदि यह सभी उन यादगार स्मृतियों के अवतार हैं जिन्हें अमूमन हम सभी सहेजते और पालते हैं।
यह सब स्मृति-चिन्ह हमेशा उनसे जुड़ी भावनाओं की गवाही देते हैं और उस बीते समय के साथ उन्हें भी स्थिर कर देते हैं जो देखभाल, स्नेह या दिल के दर्द के उन विशेष क्षणों के साथ जुड़ी होती हैं। उन संवेदनशील भावनाओं का तो कुछ लोगों पर इतना गहरा प्रभाव होता है कि वह अपने चिर-मृत संबंधों की यादों के साथ ही जीने और उनके लिए अपने वर्तमान को नकारते जीते-जी मरने को भी लिए तैयार रहते हैं।
यादें हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न अंग हैं और रहेंगी, जबकि हम में से कई उनके बारे में उदार हैं और उन्हें स्वेच्छा से दूसरों के साथ साझा करते हैं, कुछ लोग अपनी भावनाओं की आंच में सुलगते रहने के लिए उन्हें अपने दिल के करीब ही रखते हैं और अपने आसपास के लोगों को अपनी संवेदनाओं के समेटे गुबार का कुछ भी एहसास नहीं होने देते। फिर भी, यादें हमें वह बनाती हैं जो हम हैं और हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा प्रदान करती हैं।
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