अक्सर जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर हम यह विलाप करते हैं कि समय रेत की तरह हाथों से फिसल गया और हम जीना शुरू ही नहीं कर पाए। सच तो यह है कि प्रकृति ने हमें छोटा जीवन नहीं दिया, बल्कि हमारी मानसिक फिजूलखर्ची ने इसे छोटा बना दिया है। यदि हम जीने की सही कला सीख लें, तो यह जीवन पर्याप्त से भी अधिक व्यापक है। दरअसल, समस्या समय के अभाव की नहीं, बल्कि उस समय के एक बहुत बड़े हिस्से को निरर्थक चिंताओं और व्यर्थ की गतिविधियों में नष्ट कर देने की है। इन सबमें हम उस अदृश्य संपत्ति को लुटा रहे होते हैं, जिसे संसार की पूरी दौलत देकर भी वापस नहीं खरीदा जा सकता।
हैरानी की बात यह है कि हम अपनी भौतिक संपत्ति, भूमि या धन की रक्षा के लिए तो अभेद्य दीवारें खड़ी कर देते हैं और उसके एक अंश के लिए भी युद्ध पर उतर आते हैं, लेकिन जब बात ‘समय’ की आती है, तो हम सबसे बड़े दानवीर बन जाते हैं। हम अपना कीमती वक्त उन अजनबियों और व्यर्थ की चर्चाओं को सौंप देते हैं, जो हमारे अस्तित्व में कोई मूल्य नहीं जोड़ते। समय की इतनी उपेक्षा इसलिए होती है, क्योंकि यह ‘अमूर्त’ है, यानी यह दिखाई नहीं देता। यदि समय को सिक्कों की तरह गिना जा सकता, तो शायद हम इसे खर्च करने से पहले हजार बार सोचते। जीवन की सबसे बड़ी भूल उस ‘विलंब’ में छिपी है, जिसे हम अक्सर ‘भविष्य की योजना’ का सुंदर नाम देते हैं। हम अपने सबसे ऊर्जावान और सुनहरे वर्ष सांसारिक बोझ ढोने और दूसरों को प्रभावित करने में होम कर देते हैं, और वास्तविक आनंद के लिए उस उम्र को बचाकर रखते हैं, जब शरीर जर्जर और मन शिथिल हो चुका होगा। जो व्यक्ति आज के वर्तमान क्षण को भविष्य की मृगतृष्णा के लिए छोड़ देता है, वह कभी तृप्त हो ही नहीं सकता। जीने की तैयारी में ही पूरा जीवन गंवा देना, अपने ही अस्तित्व के प्रति सबसे बड़ा अपराध है।
जीवन को वास्तव में सार्थक बनाने का एकमात्र तरीका श्रेष्ठ विचारों और कालजयी ज्ञान का संग है। जब हम महान सत्यों और प्रज्ञा के साथ समय बिताते हैं, तो हम केवल अपनी छोटी-सी आयु में नहीं जीते, बल्कि मानवता के पूरे इतिहास और उसकी चेतना को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं। ज्ञान हमें उन सीमाओं से मुक्त करता है, जहां समय हमें बांधने की कोशिश करता है।
दिखावे और सामाजिक प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ समय के सबसे क्रूर चोर हैं। यदि आप आज से ही उन चीजों को 'न' कहना सीख लें, जो आपकी आत्मा को पोषण नहीं देतीं, तो आप पाएंगे कि आपके पास पर्याप्त समय है। यह जीवन एक विशाल कोरा कैनवास है, जिसे हम व्यर्थ की चिंताओं की स्याही से काला कर देते हैं। असली दीर्घायु वर्षों की गिनती से नहीं, बल्कि सार्थक अनुभवों और आंतरिक जागरण से मापी जाती है। सहेज कर रखा गया समय ही वह भूमि है, जहां शांति और आत्म-बोध के फूल खिलते हैं। (ऑन द शॉर्टनेस ऑफ लाइफ के अनूदित अंश)
'न' कहना सीखें
समय ही आपका सबसे कीमती धन है। इसे भविष्य की कल्पनाओं में खोकर न छोड़ें। निरर्थक चिंताओं, दिखावे और दूसरों को प्रभावित करने की होड़ से खुद को दूर रखें। ‘ना’ कहना सीखें, क्योंकि हर स्वीकृति आपके जीवन का एक अंश ले लेती है। सहेजा हुआ समय ही आत्मिक शांति, संतोष व सच्चे आनंद का आधार बनता है।