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भगत सिंह: एक बालक से क्रांतिकारी तक का सफर

सार

Shaheed bhagat Singh Death Anniversary: 23 मार्च 1931 को शाम 7:33 बजे भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई। वे हंसते-खेलते गए। उनकी मौत ने देश जगा दिया। आज वे अमर हैं।
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शहीद दिवस 2026 - फोटो : Adobe
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विस्तार
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भगत सिंह भारत के उन महान सपूतों में से एक हैं, जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की उम्र में देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। उनका नाम सुनते ही युवाओं के दिल में जोश भर जाता है। वे न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि विचारक, लेखक और समाज सुधारक भी थे। उनका जीवन छोटा था, लेकिन प्रभाव इतना गहरा कि आज भी लाखों लोग उन्हें याद करते हैं।

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भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनका पैतृक गांव खटकर कलां है, जो आज भारत के पंजाब में है। उनके पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर एक देशभक्त सिख परिवार से थे, लेकिन आर्य समाज के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। जन्म के समय उनके पिता और चाचा जेल में थे, क्योंकि वे अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाते थे। रिहाई के दिन उनका जन्म हुआ, जिससे घर में खुशी दोगुनी हो गई। बचपन से ही उन्हें देशभक्ति की शिक्षा मिली।

बचपन और आर्य समाज का प्रभाव

भगत सिंह का बचपन पंजाब की क्रांतिकारी हवा में बीता। उनके परिवार पर महर्षि दयानंद सरस्वती और आर्य समाज का गहरा असर था। आर्य समाज वेदों की ओर लौटने, मूर्तिपूजा का विरोध करने और समाज में समानता लाने की बात करता था। उनके पिता और चाचा अजीत सिंह आर्य समाज के सक्रिय सदस्य थे। भगत सिंह ने डीएवी स्कूल में पढ़ाई की, जहां आधुनिक शिक्षा के साथ वैदिक अनुशासन सिखाया जाता था। ये स्कूल मजबूत चरित्र, देशभक्ति और निर्भीकता सिखाते थे।
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1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड ने 12 साल के भगत सिंह को गहरा झटका दिया। वे घटनास्थल गए और खून से सनी मिट्टी इकट्ठा की, जिसे घर लाकर पूजते थे। यह उनका पहला बलिदान का अनुभव था। आर्य समाज में यज्ञ का मतलब सिर्फ अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज के लिए खुद को समर्पित करना था। भगत सिंह ने 1923 में लिखा कि वे शादी के बजाय भारत माता और उसके 33 करोड़ बच्चों के लिए जीवन समर्पित करेंगे। वे राष्ट्र को मां मानते थे और सेवा को अपना उद्देश्य बनाया। जब 1930 में उनके पिता ने दया याचिका दी, तो उन्होंने सख्ती से मना किया। वे सिद्धांतों से समझौता नहीं चाहते थे।

क्रांतिकारी बनने का सफर

स्कूल छोड़कर भगत सिंह नेशनल कॉलेज, लाहौर में पढ़े, जहां लाला लाजपत राय ने स्वदेशी शिक्षा दी। वे नौजवान भारत सभा से जुड़े। 1926 में वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) में शामिल हुए। चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु जैसे साथी मिले।

1928 में लाला लाजपत राय की पुलिस लाठीचार्ज से मौत हुई। बदला लेने के लिए भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर में पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स को गोली मारी। फिर दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका, लेकिन ख्याल रखा कि कोई घायल ना हो क्योंकि उनका यह विरोध प्रतिकात्मक था। नारे लगाए - "इंकलाब जिंदाबाद!" वे पकड़े गए, लेकिन भागे नहीं। मुकदमे में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। जेल में भूख हड़ताल की, जिस से कैदियों के अधिकार सुधरे।

जेल जीवन: समानता और अध्ययन का प्रतीक

लाहौर जेल में भगत सिंह शांत और विचारशील रहे। उन्होंने सफाई कर्मचारी से रोटी मांगी, क्योंकि आर्य समाज समानता सिखाता था। हर इंसान में दिव्य चिंगारी है, कोई छुआछूत नहीं। वे किताबें पढ़ते रहे। जिसमें मार्क्स, लेनिन के अलावा भारतीय ग्रंथ भी शामिल थे। उन पर भगवद गीता का प्रभाव दिखता है। गीता में निष्काम कर्म, कर्तव्य पालन और निर्भीकता की बात है। भगत सिंह ने मौत को डर नहीं माना, बल्कि कर्तव्य माना। वे स्थितप्रज्ञ थे - मन शांत, विचार मजबूत।

साथी क्रांतिकारी: राजगुरु और सुखदेव

भगत सिंह अकेले नहीं थे। शिवराम राजगुरु महाराष्ट्र से थे। वे व्यायाम मंडल और राष्ट्रवादी संगठनों से जुड़े थे। अनुशासन, शारीरिक बल और देशभक्ति सीखी। कुछ समय नागपुर में रहे। सुखदेव संगठित और गंभीर थे। तीनों भाई जैसे थे। वे एक-दूसरे पर भरोसा करते थे। 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में फांसी हुई। वे गाते हुए गए - "मेरा रंग दे बसंती चोला"।

वीर सावरकर से प्रेरणा

भगत सिंह वीर सावरकर को बहुत सम्मान देते थे। उन्होंने सावरकर की किताब 1857 का स्वातंत्र्य समर पढ़ी और छपवाई। 1909 में प्रकाशित एक ऐतिहासिक पुस्तक है। यह पहली किताब थी जिसने 1857 के विद्रोह को 'सिपाही विद्रोह' के बजाय सुनियोजित 'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम' बताया। क्रांतिकारी इस पुस्तक को 'गीता' की तरह मानते थे।

भगत सिंह सावरकर की जीवनी से प्रभावित हुए। सावरकर को संवेदनशील और साहसी माना। फांसी के बाद सावरकर ने रत्नागिरी में काला झंडा फहराया और कविता लिखी। दोनों क्रांतिकारी एक-दूसरे का आदर करते थे।

विचारधारा: समाजवाद और आजादी

भगत सिंह समाजवादी थे। वे पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और जातिवाद के खिलाफ थे। जेल में ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ लिखा, लेकिन वे धर्म नहीं, अंधविश्वास के खिलाफ थे। वे समानता, न्याय और एकता चाहते थे। उनका मानना था कि आजादी के बाद गरीबी, अशिक्षा खत्म हो।

अंतिम क्षण और अमरता

23 मार्च 1931 को शाम 7:33 बजे फांसी दी गई। वे हंसते-खेलते गए। उनकी मौत ने देश जगा दिया। आज वे अमर हैं। स्कूलों में उनकी कहानी पढ़ाई जाती है। युवा उन्हें आदर्श मानते हैं। भगत सिंह का जीवन सिखाता है कि उम्र नहीं, सिद्धांत मायने रखते हैं। वे बलिदान के प्रतीक हैं। उनका सपना - एक समान, स्वतंत्र और न्यायपूर्ण भारत - आज भी प्रेरित करता है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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