कोंकण तट के पास सतह पर आती हुई ब्राइड्स व्हेल
- फोटो : मिहिर सुळे
किलर व्हेल (Orcinus orca) 2020 में पुरंगड–गावखाड़ी क्षेत्र के निकट 200 मीटर दूरी पर मछुआरों ने किलर व्हेल के समूह को देखा था।
समुद्री कछुए- हरा कछुआ, ऑलिव रिडले, हॉक्सबिल ये सभी संरक्षित प्रजातियां हैं और कोंकण तट पर अंडे देने के लिए आती हैं।
पिग्मी स्पर्म व्हेल (Kogia breviceps) यह छोटी और दुर्लभ व्हेल प्रजाति कभी–कभी कोंकण के तटों पर दिखाई देती है।
हर्णै के पास पिछले कुछ वर्षों में व्हेल के दिखने की घटनाएं बढ़ी हैं, जो पर्यावरणीय दृष्टि से सकारात्मक है, परंतु स्थानीय मछली व्यवसाय पर इसका प्रभाव भी देखा गया है। जालों में डॉल्फिन के फँसने की घटनाएँ भी सामने आई हैं।
संस्थाएं और संरक्षण के प्रयास
BNHS, CETRM, WII, IIT बॉम्बे और कई स्थानीय NGOs समुद्री जैवविविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनके प्रयासों में शामिल हैं-
- उपस्थिति सर्वेक्षण
- स्थानीय समुदायों में जनजागृति
- मृत जीवों के पोस्टमार्टम
- GIS आधारित प्रवास मार्गों का मानचित्रण
GIS तकनीक से तैयार किए गए ये मानचित्र नीति–निर्माताओं को महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करते हैं। इससे सुरक्षित समुद्री मार्ग निर्धारित कर बड़े जहाजों की आवाजाही और औद्योगिक गतिविधियों को पर्यावरण-अनुकूल दिशा दे सकते हैं।
स्थानीय समुदायों की भूमिका
कोंकण के मछुआरों का अनुभव संरक्षण का महत्वपूर्ण आधार है। बहुत-सी संस्थाएं उन्हें सुरक्षित मछली पकड़ने की तकनीक, जालों में सुधार और बायकैच कम करने के उपाय सिखाती हैं। महिलाओं और छात्रों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कार्यशालाएँ, प्रतियोगिताएँ और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं।
सरकारी उपक्रम
भारत सरकार और महाराष्ट्र शासन द्वारा CRZ, समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPA), और जैवविविधता समितियों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर 'National Marine Mammal Action Plan' के अंतर्गत भी कई महत्वपूर्ण नीतियों पर काम किया जा रहा है।
कोंकण तट न केवल मनुष्यों के जीवन से जुड़ा है, बल्कि अनेक संरक्षित समुद्री जीवों के अस्तित्व का आधार भी है। डॉल्फिन और व्हेल की बढ़ती उपस्थिति नए शोध और संरक्षण रणनीतियों के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती है।
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