निष्ठुर और प्रायोजित हिंसा की पीछे की वजह
मणिपुर जैसी घटनाओं के पीछे राजनीतिक, आर्थिक कारणों के अलावा बहुत बड़ा कारण सामाजिक है। वहां समाजों के आर्थिक स्वार्थ और विदेशों से अलगाववादी तत्वों को हवा देने जैसे कारण भी इसके पीछे हैं। लेकिन समाजिक सौहार्द पूरी तरह तार-तार हो जाए, इसे समझने के लिए किसी प्रौद्योगिकी की जरूरत नहीं है।
निष्ठुर और प्रायोजित हिंसा के उदाहरण हमने हाल में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में भी देखे। जहां वोट डालने से रोकने के लिए भी बड़ी आसानी से लोगों की जानें ले ली गईं। समुदायों में विवाद और हिंसा होती है, लेकिन उसके पीछे ज्यादातर तात्कालिक आवेश, आर्थिक राजनीतिक स्वार्थ, सामाजिक द्वेष अथवा धार्मिक-वैचारिक कट्टरता होती है। लेकिन हिंसक टकराव के कुछ समय बाद स्थिति सामान्य होने लगती है। कई बार खुद समाज उस आवेश अथवा प्रतिशोध में की गई हिंसा को लेकर पश्चाताप करने लगता है, क्योंकि आखिर हम सब मनुष्य हैं।
लेकिन पिछले कुछ समय से विविधता पर गर्व करने वाले इस देश में क्रूरता और मानवता को अपमानित करने की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ी हैं और कई बार जिस तरह से उसे ग्लैमराइज भी किया जाता है, उसकी गहराई से पड़ताल जरूरी है। ये क्रूरता मुख्य रूप से महिला, दलित, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के साथ हो रही है। मसलन प्रेमिकाओं की हत्या कर उसके टुकड़े- टुकड़े जंगल में फेंकने या उन टुकड़ों को सूप की तरह उबालने, दलितों के साथ रेप के बाद उनकी हत्या या फांसी पर टांग देने, आदिवासियों पर पेशाब करने, नन्हीं बच्चियों से रेप कर उन्हें काटने या जिंदा जला देने, धार्मिक दुराग्रहों के चलते गला काट देने जैसी वीभत्स घटनाओं की मानों सीरिज सी चल रही है।
सोशल मीडिया आने के बाद तो मानो ऐसी घटनाएं भी ‘मनोरंजन’ और भय पैदा करने का नया माध्यम बन गई हैं। अब लोग रेप पीड़िता अथवा दुर्घटना में दम तोड़ने वाले व्यक्ति को बचाने के बजाए उसका वीडियो बनाकर उसके लाइक्स गिनने में अजब तरह का राक्षसी आनंद महसूस करते हैं।
यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है और क्रूरता तथा परपीड़ा में आनंद लेने का शैतानी सुख है। इसके पीछे घटिया आत्म संतोष शायद यही है कि जो दूसरों के साथ हुआ, वह मेरे साथ कभी नहीं होगा। मैं मात्र दर्शक और अपने में मगन सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हूं, जो समाज में रहकर समाज का ज्यादा नुकसान कर रहा है। इससे भी ज्यादा अफसोस की बात यह है कि जैसे ही ऐसी कोई पैशाचिक घटना वायरल होती है, दूसरे कई लोग उस निष्ठुरता की सीमा लांघते हुए क्रूरता की नई मिसाल पेश करने के बेताब प्रतीत होते हैं।
यह सब क्या है? आज लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खतरों पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन मानव सभ्यता को असल खतरा तो पशु से भी बदतर होते इंसानों से है।
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