पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में जातीय हिंसा को आज दो साल पूरे हो गए। हाल के महीनों में खासकर बीती फरवरी में मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह के इस्तीफे और राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद हिंसा की घटनाएं भले कुछ कम हुई हैं, पर जमीनी हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आ सका है।
इस हिंसा ने राज्य के दो प्रमुख तबकों, मैतेई और कुकी के बीच जो दूरियां बढ़ाई हैं, वह अब भी घटने का नाम नहीं ले रही है। हिंसा के दो साल पूरे होने के मौके पर दोनों तबकों के लोग अपने-अपने तरीके से इस दिन का पालन कर रहे हैं। मैतेई संगठनों ने जहां राजधानी इंफाल में एक सम्मेलन का आयोजन किया है वहीं कुकी संगठनों ने अपने प्रभाव वाले इलाके में बंद बुलाया है।
दशकों से उग्रवाद की चपेट में रहे इस पर्वतीय राज्य की घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की अदालती सलाह के बाद साल 2023 में तीन मई को बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी थी। उसके बाद राज्य के पर्वतीय और मैदानी इलाकों के बीच विभाजन साफ उभर आया।
पर्वतीय इलाकों में कुकी-जो और नागा जनजातियां ही रहती हैं। हिंसा के बाद दोनों तबकों के उग्रवादी संगठनों ने बड़े पैमाने पर हथियार लूटे और अपनी सुरक्षा का जिम्मा खुद उठा लिया।
एक जुलूस पर हमले से छोटे पैमाने पर शुरू हुई यह हिंसा देखते ही देखते जंगल की आग की तरह पूरे राज्य में फैल गई। दशकों से पड़ोसी रहने वाले लोग भी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए और बड़े पैमाने पर लूटपाट, आगजनी और हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया। इस दौरान राज्य में पुलिस और प्रशासन नामक कोई चीज नजर नहीं आई।
हजारों की तादाद में केंद्रीय बलों की तैनाती भी इस पर अंकुश लगाने में नाकाम रही। लोग-बाग घर से भाग कर राहत शिविरों में शरण लेने लगे। कुछ ही दिनों में मृतकों का आंकड़ा सैकड़ों और विस्थापितों का लाखों में पहुंच गया।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक इस हिंसा में ढाई सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 50 हजार से ज्यादा लोग बेघर होकर राहत शिविरों में दिन गुजार रहे हैं। गैर-सरकारी आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है।
करीब 22 महीनों तक यह परिस्थिति जारी रहने के बाद इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री के इस्तीफे के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। उसे भी अब ढाई महीने से ज्यादा हो चुके हैं। लेकिन जमीनी परिस्थिति जस की तस है। अब भी मैतेई और कुकी तबके के लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। इनमें से कोई भी एक-दूसरे के इलाके में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
केंद्र सरकार ने हिंसा की जांच के लिए एक तीन- सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था। इसकी मियाद दो-हो बार बढ़ाई जा चुकी है। बावजूद इसके वह जांच पूरी नहीं कर सका है। आयोग की मियाद इसी 20 मई को पूरी हो जाएगी। केंद्र ने साफ कर दिया है कि अब इसकी मियाद नहीं बढ़ाई जाएगी। हिंसा और आगजनी के दूसरे मामलों की जांच करने वाली सीबीआई और एनआईए की स्थिति भी इससे अलग नहीं है।
सीबीआई को सौंपी गई थी जांच
केंद्र सरकार ने मणिपुर हिंसा की साजिश और यौन हिंसा की घटनाओं समेत छह मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी थी। वह भी अब तक जांच पूरी नहीं कर सकी है। दूसरी ओर, हिंसा में उग्रवादी साजिश, हथियारों की तस्करी और विदेशी ताकतों के शामिल होने के मामलों की जांच कर रही एएनआई की टीम भी अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब तक तमाम लूटे हुए हथियार बरामद नहीं हो जाते और तमाम उग्रवादी संगठन हथियार-विहीन नहीं होते, राज्य में शांति औऱ सामान्य स्थिति की बहाली दूर की कौड़ी ही है। एक विश्लेषक सरोज के. सिंह का कहना है कि सीमा पार से हथियारों की सप्लाई पर भी अंकुश लगाना होगा।
हालांकि राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि म्यांमार से लगी सीमा पर निगरानी बढ़ा दी गई है और कुछ इलाकों में कंटीले तारों की बाड़ लगाने का काम भी चल रहा है। हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए सीमा पार से हथियारों की सप्लाई रोकना सबसे जरूरी है।
यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि पूर्व मुख्यमंत्री बीरेन सिंह भी सीमा पार से कुकी उग्रवादियों को हथियारों की सप्लाई के आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने इसे राज्य में जारी हिंसा की सबसे बड़ी वजह बताया था।