ये सबसे खास बात है कि मंदिरा के हर निर्णय और हर कदम का सम्मान करने के लिए उनके पति राज कौशल खड़े थे।
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महिलाएं और हमारा समाज
हमारे समाज ने पहले से महिलाओं के लिए कई विधान बनाए हैं। उनके जीवन के हर पड़ाव के लिए तयशुदा सामाजिक बेड़ियां हैं। जिनमें बंधे होना उनके आदर्श और सभ्य होने की परिचायक होती हैं। सती प्रथा से लेकर विधवा महिला के सिर मुंडा देने, उसके एक समय भोजन करने या अपने पसन्द के भोजन को त्याग देने, उसे सिर्फ प्रभु भक्ति में रत रहने, आदि जैसे कई नियम आज भी हमारे देश में दबे-छुपे या खुलेआम दोनों तरह से लागू किए जा रहे हैं।
तुर्रा ये कि विधवा स्त्री के मन में परपुरुष के लिए या सामान्य भौतिक जीवन के लिए लालसा न उठे, इसलिए समाज ने ये नियम बनाए हैं और विधुर के लिए? किसी पुरुष की जीवनसंगिनी के न रहने पर उससे सामान्य जीवन जीने का कोई अधिकार छीना नहीं जाता। न ही उसे किसी विशेष वेशभूषा को धारण करने को कहा जाता है। बल्कि वह बेचारगी का प्रतीक हो जाता है।
अब भी ज्यादातर मामलों में कुछ ही समय में यह कहकर उसकी दूसरी शादी कर दी जाती है कि घर, बच्चे और पुरुष को संभालने वाली आ जाएगी तो अच्छा होगा।
अचरज की बात है कि हमारे समाज में एक बड़ा वर्ग (जिनमें पढ़े-लिखे लोग भी शामिल हैं) यह मानता है किसी शुभ कार्य के दौरान विधवा या परित्यक्ता स्त्री की शक्ल दिख जाना अशुभ होता है। लेकिन उसी स्त्री के साथ बलात्कार या शोषण करना जायज हो जाता है। गंगा के तट पर सिर मुंडाए दिखाई देने वाली ऐसी कई स्त्रियों के शोषण का लंबा इतिहास है और आज तक कोई उसे रोक नहीं पाया है।
मंदिरा ने बिना शिकवे शिकायत के अपनी जिंदगी को जिया है। यह किसी भी इंसान का मौलिक अधिकार है कि वह अपनी जिंदगी कैसे जीना चाहता है। जब तक कि उसके किसी क्रियाकलाप से किसी अन्य का नुकसान नहीं होता।
मंदिरा की जिंदगी में जो भी गलत या सही है उसका निर्णय और उसके परिणाम भी उनके ही हैं। यह किसी और के पेट मे दर्द की वजह कैसे हो सकते हैं भला? इसलिए बेहतर है कि उन्हें उनका जीवन उनकी मर्जी से जीने के लिए छोड़ दिया जाए।
काश कि मंदिरा की ही तरह हर एक महिला अपने जीवन को लेकर इतनी स्ट्रांग हो कि न केवल वे इस तरह के ट्रोलर्स को नजरअंदाज कर अपना जीवन जी सकें बल्कि समय आने पर चिल्ला कर कह सकें- आय एम नीदर अलोन, नॉर अवेलेबल (न मैं अकेली हूँ, न ही उपलब्ध)।
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