मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो चीन का कारोबार बुरे दौर से गुजर रहा था- सांकेतिक तस्वीर
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मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो चीन का कारोबार बुरे दौर से गुजर रहा था। चीन की विकास दर 10-11 प्रतिशत से फिसल कर सीधे 7.5 प्रतिशत पर आ गई थी। उनका कारोबार चौपट हो रहा था। कारखाने बंद हो रहे थे क्योंकि चीन की कम्युनिस्ट सरकार लगातार मजदूरी बढ़ा रही थी।
इससे माल की लागत भी बढ़ रही थी, इसलिए चीनी कारोबारी अपनी रणनीति बदलना चाहते थे। वे चाहते थे कि कुछ ऐसा हो जाए कि हम अपने कारखानों में माल बना कर उन्हें दूसरे देश में बेचें इससे अच्छा है कि हम अपना कारखाना ही उस देश में ट्रांसफर कर दें।
भारत जैसे देश में लेबर बहुत सस्ता है और नीतियां बहुत लचकदार. नेताओं को पैसा खिलाओ और कोई काम करवा लो। वहां लाल सलाम वालों का डंडा नहीं चलता। चीन के पास पैसे यानी नगद मुद्रा भंडार की भी कोई कमी नहीं थी।
चीन के लोकल बैंक और सरकारी एजेंसियां विदेशी कारोबार में निवेश को तैयार थीं। चीन को अपनी 'आउटडेटेड' मशीनों और निवेश के लिए बढ़ा विदेशी बाज़ार चाहिए। इस लिहाज से भारत उसके लिए सबसे मुफीद देश था। पाकिस्तान, नेपाल, बाग्लादेश, श्रीलंका, वियतनाम जैसे देशों में तो ये काम पहले ही शुरू हो चुका था।
इधर भारत के उद्योगपतियों ने भी चीनी निवेशकों को हाथों हाथ लिया। भारत के कारोबारी एक तरह से जड़ता का शिकार हैं, न उनके पास नई मशीनें हैं न कुशल कामगार और न कोई विजन. वह बस शेयर मार्केट का खेल जानते हैं।
‘मेक इन इंडिया’ से चीनी उत्साहित हुए- सांकेतिक तस्वीर
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उद्योगों की कर्मचारी यूनियनें छुटभैया नेताओं के हाथों में खेलती है। उद्योगपति मोटा चंदा देकर राजनीतिक दलों से नीतियों में अपने हिसाब से आसानी से बदलाव करा सकते हैं। चीनी निवेशकों ने हमारे उद्योगपतियों को आफर दिया-हम तुम्हें कम ब्याज पर न केवल लम्बे समय के लिए लोन देंगे बल्कि चीनी मशीनें भी देंगे, वह भी बहुत कम दाम पर।
यानी ऐसी मशीनें जो आम अमेरिका या यूरोप से पांच गुना ज्यादा कीमत पर खरीदते हैं। आप चाहेंगे तो ये मशीनें भी उधारी पर दे देंगे। भारतीय कारोबारियों को ये आफर डूबते जहाज को तिनके का सहारा जैसे लगा।
ऐसे माहौल में मोदी ने लाल किले से 15 अगस्त के भाषण में ‘मेक इन इंडिया’ तथा ‘जीरो डिफेक्ट: जीरो इफेक्ट’ की नीति का बिगुल बजाया. भारत के वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के संयुक्त प्रयास से स्पेन, बर्लिन, दोहा, जेद्दाह, इस्लामाबाद, सिडनी, श्रीलंका, बैंकाक, जकार्ता, काबुल समेत तमाम देशों और उनके दूतावासों में 'मेक इन इंडिया' को प्रमोट करने के कार्यक्रम हुए. लेकिन इसमें सबसे ज्यादा दिलचस्पी अगर किसी ने दिखाई तो वह चीनी ड्रेगन था।
इनमें तमाम ऐसी कंपनियां थीं जिनके नाम कंपनियों की फॉर्च्यून 500 की लिस्ट में है। जैसे स्टेट ग्रिड, बैंक ऑफ चाइना, डॉंगफेंग इलैक्ट्रिक कॉरपोरेशन, एवीआईसी इंटरनेशनल, ह्यूवेई, टीबीईए, फोसुन आदि. इनमें अधिकांश कंपनियां सरकारी थी जिसकी कमाई से चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी फलती फूलती है।
‘मेक इन इंडिया’ से चीनी इतने उत्साहित हुए कि एक चीनी मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि 'मेक इन इंडिया' और 'मेक इन चाइना' का विलय चाहते हैं। बेशक चीन के इस प्रस्ताव के पीछे कोई छिपा हुआ एजेंडा था? लेकिन हमारे कूटनीतिज्ञ इसे समझ नहीं पाए.
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