फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नेहरू बनाम मोदी और चीन-10: अलीबाबा और चालीस चीनी चोर की कहानी

सार

भारत की मेक इन इंडिया जैसी उदारवादी नीतियों से तो जैसे इनकी लाटरी लग गई। भारत में स्टार्ट अप का दौर शुरू हो रहा था। इसमें आप बिजनेस का कोई नया और नायाब ऑनलाइन आइडिया लेकर आइए और पैसा लगाने के लिए अलीबाबा जैसी चीनी कंपनी तैयार बैठी थी। लेकिन इसी के साथ अलीबाबा बड़ी चालाकी से चुपचाप भारत की मीडिया में दाखिल हो गया।
विज्ञापन
लद्दाख सीमा पर चीनी सेना की जिद और चीन के खिलाफ आम जनता का गुस्सा देखते हुए भारत सरकार ने दबाव बनाने के लिए पहले 59 और अब 47 यानी 106 चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

लद्दाख सीमा पर चीनी सेना की जिद और चीन के खिलाफ आम जनता का गुस्सा देखते हुए भारत सरकार ने दबाव बनाने के लिए पहले 59 और अब 47 यानी 106 चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया। ये एप्स मोबाइल फोन के जरिए घर-घर में घुस गए थे, लेकिन ये प्रतिबंध ऊंट के मुंह में जीरे की तरह हैं।

विज्ञापन


पिछले पांच सालों में चीन ने भारत की अर्थव्यवस्था में अपनी जड़ें काफी नीचे तक जमा ली हैं, जिन्हें भारत के लिए एकदम से बाहर निकाल पाना आसान नहीं। ऐसी ही एक बड़ी चाइनीज टेक कंपनी है-अलीबाबा। इसके अरबी नाम पर मत जाइए। ये चीन की एक बहुत बड़ी कंपनी है।

इसका दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन बाजार है। जहां साठ करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं, बाकी आनलाइन कंपनियां फुटकर सामान घर-घर पहुंचाती है जबकि अलीबाबा की साइट होलसोल माल की बिक्री करती है। अगर आप अखबार छापने की करोड़ों रुपए की मशीन ऑनलाइन मंगाना चाहते हैं तो अलीबाबा हाजिर है।
विज्ञापन


अलीबाबा दुनिया में अमेजन और ईबे दोनों को मिला दें तो उससे भी ज्यादा माल ऑनलाइन बेचता है। इस कंपनी का इतिहास पंद्रह साल से ज्यादा पुराना नहीं है। अलीबाबा के चीनी मालिक का नाम है-जैक मा। जैक मा की उम्र होगी कोई 55 साल। वह चीन में एक स्कूल मास्टर था।

कहते हैं जैक एक दफा अमेरिका गया, उसने ऑनलाइन चीनी बियर मंगानी चाही तो पता चला कि अमेरिका में चीनी बियर ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है। तभी उसे लगा कि ऑनलाइन के धंधे में अभी बहुत संभावनाएं हैं। उसने टीचरी छोड़कर चीन में ऑनलाइन धंधा शुरू कर दिया। तब चीन में तो ऑनलाइन धंधा न के बराबर था, क्योंकि चीनी कंस्टमर, उत्पादन कंपनियों पर भरोसा नहीं करते थे।

अलीबाबा भरोसे की डोर बन गया। उसने ऐसा ऑनलाइन टूल बनाया कि जिससे चीन के लोग सुरक्षित और सस्ती खरीदारी कर सकते थे। अलीबाबा ने दोनों को पेमेंट की सुरक्षा का गारंटी दी। उसने अपनी कंपनी का कोई चीनी नाम नहीं रखा। उसने अरबी नाम रखा अलीबाबा।

भारत की मेक इन इंडिया जैसी उदारवादी नीतियों से तो जैसे इनकी लाटरी लग गई...

अलीबाबा ने मोबाइल और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर UC Web नाम की एक कंपनी खोली जिसे बाद में अपने UC Browser से जोड़ दिया- फाइल फोटो - फोटो : iStock
अलीबाबा असल में ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ नाम की मशहूर कहानी का मशहूर किरदार है। यह कहानी अरब की मशहूर किताब वन थॉउजेंट एंड वन नाइट्स’ शनी ‘एक हजार एक रातें' में संकलित कहानी का हिस्सा है। 'अलीबाबा डॉट कॉम' ने अपना नाम यहीं से मिला। अब ये करीब 15 अरब डॉलर की कंपनी है।

चीन ने ऐसी नीतियां बनाई कि बाहरी कंपनियां चीन में अपना कारोबार न फैला सकें, इसलिए चीनी कंपनियों ने खूब पैसा कमाया। जब चीन में संभावनाएं कम हो गईं तो इन कंपनियों ने बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे पड़ोसी देशों में पांव फैलाने शुरू कर दिए।

भारत की मेक इन इंडिया जैसी उदारवादी नीतियों से तो जैसे इनकी लॉटरी लग गई। भारत में स्टार्ट अप का दौर शुरू हो रहा था। इसमें आप बिजनेस का कोई नया और नायाब ऑनलाइन आइडिया लेकर आइए और पैसा लगाने के लिए अलीबाबा जैसी चीनी कंपनी तैयार बैठी थी। लेकिन इसी के साथ अलीबाबा बड़ी चालाकी से चुपचाप भारत की मीडिया में दाखिल हो गया।

अलीबाबा ने मोबाइल और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर UC Web नाम की एक कंपनी खोली जिसे बाद में अपने UC Browser से जोड़ दिया। कंपनी का शुरूआती निवेश 50 मिलियन डॅालर था जो तीन साल में बढ़कर 200 मिलियन डालर तक पहुंच गया।

UC Browser के इंडिया हैड थे डेमोन शी। वे आमतौर पर चीन में रहते थे और अपना एक चीनी प्रतिनिधि यहां इंडिया में रखते थे। इन्होंने गुरुग्राम में एक दफ्तर खोला जिसमें कुछ पत्रकार, आईटी और एमबीए के लड़के रखे। लेकिन इन छोटे पत्रकारों को आउट सोर्स पर रखा गया। पर इन सबको इनकी हैसियत से कहीं ज्यादा सेलरी दी गई। लेकिन UC Browser की कोर टीम सीधे अलीबाबा के पेरोल पर थी।
विज्ञापन

यह भी कहा गया कि UC Browser का इंडिया हैड डेमोन शी जब भारत आता था, तो वह अपने यहां रहने का गलत पता देता था..

न्यूज सर्विस के लिए UC Browser ने शुरू में मीडिया हाउस को पैसा भी दिया- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
इन पत्रकारों की सेलरी लाखों में थीं। इन्हें अलीबाबा कंपनी के महंगे शेयर भी दिए गए। इन्होंने UC Browser में तमाम भारतीय मीडिया वेबसाइटों से खबरें अपने एप के जरिए मोबाइल फोन पर देनी शुरू कर दीं।  न्यूज सर्विस के लिए UC Browser ने शुरू में मीडिया हाउस को पैसा भी दिया। बाद में उन्हें पैसा देना बंद कर दिया क्योंकि तमाम मीडिया हाउस की खबरों के हिट्स आसमान छूने लगे थे।

वेबसाइटस के हिट्स बढ़ रहे थे सो उन्होंने परवाह भी नहीं की और मुफ्त में खबरें देने लगे। यूजर भी खुश था क्योंकि UC Browser के जरिए उसे उसके फोन पर एक जगह सभी वेबसाइटों की पल पल की खबरें मिलना शुरू हो गईं। इस एप को डाउनलोड करते ही मोबाइल फोन यूजर का सारा डाटा चीनी सर्वर पर चला जाता। इसमें उसके रोजमर्रा के बैंक लेनदेन से लेकर उसके पासवर्ड तक का डाटा शामिल होता।

Browser कंपनी कंटेंट जेनेरेश और सर्विस प्रोवाइडिंग के मामले में नंबर-1 बन गई है। इसके भारत में 13 करोड़ से ज्यादा यूजर हो गए। इसी कंपनी के एक पत्रकार ने बाद में UC Browser की "कथित देश विरोधी" कारस्तानियों का खुलासा करते हुए कंपनी पर मुकदमा ठोंक दिया।

यह भी कहा गया कि UC Browser का इंडिया हैड डेमोन शी जब भारत आता था, तो वह अपने यहां रहने का गलत पता देता था। वह भारत में महीनों रहा करता था। कहां रहता था क्या करता था, ये किसी को पता नहीं। यही नहीं UC Browser  केवल चुनी हुई खबरें ही प्रसारित करता है। अगर कोई खबर चीन से जुड़ी है तो पेंगिंग से अप्रूवल के बाद ही प्रसारित होगी, लेकिन इसके पीछे की असली कहानी इससे भी ज्यादा दिलचस्प है...

जारी...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें