नर्मदा घाटी भारतीय प्रागैतिहासिक अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। इस घाटी से विभिन्न कालखंडों के मानव बसाहट, पाषाण उपकरणों तथा सांस्कृतिक विकास के साक्ष्य प्राप्त होते हैं। इसी क्रम में खण्डवा जिले में नर्मदा नदी की सहायक नदियों कनेरी एवं खारी के संगम क्षेत्र के निकट व नर्मदा पैदल परिक्रमा क्षेत्र में स्थित जयंती माता मंदिर के आसपास एक महत्वपूर्ण पाषाणकालीन पुरास्थल की पहचान की गई है। यह खोज दिल्ली विश्वविद्यालय के शहीद भगत सिंह कॉलेज के सहायक आचार्य डॉ. शुभम केवलिया, सिमरन साम्भी (अन्वेषण अधिकारी, असम राज्य पुरातत्व विभाग), गौरव गुप्ता (शोध छात्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) तथा अंकित सरिया (शोध छात्र, विक्रम विश्वविद्यालय) द्वारा किए गए सर्वेक्षण के दौरान हुई।
सर्वेक्षण के परिणामों से ज्ञात होता है कि यह स्थल लगभग 6 किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है तथा इसमें पाषाण उपकरण निर्माण से संबंधित अनेक गतिविधियों के प्रमाण विद्यमान हैं। स्थल पर तीन प्रमुख सांस्कृतिक क्षेत्रों की पहचान की गई, जहाँ बड़ी मात्रा में पाषाण उपकरण, अपशिष्ट पदार्थ तथा कोर प्राप्त हुए हैं। इन साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र केवल उपकरणों के उपयोग का स्थान नहीं था, बल्कि उपकरण निर्माण गतिविधि का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा।
पुरास्थल से प्राप्त पुरावशेषों में कोर व फ्लेक द्वारा निर्मित चॉपर-चॉपिंग, हैंडऐक्स, क्लीवर, डिस्कॉइडल/ रेडियल कोर व फ्लेक, स्क्रेपर तथा लघुपाषाण उपकरण प्रमुख हैं। इन उपकरणों की तकनीकी व प्रारूपकीय विशेषताएँ निम्न पुरापाषाण, मध्य पुरापाषाण, उच्च पुरापाषाण तथा लघुपाषाण परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। जिससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में मानव गतिविधियां लंबे समय तक निरंतर रूप से संचालित होती रहीं होगी। उपकरणों के निर्माण में स्थानीय रूप से उपलब्ध पाषाण सामग्री का उपयोग किया गया है । इनमें क्वार्टजाइट, चर्ट और ग्रेनाइट प्रमुख हैं।
पुरास्थल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहां विभिन्न कालखंडों की तकनीकी परंपराएं एक ही क्षेत्र में परिलक्षित होती हैं। इससे मानव तकनीक के विकास, संसाधनों के उपयोग तथा सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं को समझने में सहायता मिलती है। नर्मदा घाटी में पूर्व में प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्यों के संदर्भ में यह खोज विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यह क्षेत्रीय सांस्कृतिक निरंतरता और मानव बसाहट के नए आयाम प्रस्तुत करती है। इससे पूर्व इंदिरा सागर बांध बनने के दौरान नर्मदा नदी के दक्षिण तट के किनारों पर सघन सर्वेक्षण किया गया था जिससे कई पुरास्थल प्रकाश में आए थे।
परन्तु निमाड़ में नर्मदा के उत्तरी तट पर किया गया यह सर्वेक्षण व खोज अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उत्तरी तट पर कम ही पुरास्थलों कि जानकारी हमें है। इसके अतिरिक्त इस पुरास्थल के पंद्रह से सोलह किलोमीटर के क्षेत्र से हमे विभिन्न स्थानों से पाषाण काल के उपकरण प्राप्त होते है , जो संभवत इस पूरे क्षेत्र को एक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक गतिविधि के केंद्र के रूप में रेखांकित करते हैं।
शोधकर्ताओं द्वारा स्थल का विस्तृत अभिलेखन, मानचित्रण तथा प्रारंभिक विश्लेषण किया गया है। भविष्य में व्यवस्थित उत्खनन, भू-पुरातात्त्विक अध्ययन तथा वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण तकनीकों के माध्यम से इस स्थल के कालक्रम और सांस्कृतिक महत्व को और अधिक स्पष्ट किया जा सकेगा। यह खोज न केवल नर्मदा घाटी के प्रागैतिहासिक अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान देगी, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में पाषाणकालीन मानव के सांस्कृतिक विकास और तकनीकी प्रगति को समझने के लिए भी एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगी।
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