महिंदा राजपक्षे- रानिल विक्रमसिंघे
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श्रीलंका में भी उठ रहे हैं सवाल
स्पीकर के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ तमिल नेशनल एलाइंस और श्रीलंका मुस्लिम कांग्रेस ने आपत्ति दर्ज़ कराई है। स्पीकर इस पर शुक्रवार को निर्णय लेंगे। दोनों पार्टियों का आरोप है कि महिंद्रा राजपक्षे 2015 के चुनाव में यूनाइटेड पीपल्स फ्रीडम एलाइंस की ओर से संसद के लिए चुनाव जीते थे। इसके बाद इसे छोड़कर नई पार्टी श्रीलंका पीपुल्स पार्टी की सदस्यता ले ली। उसके सदस्य रहते वे विपक्ष का नेता कैसे बन सकते हैं।
दिखने में यह भी असंसदीय फ़ैसला लगता है। सिरिसेना का हालिया रवैया हैरत में डालने वाला है। उन्होंने रानिल विक्रमसिंघे की ओर से भेजी गई 36 मंत्रियों की सूची में से 8 नाम काट दिए। अब रानिल विक्रमसिंघे केवल 28 मंत्रियों को शपथ दिलाने जा रहे हैं। यह सिद्ध करता है कि दोनों खेमों ने तलवारें म्यान में नहीं रखीं हैं।
भारत और चीन के लिए सबक
इस घटनाक्रम का सबक़ भारत और चीन के लिए है। मालदीव में चीन ने लोकतान्त्रिक ढांचे में दखल दिया। उसमें भी मुंह की खानी पड़ी। अब श्रीलंका में भी उसे बड़ा झटका लगा है। इसके बाद भी उसकी चालबाज़ी थम नहीं रही है। आर्थिक विस्तार की जल्दबाज़ी में चीन जिस तरह खिलवाड़ कर रहा है, उसे छोटे देश समझने लगे हैं। वे चीन से दूर रहना चाहते हैं और भारत से भरोसेमंद रिश्ते चाहते हैं। अफ़सोस कि भारतीय विदेश नीति को इन दिनों लकवा लग चुका है। पास पड़ोस के घटनाक्रम से कोई पाठ सीखने की चाहत भारत के भीतर नहीं दिखाई दे रही है।
वर्तमान प्रधानमंत्री बार-बार चीन जा रहे हैं और अनौपचारिक चर्चाएं कर रहे हैं, लेकिन चीन के रवैए में कोई सुधार नहीं है। यह संकेत है कि भारत के साथ चीन के संबंध बीते बरसों में बहुत आगे नहीं बढे़ हैं। भारत को अभी भी सिरिसेना-राजपक्षे गठजोड़ पर बारीक़ नज़र रखनी होगी। उसे समझना होगा कि पाकिस्तान और चीन भारत विरोध को आधार बनाकर एशिया महाद्वीप की राजनीति को अस्थिर करने का कुचक्र रच रहे हैं। इसके दूरगामी परिणाम ख़तरनाक़ हो सकते हैं।
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