गांधी जयंती की शुभकामनाएं
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गांधी को शायद यह पता था कि नशें में पगलायी इस विचार के कभी वे स्वयं भी शिकार हो सकते है। फिर भी उनसे मिलने, संवाद करने और उनकी बनायी मांद में घुसकर अपनी बात कहने का साहस गांधी जैसे विरले किसी में होता है। गांधी लन्दन में दशहरे के दिन 24 अक्टूबर 1909 को सावरकर समर्थकों की एक अतिवादी समूह के बुलावे पर आयोजित समारोह में शामिल हुए।
उस समारोह की दो शर्तें थीं। भोजन शाकाहारी होगा, दूसरी यह कि किसी विवादास्पद राजनीति पर चर्चा नहीं होगी। पर हुआ उसके ठीक उल्टा। दो प्रतिस्पर्धी विचारों की टकराव की वह शुरुआत थी। कहा जा सकता है कि भविष्य के भारत में दो सर्वथा भिन्न विचारों के राजनीति शुरुआत। उस समारोह में पहले गांधी को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया।
गांधी ने रामायण कथा के हवाले से वनवास के दौरान राम की पीड़ा, पत्नी सीता की सहनशीलता और छोटे भाई लक्ष्मण के संयम का उल्लेख करते हुए कहा कि -"अगर हिन्दुस्तानी उस ढंग से जीना सीख लेते हैं; तो वे उसी क्षण से स्वयं को स्वतंत्र मान सकते हैं।" यह झूठ पर सच्चाई की नई विजय का स्रोत होगा। सावरकर ने अपने भाषण में अन्याय और दमन के प्रतीक रावण के बध को जरूरी बताया।
स्पष्ट तौर पर विवादास्पद राजनीति की चर्चा के बहाने ही गांधी और सावरकर राजनीति के उस मर्म तक पहुंचे - जो भारत के भविष्य की राजनीति में आगे होनी थी।
भारत आने के बाद महात्मा गांधी सन् 1927 में जब रत्नागिरी में सावरकर से मिलकर बाहर निकल रहे थे, तब भी गांधी को एक तरह से आगाह करते हुए सावरकर ने कहा कि "आप जो प्रयोग कर रहे है उसकी बड़ी कीमत देश को एक दिन चुकानी पड़ेगी।" तब गांधी ने सावरकर से कहा कि " आपके और मेरे रास्ते अलग- अलग हैं। फिर भी यह प्रयोग मैं करता रहूंगा।" अन्ततः वैचारिक नशे के शिकार एक ऐसे ही पागल व्यक्ति नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दिया।
शायद उसको नहीं मालूम कि गांधी देह की हत्या भले उसने कर दिया हो, गांधी विचार की हत्या किसी के बूते की की बात नहीं।यह भी कहा जाता है कि गांधी अपने हत्यारे के साथ भी एक सप्ताह बिताना चाहते थे।गांधी के ऐसे प्रयोगों को ही सत्य के के साथ मृत्यु के प्रयोग की संज्ञा दी जा सकती है।
अमरीकी लेखक जेम्स डगलस के इस बात से सहमत होने की प्रयाप्त गुंजाइश है कि "आज हत्या की राजनीति दुनिया के विपरीत हिस्सों में परीक्षा ले रही है। अगर सत्य और प्रेम के बल पर उससे मुक़ाबला करने का साहस हममें हैं जैसा कि गांधी ने किया था, तो उम्मीद की जीत होगी।"
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