महात्मा गांधी को हम सभी राष्ट्रपिता संबोधित करते हैं। जब भी उनके इस संबोधन पर गहराई से विचार करता हूं तो राष्ट्र से जुड़े उनके आदर्श और सभी को साथ लेकर चलने की उनकी उदात्त दृष्टि जहन में कौंधने लगती है। मैं यह मानता हूं कि यह गांधी ही थे जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते हुए उसे भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों से जोड़ा।
राष्ट्र के रूप में हमारे देश का विकास केवल यहां के भू-भाग और किसी राजनैतिक सत्ता के अस्तित्व के कारण नहीं बल्कि पांच हजार से भी अधिक पुरानी हमारी संस्कृति के कारण हुआ है। एक बड़े भू-भाग में भाषा, क्षेत्रों की परम्पराओं में वैविध्यता के बावजूद इसीलिए हमारे सांस्कृतिक मूल्य निरंतर जीवंत रहे हैं।
गांधीजी ने आजादी के आंदोलन में इसी सांस्कृतिक जीवंतता को अहिंसा और नैतिक जीवन मूल्यों से जोड़ा। यही उनका वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था जिसमें देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने हेतु आंदोलनों का नेतृत्व करते उन्होंने राष्ट्र को सांस्कृतिक दृष्टि से एक किया।
सांस्कृतिक एकता हमारे देश की राष्ट्रीय पहचान की सभ्यतामूलक दृष्टि है। यही असल में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। इसी में अनेकता में एकता के बीज अंकुरित होते हैं। महात्मा गांधीजी ने देश की विविधता की ताकत को पहचानते हुए समानता की सोच के साथ राष्ट्र को आजादी आंदोलन के लिए एकजुट करने का कार्य किया।
राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने अपने आंदोलनों में जन-जन की भागीदारी सुनिश्चित की। उनके लिए स्वाधीनता केवल अंग्रेजोंं की गुलामी से मुक्ति तक सीमित नहीं थी बल्कि पूरे देश में स्वराज की स्थापना पर उनका जोर था, इसीलिए स्वदेशी को अपनाने के बहाने उन्होंने राष्ट्र और उससे जुड़ी वस्तुओं, संस्कृति से प्रेम करने की राह भी सुझाई।
गांधीजी का यह पक्ष भी मुझे हमेशा से प्रभावित करता रहा है कि राजनीति को दूसरे पक्ष के विरोध की बजाय उन्होंने सृजन और सहनशीलता से जोड़ा। चरखे पर सूत कातने, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना दूसरे पक्ष का विरोध नहीं, सत्याग्रह, सहनशीलता यह सब प्रत्यक्षतः सृजन सरोकार ही थे। आजादी के आंदोलन में देश के लोगों में परस्पर सद्भाव जगाते जन-मानस में सकारात्मक बदलाव की उन्होंने पहल की। यह एक तरह से उनके द्वारा देश में गुलामी के दौर में भी लोकतांत्रिक संस्कृति का विकास करने जैसा था।
न्यायसंगत राजनीति का उनका मूल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़ा इसीलिए प्रतीत होता है कि वहां भारतीय संस्कृति के अनुरूप विपक्षी पक्ष पर उसके अनैतिक कृत्यों के कारण क्रोध नहीं कर उसे सहन करने की क्षमता विकसित किए जाने पर जोर दिया गया था।
अंग्रेज देश को लम्बे समय तक गुलाम रख जाने की कुटनीति जानते थे इसीलिए परस्पर लोगों को सम्प्रदाय, जातिवाद और मजहब के नाम पर लड़वाकर प्रायः लोगों को उग्र कर अनैतिक हिंसा के लिए उकसाते थे। इसकी आड़ में वह आजादी आंदोलन के लिए लड़ने वालों का भी दमन करते थे।
राज द्वारा बगावत को कुचलने का उनका यही नैतिक स्वरूप था। वर्षों तक गुलाम भारत में अंंग्रेज यही करते आ रहे थे इसीलिए आजादी बहुत बार मिलते-मिलते रह जाती थी, पर गांधीजी ने चंपारण सत्याग्रह के जरिए आजादी आंदोलन में इस तरह से राजनीतिक प्रवेश किया कि तब उनके नेतृत्व में लोगों ने न तो राज्य के विरूद्ध हिंसा की न बगावत की।
नील आंदोलन में ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधीजी को जब प्रतिबंधित किया गया तो 1917 में उन्होंने न्यायाधीश के समक्ष अपनी जो बात रखी, वह आज भी मन में कौंधती है। उन्होंने कहा, 'कानून को मैंने तोड़ा है, इसके लिए आप मुझे सजा दे सकते हैं परन्तु मेरा अधिकार है कि मैं अपने देश में कहीं भी आ-जा सकता हूं।'