1990 के दशक के पहले उत्तरार्ध में राजनीतिक हलको में यह तय हो गया कि राज ही बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी बनेंगे,
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राज ठाकरे की शिवसेना से दूरियां
दूसरी ओर भतीजे राज ठाकरे भी हर लिहाज से चाचा के प्रतिरूप माने जाते थे। चाल-ढाल, पहनावा, बातचीत और भाषण की शैली भी समान हैं। वही बात लोगों को राज ठाकरे में भी दिखती थी। राज ठाकरे बचपन से अपने चाचा की रैलियों में जाते थे।
सीनियर ठाकरे की ही छत्रछाया में उन्होंने राजनीति की एबीसीडी सीखी, इसीलिए बाल ठाकरे और राज ठाकरे में बहुत समानता थी। दोनों धमकी की भाषा में बात करते थे। दोनों के भाषण ऊबाऊ नहीं बल्कि हास्य का पुट लिए होते थे। इतना ही नहीं राज बाल ठाकरे की तरह ही बेहतरीन कार्टूनिस्ट हैं। वह तो शिवसेना के मुख पत्र सामना में नियमित रूप से कार्टून बनाते थे।
श्री राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवादास्पद ढांचे को ढहाए जाने के मुंबई मुंबई में हुए दंगे के दौरान राज ठाकरे के कार्टूनों ने आग में घी डालने का काम किया था। बाल ठाकरे जहां दंगे में अपने भाषण से विवाद में आए, वहीं राज ठाकरे अपने कार्टूनों को लेकर चर्चा में रहे और सामना अपनी विस्फोटक खबरों के कारण चर्चा में रहा। इन तीनों का जिक्र दंगे की जांच करने वाले श्री कृष्ण आयोग की रिपोर्ट में किया गया है।
1990 के दशक के पहले उत्तरार्ध में राजनीतिक हलको में यह तय हो गया कि राज ही बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी बनेंगे, क्योंकि तब तक उद्धव ठाकरे राजनीति में बिल्कुल सक्रिय नहीं थे। लेकिन 1995 में शिवसेना-भाजपा के भगवा गठबंधन की सरकार बनने के बाद उदधव ठाकरे धीरे-धीरे सक्रिय होने लगे।
इसका अंदेशा राज को नहीं था, लेकिन जब 1997 के बीएमसी चुनाव में उनके समर्थकों का टिकट कट गया, तब राज के कान खड़े हो गए। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। टिकट वितरण में हाशिए पर रखे जाने से राज ठाकरे काफी आहत हुए। उसके बाद तो शिवसेना धीरे-धीरे दो खेमों में बंट गई।
बीएमसी चुनाव में बाल ठाकरे की सहमति से अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी का नेतृत्व उद्धव ने किया और शिवसेना ने बीएमसी का चुनाव लिया। इसके बाद पार्टी शिवसेना संगठन में भी उद्धव की पकड़ मजबूत होने लगी। नई सहस्त्राब्दी में शिवसैनिकों को भी बात समझ में आने लगी थी कि भविष्य में नेता उद्धव ही होंगे।
उद्धव ठाकरे का 2019 विधानसभा चुनाव के बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाकर सेक्यूलर व्यवहार करना आत्मघाती साबित हुआ।
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इसके बाद राज ठाकरे की अपने चाचा से दूरी बढ़ने लगी और मीडिया में ठाकरे में मतभेद की ख़बरे आए दिन छपने लगी। दरअसल, बाल ठाकरे लगा कि राज को उत्तराधिकारी बनाएंगे तो उनके अपने बेटे उद्धव के साथ अन्याय होगा। बस यहीं वह पुत्रमोह के शिकार हो गए।
पुत्रमोह में फंसकर उन्होंने भतीजे राज की जगह अपने सगे बेटे उद्धव को पार्टी की कमान सौंप दी। बालासाहेब तो राज ठाकरे को अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे और राज को राजनीति के सारे दांव-पेंच भी सिखाए। लेकिन जब उत्तराधिकारी चुनने की बाद आई तो उन्होंने अपने बेटे को तरजीह दी।
इससे धीरे-धीरे राज ठाकरे पार्टी में हाशिए पर चले गए। 2006 में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया। एमएनएस ‘मराठी’ और ‘भूमिपुत्र’ विचारधारा पर आधारित थी। 2008 में उत्तरभारतीयों पर हमले के कारण राज ठाकरे राष्ट्रीय स्चर पर चर्चित हुए।
इसके बाद तो उनकी पार्टी शिवसेना के विकल्प के रूप में उभरीने लगी। उसी साल एमएनएस ने पुणे, नासिक, मुंबई और ठाणे के स्थानीय निकाय के चुनाव में ज़बरदस्त उपस्थति दर्ज कराई। 2009 के विधान सभा चुनाव में राज ठाकरे ने 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और शिवसेना-भाजपा गठबंधन को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। उस साल उनके 13 विधायक चुने गए। तीन साल पुरानी पार्टी को यह शानदार प्रदर्शन था।
उद्धव ठाकरे का 2019 विधान सभा चुनाव के बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाकर सेक्यूलर व्यवहार करना आत्मघाती साबित हुआ। पहली बात तो उद्धव आम शिवसेना कार्यकर्ता से कट गए और उनके कार्यकाल में ही पालघर में दो हिंदू साधुओं की पीटपीट कर हत्या से शिवसैनिक ही विचलित हुए।
उद्धव ने साधुओं को भीड़ के हवाले करने वाले पुलिसवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न कर सके। उद्धव सरकार ने जब हिंदू आतंकवाद की थ्यौरी गढ़ने वाले हेमंत करकरे की टीम परमबीर सिंह को मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाया तो सभी हैरान रह गए। परमबीर ने मालेगांव बमकांड में साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर और कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित समेत कई में लोगों को आतंकवादी करार देकर गिरफ्तार करके भयानक रूप से टॉर्चर किया था।
उद्धव ठाकरे सरकार तब भी चर्चा में रही जब उनकी पुलिस ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के 66 दिन बाद भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं कर पाई और उनके पार्थिव शरीर का आनन-फानन में अंतिम संस्कार करवा कर सबूत ही नष्ट कर दिया और केस की सीबीआई जांच का विरोध करने लगी।
इसी तरह हिंदूवादी इमैज वाली अभिनेत्री कंगना राणावत के दफ़्तर को बीएमसी ने बुलडोजर चलावा कर उनकी सरकार ने एक और अलोकप्रिय कार्य किया। मस्जिदों में लाउडस्पीकर का विरोध करने और मंदिरों को लाउडस्पीकर बांटने वाले भाजपा नेता मोहित कंबोज भारतीय के खिलाफ बदले की कार्रवाई शुरू करके शिवसेना ने अपनी छवि हिंदू विरोधी बना ली।
जाहिर है इन सारे ही कामों से विधायकों को तो यह डर सताने लगा कि कहीं उद्धव के सेक्लूयरिज्म के चक्कर में उनका राजनीतिक कैरियर ही न खत्म हो जाए। लिहाजा, शिवसैनिकों के साथ साथ विधायकों और सांसदो का भी पार्टी में दम घुटने लगा। इसीलिए जब महाराष्ट्र में शिवसेना में बग़ावत की खबर आई तो किसी को हैरानी नहीं हुई। उद्धव ठाकरे सत्ता में आने के बाद जिस तरह से हिंदुत्व की बात करने वाले लोगों को एक-एक करके निशाना बना रहे थे, उससे राज्य में शिवसेना का असली आधार ही खिसक गया था।
हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे के एक आदेश पर सड़क पर निकलने वाले शिवसैनिक पिछले ढाई साल से देख रहे थे कि उनकी अपनी सरकार का विचारधारा से उलट काम हो रहा है। इसका असर शिवसेना विधायकों पर सबसे अधिक हुआ, उन्हें लग गया कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में वे अगला चुनाव नहीं जीत पाएंगे। अब उद्धव ठाकरे शाखाओं का दौरा कर रहे हैं, लेकिन अब तो बहुत देर हो गई। उन पर यही कहावत फिट बैठती है कि अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
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