दरअसल, राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व पिछले पांच साल के दौरान राज्य पा नेतृत्व पर बुरी तरह हावी रहा और हर फैसले दिल्ली से ही लिया जाने लगे थे। इसका भी असर चुनावी रुझानों पर दिख रहा है।
लोकसभा चुनाव के रुझान से यह साफ दिख रहा है कि शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को तोड़ना महाराष्ट्र में मराठी जनमानस को बिल्कुल भी रास नहीं आया। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह कदम कम से कम महाराष्ट्र में बड़ा आत्मघाती साबित होता दिख रहा है। इतना ही नहीं ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के हव्वा का केवल विपक्ष पर इस्तेमाल करना और उन्हें अपनी ओर करने के लिए इस जांच एजेंसी के उपयोग का फैसला भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए प्रतिकूल परिणाम लेकर आ रहा है।
दरअसल, राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व पिछले पांच साल के दौरान राज्य पा नेतृत्व पर बुरी तरह हावी रहा और हर फैसले दिल्ली से ही लिया जाने लगे थे। इसका भी असर चुनावी रुझानों पर दिख रहा है। इसके अलावा कांग्रेस नेता राहुल गांधी का भारत जोड़ो यात्रा कुछ महीने पहले हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधान सभा चुनाव में भले अप्रभावी रहा हो, लेकिन दूसरे चरण में पैंट टीशर्ट पहने राहुल गांधी महाराष्ट्र में आए थे। इसका भी असर आम लोगों पर सकारात्मक असर हुआ।
इस बार चुनाव प्रचार के दौरान भी नरेंद् मोदी की तुलना में विपक्षी नेताओं की सभाओं में ज्यादा भीड़ उमड़ रही थी और अब लग रहा है कि वह भीड़ अंततः वोट में तब्दील हो गई। भाजपा के प्रचार में संसाधन झोंकने और बड़ी तैयारी के बावजूद उतनी भीड़ नहीं जुट सकी, वहीं वित्तीय अभाव के बावजूद इंडिया गठबंधन के नेताओं की सभाओं में खूब लोग आए। उद्धव ठाकरे और शरद पवार जहां भी गए वहां लोगों ने उनका इस तरह से स्वागत किया था जैसे उनके साथ वाकई अन्याय हुआ है।
चुनाव के पहले ही देश के दूसरे राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में राजनीति का प्रवाह विपरीत दिशा में था। यहां बदलाव साफ दिख रहा था, लेकिन लोग बोल नहीं रहे थे। उन संकेत पर चुनावी रूझानों ने मुहर लगा दी है। दरअसल, पिछले दो साल में जितनी राजनीतिक उथल-पुथल और टूट-फूट महाराष्ट्र में हुई, उतनी देश के किसी भी राज्य में नहीं हुई। इसलिए यहां के चुनावी नतीजों पर पूरे देश की निगाह थी।
पिछले दस साल में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई। इससे आम आदमी इस नरेंद्र मोदी सरकार से बहुत खुश नहीं था, क्योंकि महंगाई उसके जीनव को बुरी तरह प्रभावित कर रही थी। इस तरह कह सकते हैं कि महंगाई ने भी भाजपा के शासन में आम आदमी के जीवन को कष्टमय बना दिया था।
सामान्य मराठी जनमानस पर कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का कोई असर नहीं हुआ। कई राजनीतिक समीक्षकों का मानना था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का कांग्रेस के साथ गठबंधन करना आम शिवसैनिकों को रास नहीं आएगा, लेकिन वह आकल भी गलत साबित हो गया है।
भाजपा का अबकी बार चार सौ पार का नारा को कांग्रेस ने उलट दिया था। राहुल गांधी अपनी हर सभा में संविधान की प्रति लेकर जाते थे और कहते थे कि भाजपा लोकसभा की चार सौ सीट इसलिए चाहती है ताकि वह बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का लिखा संविधान बदल दे।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि भाजपा संविधान बदल कर आरक्षण खत्म करना चाहती है। लिहाजा, कांग्रेस के संविधान बचाओ नारे का महाराष्ट्र में व्यापक इंपैक्ट हुआ। यही वजह है कि पिछली बार लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 सीटों में से एनडीए ने 41 सीटों पर कब्जा किया था। अकेले भाजपा के खाते में 23 सीटें गई थीं।
इस बार ताजा रूझान में महाराष्ट्र में एनडीए 16 सीट (भाजपा 10, शिनसेना 5 और एनसीपी 1) सीट पर आगे है, जबकि कांग्रेस 12, यूटीबी 11 और शरद पवार 8 सीट पर आगे हैं। एक सीट सांगली पर निर्दलीय प्रत्याशी की बढ़त है। यह महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है। मुंबई और कोंकण, विदर्भ, पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र (खान देश),हर जगह भाजपा को नुकसान उठाना पड़ रहा है।