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"आम्ही 162" पवार के संकेत को समझ रही है केंद्र में बैठी भाजपा

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अजित पवार की सकुशल घर वापसी राजनीतिक दांव पेंच में पवार की ताकत को भी दर्शाता है।  - फोटो : PTI
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महाराष्ट्र की सियासत का सबसे नाटकीय दृश्य इस समय इतिहास में विलीन हो रहा है। सुबह का भूला अपने घर लौट रहा है जिसे भूला तो कहा जाएगा लेकिन महत्वाकांक्षा से भरा उसका सियासी कदम संभवतः महाराष्ट्र के इतिहास में अविस्मरणीय रहेगा।

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डिप्टी सीएम पद से 78 घंटे तक निष्क्रीय रहकर अजित पवार का इस्तीफा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और पारिवारिक विरासत के बीच खड़ी हुई सियासत की हार का भी प्रतीक है।
 


बहरहाल, मराठा क्षत्रप शरद पवार का भतीजे अजित पवार के प्रति सहानुभूति से भरा दिल उनके सियासी कद को और विशाल कर गया है जबकि अजित पवार की सकुशल घर वापसी राजनीतिक दांव पेंच में पवार की ताकत को भी दर्शाती है। 

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एक रात में एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के पैरों तले जमीन खिसका देने वाले घटनाक्रम में शरद पवार अपने पुराने पावर के साथ लौटे हैं। तीनों दलों के विधायकों का होटल हयात में शपथ लेना और आम्ही-162 की गूंज मोदी और शाह के सियासत करने के तरीके को भी चुनौती है। ये चुनौती देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की अस्मिता और केंद्र की मोदी खिलाफ शुरू हुआ अभियान भी है।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कल यानी की 27 नवंबर को बहुमत परीक्षण होना है। यदि फ्लोर पर भाजपा के हाथ कुछ नहीं लगता है तो उसके लिए वह सांकेतिक हार होगी (जो फडणीस के इस्तीफे और बयान के बाद स्पष्ट्र हो गया है कि भाजपा विपक्ष की भूमिका निभाएगी।) यकीनन उसकी छवि निश्चित रूप से दरकेगी। जबकि यह विजय जहां पवार को पावरफुल करेगी वहीं कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र में संजीवनी की तरह होगी।

यह भी संभव है कि शिवसेना अपने उग्र हिंदुत्व को कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व में मिलाकर महाराष्ट्र से ही नई राजनीति की शुरुआत करे। दिलचस्प बात होगी शरद पवार एक ऐसे सेतु के रूप में सामने आ सकते हैं जो शिवसेना-कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन को विस्तार दे और उसे महाराष्ट्र से निकालकर भाजपा के खिलाफ विकल्प के रूप में प्रस्तुत करे। 

महाराष्ट्र का सियासी घटनाक्रम और खासतौर पर शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी की आने वाले समय में बनने वाली सरकार ढलती क्षेत्रीय राजनीति में उभार भरने का काम करेगी। यही नहीं यदि तीनों दलों ने भाजपा की जोड़-तोड़ की राजनीति के खिलाफ मोर्चाबंदी करते हुए देशभर में माहौल बनाती है तो भाजपा के लिए यह दांव उल्टा पड़ना तय है। 

संभवतः तीनों दलों की महाराष्ट्र में बनी ये सरकार बिहार, यूपी और दूसरे कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के भीतर एक ऊर्जा भरेगी और इसका नेतृत्व कांग्रेस के लिए संभावना के नए दरवाजे भी खोल सकता है।  बशर्ते है कांग्रेस इस बात को समझ जाए कि क्षेत्रीय दलों का साथ उसे आगे बढ़कर देना होगा। एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते वह भाजपा से लड़ने के लिए एक नेतृत्व तैयार करे, जैसा कि सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने के प्रति दृढ़ निश्चय दिखाकर संकेत दिए हैं। 

तीसरे मोर्चे की आहट को यदि महाराष्ट्र की सियासत से जोड़कर भी देखा जाए तो गडकरी के बयान को नकारा नहीं जा सकता है कि राजनीति और क्रिकेट में सबकुछ संभव है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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