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महाराष्ट्र को मिली सरकार ,मतदाता को हार

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महाराष्ट्र में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया निभाई जा रही है,लेकिन राजनीतिक दलों को झटके लग रहे हैं। - फोटो : Amar Ujala
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महाराष्ट्र में छवियां चटक रही हैं। सारे पक्ष कसक में हैं। लोकतान्त्रिक प्रक्रिया निभाई जा रही है,लेकिन राजनीतिक दलों को झटके लग रहे हैं। हर दल को हालिया राजनीतिक घटनाक्रम से नुकसान हुआ। सरकार बनाने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी विजयी मुद्रा में नहीं है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी टूट के कग़ार पर है।
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शिवसेना के हाथ आई बाज़ी फिसल गई है। कांग्रेस अपने गले में देरी की फांस अटकी महसूस कर रही है। राजभवन पर गंभीर सवाल खड़े हैं और मतदाता ठगा हुआ सा सियासी शतरंज की चालें देखकर दंग है। यह कैसे गणतांत्रिक दौर में देश आकर खड़ा हो गया है ,जहां निर्वाचन के पीछे छिपे मौलिक सिद्धांतों का मख़ौल उड़ाने के सिवा कुछ नहीं हो रहा है।

आखिर कहां खड़ी एनसीपी?  
शुरुआत शरद पवार की पार्टी एनसीपी से। चार दशकों से अपने प्रदेश में चाणक्य की प्रतिष्ठा प्राप्त इस शिखर पुरुष को याद आ रहा होगा कि सारी उमर उन्होंने जो फसल बोई है अब वही विकराल आकार में उनके सामने खड़ी है। जिन तीरों से उन्होंने अपने विरोधियों को अक्सर पटखनी दी है ,अब चौथे पड़ाव पर वे उलटकर उन्ही की पार्टी को लग रहे हैं।
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दरअसल, अब सबसे अधिक संदेह के घेरे में वे ही हैं। अपने सगे भतीजे अजित पवार को चौबीस घंटे पहले उन्होंने पार्टी विधायक दल का नेता बनाया था और विधायकों की चिठ्ठी दी थी, वही चिट्ठी अब पार्टी पर हमला कर रही है। अगर अजित उन्हें छोड़कर गए हैं ,तो मानना होगा कि पार्टी पर पवार की पकड़ खिसक गई है।

 

महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे ज्यादा अकेली हो गई है शिवसेना - फोटो : Amar Ujala
अब यह दल दो फाड़ होता दिखाई दे रहा है। यह शरद पवार की छवि को करारा झटका है। अगर हम यह मान लें कि भारत के अन्य कुछ परिवारों की तरह उन्होंने भी अपने परिवार को दोनों गठबंधनों में पाँव जमाने का फ़ैसला  किया है ,तो इससे भी उनका राजनीतिक चेहरा कोई बहुत उज्जवल नहीं होता।

आम आदमी की समझ से परे है कि जब राज्य में सरकार नहीं है, एक दो दिन में आप अपनी सरकार का गठन करने जा रहे हैं तो किस डॉक्टर की सलाह पर आप किसानों की समस्या के बारे में प्रधानमंत्री से चर्चा करने गए थे ? गोपनीय कक्ष में कोई किसानों का या पार्टी का प्रतिनिधिमंडल नहीं,कोई ज्ञापन नहीं ,मीडिया में कोई सुर्खी नहीं तो ऐसी माफ़ कीजिए ऐसे मासूम तर्क को अब यह देश स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। 

शिवसेना के सियासी हालात 
शिवसेना की हालत तो और भी दयनीय है। बंधी मुठ्ठी लाख की ,खुल गई तो ख़ाक की वाली स्थिति हो गई। उद्धव ठाकरे को सोचना होगा कि तमाम तरह के अपमान का घूंट सहते हुए इतने बरस काटे। अपने मंत्रियों को सत्ता सुख भोगने दिया। बीजेपी से  मिलकर चुनाव लड़ा। सरकार भी बना ही सकते थे, मगर मुख्यमंत्री के पद को नाक का बाल बना लिया।

अनेक बार बड़े भाई को बीजेपी राजनीतिक शिकस्त देती रही और शिवसेना स्वीकार करती रही तो इस बार भी ख़ामोशी रखनी थी। यदि मुख्यमंत्री बनने की चाह उद्धव ठाकरे के मन में थी तो चुनाव लड़ने के पहले ही चेहरा घोषित करने में क्या मुश्किल थी ? यदि अपने को मुख्यमंत्री का संभावित उम्मीदवार भी बता देते तो शायद शिव सैनिक अधिक सीटें पार्टी की झोली में डाल देते। तब शिवसेना बीजेपी के साथ बराबरी की मुद्रा में खड़ी होती। यदि बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद देने से इनकार कर दिया था तो अपने को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त एनसीपी और कांग्रेस के साथ पहले दिन ही रख देनी थी। त्रिकोणीय गठबंधन पर देर करने का जो आरोप लग रहा है ,उसका सामना नहीं करना पड़ता। ज़ाहिर है मतदाता यह भूल नहीं सकता। 

कांग्रेस को अपेक्षाकृत कम नुक़सान हुआ है। चौथे नंबर की पार्टी के पास खोने के लिए क्या था। अपने चुनावपूर्व सहयोगी दल के साथ मिलकर सरकार तो बना नहीं सकती थी। अगर किसी समीकरण के चलते सत्ता में भागीदारी करने का अवसर मिलता है तो उसमें क्या बुराई है।लेकिन इसके बाद भी उसकी छवि कोई चमकदार नहीं हुई है। अगर सरकार बनानी ही थी तो बैठक दर बैठक समय काटने के लिए इतने दिन क्यों बरबाद किए? एक ही दिन में मैराथन मीटिंग करके क्यों नहीं सारे फ़ैसले लिए।

 
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कांग्रेस सबसे ज्यादा कमजोर पार्टी साबित हुई है। - फोटो : self
क्या इतने  पुराने राजनीतिक दल के लिए किसी को यह समझाने की आवश्यकता है कि अब आप एक दुर्बल आकार में हैं। यदि आप सरकार बनाने का निर्णय लेने में इतने दिन लगाएंगे तो क्या विरोधी गठबंधन को भी आप उतना ही अवसर नहीं दे रहे हैं? प्रतिपक्षी गठबंधन अपनी वैकल्पिक नीति क्यों नहीं तैयार करेगा? वह भी तब ,जबकि महाराष्ट्र जैसे प्रदेश की चाबी मिलने जा रही हो। कौन अवसर छोड़ता है ? यही कांग्रेस के गले की फांस है ,जो लंबे समय तक अटकी रहेगी। 

आखिर क्या समस्या थी भाजपा को? 
और अब बात भाजपा की। शिवसेना के साथ रिश्तों में टूटन केवल अहं का टकराव है। यदि महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री पद शिवसेना को दे भी देते तो भी सरकार की गर्दन पर पकड़ तो बीजेपी की ही रहती। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। एक मुख्यमंत्री पद देकर मनचाहे पद पर मोलभाव किया जा सकता था। लेकिन यह भारतीय जनता पार्टी का जवाबी हठ था।

ज़िद के आगे और सख़्त ज़िद। देखा जाए तो बिना चेहरा घोषित किए ही देवेंद्र फड़नवीस अपनी दूसरी पारी का ऐलान कर रहे थे।वह भी आपत्तिजनक था। जब एनसीपी-शिवसेना और कांग्रेस तीनों मिलकर सरकार बनाने की क़वायद में लगे थे तो बीजेपी ने उसे सिद्धांत विहीन गठबंधन कहा था। ताज्जुब है कि अब एनसीपी के साथ बीजेपी सरकार बना रही है तो कोई आपत्ति नहीं। हरियाणा की सियासत रिपीट हो गई। 

अंत में राजभवन की भूमिका
संवैधानिक प्रमुख की अपनी परंपरा और प्रोटोकॉल है। रात में बहुमत का दावा, रात में ही उसका समर्थन,रात में ही राष्ट्रपति भवन हरकत में,रात में ही राष्ट्रपति शासन हट गया ,सुबह होते-होते मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री की शपथ। यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में हमेशा याद रखा जाएगा। अतीत में सरकार बनाने से पहले विधायकों की खरीद फ़रोख़्त के उदाहरण हैं। अब शपथ के बाद विधायक जुटाने की जोड़तोड़ होगी। इसे कौन जायज़ ठहराएगा। लब्बोलुआब यह कि यह महाराष्ट्र को मिली नई सरकार मतदाता की हार है। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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