यह सच है कि किसी भी लोकतंत्र में बहुमत पाने वाली पार्टी सत्ता पर काबिज होती है। लेकिन, यदि विजय एकतरफा हो तो वह जम्हूरियत के नजरिए से घातक भी होती है। अधिनायकवादी बीजों के अंकुरित होने का खतरा बना रहता है। महाराष्ट्र विधानसभा के लिए हुए निर्वाचन का परिणाम कुछ ऐसा ही सन्देश देता है। कोई सरकार कितना ही अच्छा काम करे (जो कि उसका कर्तव्य है) मतदाताओं को उसे नियंत्रित करना ही होगा।
भारत के मतदाता ने इसे ताड़ लिया था। इसी वजह से 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम लोकतंत्र को संतुलित करते हुए आए थे। अब केंद्र सरकार बैसाखियों के सहारे है और प्रतिपक्ष मजबूत स्थिति में है तो भारतीय प्रजातंत्र संतोष कर सकता है। लेकिन महाराष्ट्र के हालिया परिणाम एक बार फिर यही अंदेशा उत्पन्न करते हैं। प्रतिपक्ष का क़द विधानसभा में अत्यंत नाटा है और वह सत्ताधारी पार्टी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं रहा है।
विडंबना यह कि बीजेपी के सहयोगी दल भी उसकी विराट जीत से आशंकित दिखाई देते हैं।सवाल यह भी खड़ा होता है कि 132 विधायक चुनकर विधानसभा में भेजने वाली पार्टी अपना मुख्यमंत्री क्यों न बनाए? क्या वह शिंदे को एक बार फिर स्वीकार करे ? जबकि शिंदे के पास बीजेपी के दावे को चुनौती देने वाला आंकड़ा नहीं है, हालांकि बिहार की तर्ज पर बीजेपी ऐसा कर सकती है ,पर यह भी हक़ीक़त है कि शिंदे ,नीतीश कुमार नहीं हैं।
वैसे भी नीतीश कुमार अपनी कीकड़ बदन वाली पार्टी के साथ मुख्यमंत्री बने हुए हैं और बड़े आकार वाली बीजेपी वहां अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी तो यह मान्य लोकतान्त्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन है। यदि शिंदे को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो फिर वे बीजेपी से उपकृत भाव के साथ काम करेंगे और महाराष्ट्र के लिए यह बेहतर स्थिति नहीं होगी।
प्रत्येक सभ्य लोकतंत्र पक्ष और प्रतिपक्ष के एक सम्मानजनक आकार को पसंद करता है।कामयाबी शिखर को छूने वाली हो तो फिर ढलान में उतरने के अलावा कुछ नहीं होता। शिखर के ऊपर कोई दूसरा शिखर नहीं होता।
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