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महाराष्ट्र-हरियाणा में भाजपा के लिए चुनौती बने ये मुद्दे, क्या पार्टी समझेगी अपने जमीनी हालात को?

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हरियाणा में एग्जिट पोल ने भाजपा को 80 से ज्यादा सीटें दी थी। भाजपा ने इतनी सीटों का दावा अपने चुनावी नारे ‘अबकी बार 75 पार’ में भी नहीं की थी। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने सारों को चौंका दिया है। परिणाम एग्जिट पोल के उलट आए हैं। हालांकि एग्जिट पोल हमेशा सच नहीं होते, लेकिन ज्यादातर एग्जिट पोल सच होते हैं। इस बार दोनों राज्यों के एग्जिट पोल ने पहले लोगों को हैरान किया था। अब चुनाव नतीजों ने लोगों को हैरान कर दिया है।

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दरअसल, हरियाणा में एग्जिट पोल ने भाजपा को 80 से ज्यादा सीटें दी थी। भाजपा ने इतनी सीटों का दावा अपने चुनावी नारे ‘अबकी बार 75 पार’ में भी नहीं की थी। महाराष्ट्र में शिवसेना के गठबंधन के बिना भाजपा की सरकार अब नहीं बन सकती। अब पांच साल शिवसेना के सहारे सरकार चलाना भाजपा की मजबूरी होगी। ठीक बिहार की तरह महाराष्ट्र में स्थिति पैदा हो सकती है। कभी भी नीतीश कुमार की तर्ज पर शिवसेना पलटी मार सकती है। शिवसेना ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं।

अब बात सिर्फ बराबरी पर ही नहीं होगी, बल्कि पांच साल शिवसेना दबाव बनाकर महाराष्ट्र में सरकार चलवाएगी। हरियाणा में भाजपा की नीतियों पर जनता ने चोट मारी है। अब सत्ता की चाभी दुष्यंत चौटाला और निर्दलियों के हाथों में है।
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यहां लगभग कर्नाटक जैसी स्थिति पैदा हो सकती है जबकि वहीं दुष्यंत चौटाला पर केंद्र की भाजपा सरकार भी दबाव है, क्योंकि उनके पिता अजय चौटाला भ्रष्टाचार के मामले में पहले से ही जेल में है। हालांकि दुष्यंत की मजबूरी यह है कि उनका वोट बैंक भाजपा के सख्त खिलाफ है। वैसे में अगर भाजपा के साथ गठबंधन कर वो सरकार बनाएंगे तो आने वाले समय में उनका  भारी नुकसान हो सकता है। 

हरियाणा में किसकी सरकार - फोटो : Amar Ujala

सत्ता और विपक्ष दोनों को सीख
हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को सीख दी है। सत्ता पक्ष को जनता ने साफ संकेत दिए है कि राष्ट्रवाद, मुस्लिम विरोध, पाकिस्तान के नारे पर बार-बार चुनाव नहीं जीता जा सकता है।

वहीं विपक्ष को बेशक बहुमत नहीं मिला लेकिन सीटें अच्छी मिली है। लेकिन उनके लिए संदेश यह है कि उन्होंने सरकार की विफलताओं को अच्छी तरह से रखा होता तो  शायद जनता उन्हें बहुमत देती। कहीं न कहीं विपक्ष को भी जनता संदेह की नजरों से देख रही है।

जनता का संदेश साफ है कि देश की मौजूदा समस्या जिससे हर तबका प्रभावित हो रहा है, चाहे वो हिंदू हो या मुस्लिम उसे हल करने पर सरकार बल दे। 2014 में भाजपा महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव अकेले लड़ी थी। भाजपा को उस समय 122 सीटें आयी थी।

इस बार शिवसेना के साथ गठबंधन कर भाजपा चुनाव मैदान में उतरी थी। फिर भी भाजपा मुश्किल से 100 सीटों का आंकड़ा पार कर पायी है। मतलब साफ है कि भाजपा की नीतियों पर जनता ने पूर्ण समर्थन नहीं दिया। कहीं न कही जनता ने चुनाव परिणामों में अपनी नाराजगी प्रकट की है।

अगर शिवसेना से गठबंधन नहीं होता तो भाजपा 100 का आंकडा भी महाराष्ट्र में पार नहीं कर पाती। यह नरेंद्र मोदी के उस नारे पर चोट है जिसे उन्होंने महाराष्ट्र में दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘दिल्ली में नरेंद्र, महाराष्ट्र में देवेंद्र’। दरअसल देवेंद्र फडनवीस की नीतियों और कार्यों पर जनता ने मुहर नहीं लगायी है।

हरियाणा में खट्टर के दावों को नकारा
लगभग यही कुछ हालात हरियाणा के है। पांच साल तक खुलकर पूर्ण बहुमत के साथ मनोहर खटटर की सरकार ने हरियाणा पर राज किया। खूब दावे किए गए। लेकिन चुनाव प्रचार में उन कार्यों और दावों को भाजपा ने छोड़ दिया था। भाजपा पहले लगातार ईमानदारी से नौकरियों में भर्ती का दावा कर रही थी। साथ ही हरियाणा में ईमानदार सरकार और प्रशासन का दावा कर रही थी। लेकिन चुनावी सभा में भाजपा के नेता नौकरियों और रोजगार की बात भूल गए।

चुनावी सभा में भाजपा को अपनी हार का भय हो गया था। क्योंकि उन्हें पता था कि रोजगार और ईमानदारी की बात से चुनावी जीत नहीं मिलेगी, क्योंकि इन दावों में दम नहीं है। तभी प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को चुनावी सभाओं में  धारा 370 और राफेल शस्त्र पूजा का मसला उठाना पड़ा।

भाजपा को उम्मीद थी कि धारा 370 औ राष्ट्रवाद के नारे की हवा में बेरोजगार बेरोजगारी भूल जाएंगे और भाजपा को वोट कर देंगे। लेकिन जनता इन नारों को स्वीकार नहीं किया। जनता ने राष्ट्रवाद और बालाकोट को 2019 के लोकसभा चुनावों में स्वीकार किया। जनता ने भारी बहुमत भाजपा को दी थी। हरियाणा में 10 की 10 सीटें भाजपा को जनता ने सौंप दी थी।

महाराष्ट्र में शानदार सफलता भाजपा को मिली थी। क्योंकि वह लोकसभा का चुनाव था। विधानसभा चुनावों में जनता इस बात से खासी नाराज थी कि भाजपा नेता स्थानीय मुद्दों जिसमें किसान संकट, बेरोजगारी शामिल है उसे नजरअंदाज कर राष्ट्रवाद और धारा 370 का इस्तेमाल कर रहे है।

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मुंबई में संयुक्त पत्रकार वार्ता में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे - फोटो : ani

भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग का जादू होने लगा कम
दरअसल, महाराष्ट्र में भाजपा का उम्मीद से कम प्रदर्शन और हरियाणा में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति ने साफ कर दिया है कि भाजपा का सोशल इंजीनयरिंग का जादू कम हो रहा है। महाराष्ट्र में भाजपा ने 2014 के विधानसभा चुनाव में ओबीसी और गैर मराठा जातियों का गठबंधन के सहारे एक सोशल इंजीनियरिंग तैयार की थी। इसमें सफलता भी मिली।

माली, धनगर और बंजारी आदि जातियों ने ब्राह्मण और अन्य जातियों के साथ मिलकर मराठों को सत्ता से बाहर कर दिया। बाद में देवंद्र फडवणीस ने मराठा वोटरों में भी सेंध लगाने की कोशिश की। मराठों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर फड़नवीस ने अच्छा दांव खेला था। इससे उम्मीद थी कि भाजपा गठबंधन को 200 से ज्यादा सीटें मिलेगी। लेकिन सोशल इंजीनियरिंग का यह दांव फेल हो गया।

दरअसल, महाराष्ट्र में भारी आर्थिक संकट जिसकी पीड़ा किसान, युवा और शहरी लोगों को झेलना पड़ रहा है, को समझने में भाजपा विफल रही है। चुनावों से ठीक पहले पीएमसी बैंक घोटाले ने महाराष्ट्र में भाजपा की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाया। इससे शहरी मध्य वर्ग और छोटे बचत करने वाले लोग डर गया। उन्हें यह डर हो गया कि सरकार बैंकिंग सेक्टर को सम्हाल नहीं पा रही है।

वहीं दूसरी ओर आर्थिक मंदी ने महाराष्ट्र के किसान से लेकर उद्योगों को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। महाराष्ट्र में जहां किसान जहां लगातार आत्महत्या कर रहे हैं, वहीं शहरी उद्योगों और व्यापार को भी खासा नुकसान उठाना पड़ा है। लेकिन यहां भाजपा के राष्ट्रीय नेता से लेकर स्थानीय नेता कश्मीर मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे थे। वहीं जातीय गुणागणित लगा रहे थे।

हरियाणा में जाट बनाम गैर जाट का ध्रुवीकरण में विफल रही भाजपा 
लगभग यही हाल हरियाणा में था। भाजपा ने यहां गैर जाट बनाम जाट का सोशल इंजीनियिरंग खेला था। 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन ने हरियाणा में समाज को बुरी तरह से बांटा दिया था। जाटों की हिंसा से गैर जाट नाराज हो गए थे, वे आज भी हैं। कुछ शहरों में बुरी तरह से लूटपाट हुई थी। इससे शहरी लोग भी जाटों से नाराज थे। ग्रामीण गैर जाट पिछड़ी जातियों की भी भारी नाराजगी जाटों से इस आरक्षण आंदोलन के दौरान हो गई थी।

भाजपा ने राज्य के आर्थिक हालात सुधारने, किसानों की दशा ठीक करने, युवाओं को रोजगार देने के बजाए चार साल सोशल इंजीनयरिंग मजबूत करने में लगाए। जाट बनाम गैर जाट का समीकरण ही भाजपा नेता लगाते रहे। भाजपा ने वैसे दावा किया कि हरियाणा में  भ्रष्टाचार भाजपा सरकार ने खत्म कर दिया, नौकरियां ईमानदारी से दी, लेकिन सच्चाई तो यही थी कि हरियाणा में भ्रष्टाचार कहीं खत्म नहीं हुआ था।

यही कारण है कि भाजपा के कई मंत्रियों की भी हार हो गई। उन्हें जनता ने अच्छे मतों से हराया। मनोहर लाल खट्टर की छवि ईमानदारी की रही। लेकिन निचले स्तर पर भ्रष्टाचार जारी रहा। इस बीच बेशक सरकार ने नौकरियों की बहार लाने के दावे किए। लेकिन सच्चाई यह थी कि हरियाणा में 21 लाख युवा इस समय बेरोजगार हैं। हरियाणा बेरोजगारी में नंबर-1 बन गया। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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