13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक प्रयागराज में महाकुंभ मेले का आयोजन होने जा रहा है। केंद्र की नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार महाकुंभ मेले को दिव्य और भव्य बनाने के प्रयासों में दिन-रात जुटी है। महाकुंभ मेला क्षेत्र इनदिनों दूधिया रोशनी में नहाया हुआ है। विशाल पंडाल, टेंट सिटी, अखाड़ों और संस्थाओं के साथ कल्पवासियों की तंबू नगरी आकार ले चुकी है। हर ओर भव्यता दिखाने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन क्या कुंभ भव्यता का पर्व है?
प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में प्रत्येक 12-12 वर्ष में कुंभ का आयोजन होता है। हरिद्वार और प्रयागराज में प्रत्येक 6-6 वर्ष में अर्द्धकुंभ भी लगता है। हालांकि, कुंभ स्नान पर्व की परंपरा कब प्रारंभ हुई? इसका कोई निश्चित प्रमाण कहीं उपलब्ध नहीं है।
वेदों में अवश्य कई स्थानों पर कुंभ शब्द का प्रयोग हुआ है। जल प्रवाह से उसका संबंध भी है। एक जगह कुंभ शब्द चार की संख्या भी निर्दिष्ट है, लेकिन न तो उसका संबंध अमृत मंथन की कथा से जुड़ पाता है, न ही हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक के चारों कुंभ पर्वों से कोई संगति बन पाती है। हां, पुराणों में कुंभ स्नान का सविस्तार उल्लेख है। स्पष्ट है कि कुंभ स्नान पर्व की परंपरा पुराणों की रचना के पूर्व से प्रचलित है। पुराणों का संकलन गुप्तकाल (320-510 ईस्वी) के मध्य माना जाता है।
वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रयास रहा है कि दुनिया को भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति से परिचित कराया जाए। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर हो या अयोध्या में भगवान राम का मंदिर या उज्जैन में महाकाल कॉरिडोर या देशभर में विकसित किए जा रहे अन्य धार्मिक स्थल व धाम, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अर्थशास्त्र को साथ लेकर चल रहे हैं।
यह सही है कि धार्मिक पर्यटन से देश में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है, लेकिन सनातन धर्म में वैभवता से अधिक त्याग को महत्व दिया गया है। इसके उल्ट महाकुंभ प्रयागराज को भव्य दिखाने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। टेंट सिटी से लेकर डोम सिटी तक बनाई जा रही हैं, जिनमें फाइव स्टार होटल जैसी सुविधाओं मुहैया कराने के दावे हो रहे हैं। इनका किराया लाखों रुपए में है।
निश्चित ही सरकार प्रयागराज में महाकुंभ मेले को दिव्य के साथ भव्य भी बनाए, लेकिन कुंभ की मूल भावना स्नान, ध्यान और त्याग को साथ लेकर चला जाए। यह दायित्व सरकार के साथ साधु-संन्यासियों और समाज का भी है।
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