प्रयागराज के निवासी राजाराम तिवारी ने 79 साल पहले मेले में बिछड़े लोगों को परिवार से मिलाने का एक कार्य प्रारंभ किया था।
- फोटो : विनोद पाठक
प्रयागराज महाकुंभ-2025 के खोया-पाया केंद्रों की चर्चा से पहले थोड़ा इतिहास में झांक लेते हैं। प्रयागराज में कुंभ के अलावा माघ मेला भी लगता है, जिसका स्वरूप भी कुंभ जैसा ही विशाल होता है। प्रयागराज के निवासी राजाराम तिवारी ने 79 साल पहले मेले में बिछड़े लोगों को परिवार से मिलाने का एक कार्य प्रारंभ किया था।
दरअसल, राजाराम तिवारी वर्ष 1946 में जब 18 साल के थे, तब माघ मेले में एक बुजुर्ग महिला अपने परिवार से बिछड़ गई थी। यह वह समय था, जब लाउडस्पीकर बहुत सुलभ नहीं था। युवा राजाराम तिवारी की कोशिशें से बुजुर्ग महिला का परिवार से मिलन हो गया था, लेकिन राजाराम तिवारी ने एक बात ठान ली थी कि वो अब मेले में ऐसा शिविर लगाएंगे, जहां भूले-भटके लोगों का परिवार से पुनर्मिलन कराया जा सके। जब उन्होंने अपने भूले-भटके शिविर की शुरुआत की, तब वो टिन को काटकर बनाए भोंपू से मेले में भटके हुए लोगों की उद्घोषणा किया करते थे।
वर्ष 2016 में अपनी मृत्यु तक राजाराम तिवारी माघ मेला, अर्धकुंभ मेले और कुंभ में 14 लाख से अधिक वयस्कों और 21,000 से अधिक बच्चों को परिवार से मिलवा चुके थे। उन्हें भूले भटके वालों का बाबा नाम से लोग जानते हैं।
राजाराम तिवारी का यह प्रयास आगे चलकर उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हाथों में ले लिया।
- फोटो : विनोद पाठक
राजाराम तिवारी का यह प्रयास आगे चलकर उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। सरकार भी भूले-भटके लोगों के लिए केंद्र स्थापित करने लगी। अब सरकार के खोया-पाया केंद्र डिजिटल हो चले हैं।
इस बार महाकुंभ मेले में उत्तर प्रदेश सरकार का प्रयास दिव्य और भव्य के साथ डिजिटल हो चुका है। महाकुंभ मेले में सरकार ने 10 सेक्टरों में खोया-पाया केंद्र स्थापित किए हैं, जिनमें पुनर्मिलन डेस्क के अलावा महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के लिए प्रतीक्षालय, चिकित्सा कक्ष, परामर्श कक्ष, भोजन और रहने की व्यवस्था तक की गई है।
खोया-पाया केंद्र में दो तरीके से सूचना देने का प्रावधान है। एक लोग यहां आकर अपने परिवार से बिछड़े हुए सदस्य की जानकारी देते हैं, जबकि खो गए लोग स्वयं भी केंद्र पहुंच जाते हैं।
- फोटो : विनोद पाठक
खोया-पाया केंद्र में दो तरीके से सूचना देने का प्रावधान है। एक लोग यहां आकर अपने परिवार से बिछड़े हुए सदस्य की जानकारी देते हैं, जबकि खो गए लोग स्वयं भी केंद्र पहुंच जाते हैं। जब भी कोई परिवार या व्यक्ति पाया-पाया केंद्र पहुंचता है तो पूरे मेला क्षेत्र में लाउडस्पीकर से उद्घोषणा कराई जाती है।
जब आप महाकुंभ मेला क्षेत्र में पहुंचेंगे तो आपको ऐसी उद्घोषणाएं होती सुनाई देंगी। न केवल लाउडस्पीकर, बल्कि डिजिटल माध्यम से बिछड़े हुए लोगों को ढूंढने का प्रयास हो रहा है। खोया-पाया केंद्र द्वारा सोशल मीडिया का सहारा ले रही है। व्हाट्सएप ग्रुप पर तत्काल जानकारी प्रसारित कर दी जाती है।
सरकार की एक बड़ी मशीनरी खोया-पाया केंद्रों में लगाई गई है। आपातकालीन नंबर 1920 पर बिछड़े हुए व्यक्ति या बच्चे की तत्काल सूचना दी जा सकती है। खोया-पाया केंद्रों को दूर से पहचाना जा सके, इसके लिए उन पर बड़े गुब्बारे उड़ाए जा रहे हैं।
खोया-पाया केंद्र मेला क्षेत्र में लोगों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं।
- फोटो : विनोद पाठक
कुंभ मेले में कोई परिवार से बिछड़ जाएगा और कभी नहीं मिलेगा, ऐसी संभावना खोया-पाया केंद्रों के डिजिटल प्रयासों ने करीब-करीब समाप्त कर दी हैं। खोया-पाया केंद्र मेला क्षेत्र में लोगों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं। डिजिटल युग में अपनों को ढूंढना आसान हो गया है। यूं लग रहा है कि कुंभ में लोग खो जाते हैं, यह बात एक सपना स्वरूप हो जाने वाली है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।