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मध्य प्रदेश: पार्टी के दिग्गजों ने गिराई कमलनाथ की सरकार? 

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कमलनाथ के लिए आसान नहीं था सरकार बचाना - फोटो : self
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कमलनाथ की कांग्रेस सरकार मध्य प्रदेश से विदा हो गई। विदाई तो कमोबेश पहले ही तय थी। कमलनाथ ही आख़िरी समय तक क़िला लड़ाते रहे। अगर उनकी सरकार बच जाती तो शायद चमत्कार ही होता। वे पार्टी के दिग्गज क्षत्रप तो पहले ही थे उसमें चार चांंद लग जाते। मगर कांग्रेस की अंदरूनी सेहत ने उनका साथ नहीं दिया। कहने में हिचक नहीं कि इस पूरे प्रसंग में मतदाता की हार हुई है। 

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वैसे कमलनाथ के आत्मविश्वास के तीन बड़े कारण थे। तीन में से एक भी उनके पक्ष में हो जाता तो पांंसा उल्टा पड़ जाता। गुरुवार की शाम जब सुप्रीम कोर्ट ने जब 20 मार्च की शाम पांंच बजे तक फ्लोर टेस्ट का निर्देश दिया तो एक तरह से कमलनाथ अपनी बची-खुची जंग भी हार गए। कमलनाथ उम्मीद कर रहे थे कि सर्वोच्च न्यायालय बहुमत सिद्ध करने के लिए कम से कम दो सप्ताह का समय तो देगा। पर ऐसा नहीं हुआ। कमलनाथ के इस भरोसे का ठोस आधार था।

तीन साल पहले मणिपुर में जब कांग्रेस के विधायकों ने पार्टी छोड़ी तो सुप्रीमकोर्ट ने बहुमत सिद्ध करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था। कांग्रेस के टी श्यामकुमार 2017 में जीते और बाद में बीजेपी में जाकर मंत्री बन गए। उनके साथ आठ विधायक भी भारतीय जनता पार्टी में गए थे। इसी मामले में मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष को चार सप्ताह का वक़्त दिया गया था। इसके बाद कर्नाटक के मामले में भी ऐसा ही हुआ। पंद्रह विधायकों ने अपने त्यागपत्र सीधे अध्यक्ष को सौंपे थे। स्पीकर ने फ़ैसले में देरी की।
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नतीज़तन विधायक सुप्रीमकोर्ट में गए। सर्वोच्च अदालत ने व्यवस्था दी कि विधानसभा अध्यक्ष अपने स्तर पर इस्तीफ़ों के बारे में निर्णय लेने के लिए आज़ाद हैं। अदालत इसमें समय सीमा तय नहीं कर सकती। इसी आधार पर कमलनाथ को लग रहा था कि सुप्रीमकोर्ट उन्हें दो तीन हफ़्ते तो देगा ही साथ ही स्पीकर की सदन के भीतर की सर्वोच्चता बरक़रार रखेगा। लेकिन यह निर्णय भी उल्टा हुआ और कमलनाथ टूट गए। 

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शिवराज सिंह चौहान और सीएम कमलनाथ - फोटो : self
वैसे दो अन्य कारणों में एक तो बाग़ी 22 विधायकों से कोई संवाद नहीं हो पाना था। उनमें छह मंत्री थे। बेंगलुरु में रखे गए इन विधायकों से उनका कोई दिग्गज समर्थक तमाम प्रयासों के बाद भी रिश्ता नहीं बना सका तो यह भी एक झटका था। बीजेपी के क़िले में कोई कांग्रेसी परिंदा पर नहींं मार पाया।जानकार मानते हैं कि अगर मुख्यमंत्री के तौर पर कमलनाथ स्वयं बेंगलुरु जाते तो संभवतया अलग दृश्य होता। जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह ने वहांं जाकर एक हास्य प्रहसन खेला ,जो किसी को पसंद नहीं आया। तीसरा और अंतिम कारण कमलनाथ की गुप्त योजना का उजागर हो जाना रहा।

यह सच है कि भारतीय जनता पार्टी के क़रीब आधा दर्ज़न असंतुष्ट विधायक कमलनाथ के सीधे संपर्क में थे। लेकिन अन्य दबावों के चलते कमलनाथ इन विधायकों से भरोसेमंद संवाद नहीं कर पाए। ख़बरें तो यही हैं कि लेनदेन पर बात अटक गई। इसके अलावा कांग्रेस के एक बड़े प्रादेशिक महारथी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़ेमें में इन विधायकों के नाम पहुंंचा दिए। इसके बाद शिवराज के लोग जागे और पार्टी अपने अन्य विधायकों को सीहोर ले गई। कमलनाथ की इस योजना पर भी घड़ों पानी फिर गया। उनके लिए अब यही गुनगुनाना शेष है - 

किससे तू जंग छेड़ता ,कुछ ग़ौर से तो देख। है दुश्मनों की फ़ौज़ तेरे घर में छिपी हुई ।

मध्य प्रदेश अब एक बार फिर उपचुनावों की देहलीज़ पर है। इस्तीफ़ा दे चुके 22 विधायकों और 2 पहले से रिक्त स्थानों पर चुनाव होंगे। कांग्रेस आला कमान और कमलनाथ की टीम के लिए ये चुनाव अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे। कांग्रेस अपने भितरघाती नेताओं से उबर सकेगी -फ़िलहाल ऐसा नहीं लगता।    
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