शिवराज सिंह चौहान और सीएम कमलनाथ
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वैसे दो अन्य कारणों में एक तो बाग़ी 22 विधायकों से कोई संवाद नहीं हो पाना था। उनमें छह मंत्री थे। बेंगलुरु में रखे गए इन विधायकों से उनका कोई दिग्गज समर्थक तमाम प्रयासों के बाद भी रिश्ता नहीं बना सका तो यह भी एक झटका था। बीजेपी के क़िले में कोई कांग्रेसी परिंदा पर नहींं मार पाया।जानकार मानते हैं कि अगर मुख्यमंत्री के तौर पर कमलनाथ स्वयं बेंगलुरु जाते तो संभवतया अलग दृश्य होता। जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह ने वहांं जाकर एक हास्य प्रहसन खेला ,जो किसी को पसंद नहीं आया। तीसरा और अंतिम कारण कमलनाथ की गुप्त योजना का उजागर हो जाना रहा।
यह सच है कि भारतीय जनता पार्टी के क़रीब आधा दर्ज़न असंतुष्ट विधायक कमलनाथ के सीधे संपर्क में थे। लेकिन अन्य दबावों के चलते कमलनाथ इन विधायकों से भरोसेमंद संवाद नहीं कर पाए। ख़बरें तो यही हैं कि लेनदेन पर बात अटक गई। इसके अलावा कांग्रेस के एक बड़े प्रादेशिक महारथी ने भारतीय जनता पार्टी के ख़ेमें में इन विधायकों के नाम पहुंंचा दिए। इसके बाद शिवराज के लोग जागे और पार्टी अपने अन्य विधायकों को सीहोर ले गई। कमलनाथ की इस योजना पर भी घड़ों पानी फिर गया। उनके लिए अब यही गुनगुनाना शेष है -
किससे तू जंग छेड़ता ,कुछ ग़ौर से तो देख। है दुश्मनों की फ़ौज़ तेरे घर में छिपी हुई ।
मध्य प्रदेश अब एक बार फिर उपचुनावों की देहलीज़ पर है। इस्तीफ़ा दे चुके 22 विधायकों और 2 पहले से रिक्त स्थानों पर चुनाव होंगे। कांग्रेस आला कमान और कमलनाथ की टीम के लिए ये चुनाव अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे। कांग्रेस अपने भितरघाती नेताओं से उबर सकेगी -फ़िलहाल ऐसा नहीं लगता।