शिवराज सिंह चौहान-ज्योतिरादित्य सिंधिया (फाइल फोटो)
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ठीक ऐसा ही संकट बीजेपी के उन समर्पित कार्यकर्ताओं के सामने आ खड़ा हुआ है ,जिन्होंने रात दिन एक करके पार्टी को इलाक़े में बचाए रखा है। इसी कांग्रेस विरोध की धारा से नरेंद्र सिंह तोमर,प्रभात झा और नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता निकले हैं। अब उनके कार्यकर्ता ही उनके सामने सवाल खड़े कर रहे हैं क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया कह चुके हैं कि उनके समर्थक सभी बाईस विधायकों को टिकट मिलेगा। याने अब बीजेपी ही बीजेपी से लड़ेगी। शिवराज की यह आसमानी चुनौती है।
दूसरी चुनौती शिवराज के लिए ख़ुद ज्योतिरादित्य सिंधिया बन जाएंंगे। मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें ज्योतिरादित्य के हर छोटे बड़े काम करने होंगे। सिंधिया घराने की यह परंपरा रही है। अर्जुनसिंह और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री होते हुए भी महल का विरोध करने का साहस कभी नहीं जुटा पाए। तब सिंधिया परिवार की हरी झंडी के बिना पत्ता नहीं हिलता था।
अतीत में ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी ने जब संविद सरकार बनाई और अपना मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह को बनाया तो 36 विधायक लेकर कांग्रेस से आए गोविन्द नारायण सिंह को लंबे समय तक महल के रिमोट पर चलना पड़ता था।
अंत में एक स्थिति ऐसी भी आई कि उन्होंने विजयाराजे सिंधिया से यह कहते हुए हाथ जोड़ लिए कि वे अब उनके इशारे पर काम नहीं कर पाएंंगे। इसके बाद पूरी संविद सरकार गोविन्द नारायण सिंह के नेतृत्व में वापस कांग्रेस में चली गई। शिवराज को देखना होगा कि वे भी अपनी पार्टी के सौ से अधिक विधायकों के बहुमत से बने मुख्यमंत्री हैं। यह बेमेल ब्याह कब तक चलता है - यह भी एक बड़ा प्रश्न है।
तीसरी चुनौती सरकार का वह ख़ाली खज़ाना है, जो खुद शिवराज सिंह चौहान कमलनाथ को देकर गए थे। उनकी लोक लुभावन नीतियों से कर्मचारी और जनता बहुत खुश नहीं माने जाते। किसान ,व्यापारी, कर्मचारी और नौजवान सारे वर्गों को संतुष्ट करना आसान काम नहीं है।बेरोज़गारी की भयावह तस्वीर यह राज्य पेश कर रहा है। असल में 2013 और 2018 में बीजेपी ने जो भी प्रदर्शन किया,उसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है। उनके नाम पर ही आम आदमी ने वोट किया, इसलिए अगले विधानसभा चुनाव तक क्या हाल होंगे होंगे -कहा नहीं जा सकता।
शिवराज को अब एकदम नए सिरे से अपनी राजनीतिक पारी खेलनी होगी। पार्टी के भीतर ढेर सारे असंतुष्टों को साथ लेकर चलना शिवराज के लिए बहुत टेढ़ी खीर है। कुल मिलकर शिवराज की चौथी पारी शिवराज के लिए अब तक की सबसे कठिन पारी होगी। कांंटों भरा सफ़र है। कठिन डगर है। अगर इस पारी के चक्रव्यूह को भेदकर वे बाहर निकल आए तो भारतीय जनता पार्टी की अग्रिम पंक्ति में अपनी स्थाई सीट सुरक्षित कर लेंगे।
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