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मध्य प्रदेश: एक बार फिर चक्रवर्ती हुए शिवराज, लेकिन बेहद कठिन होगी चौथी पारी 

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शिवराज के लिए एक नई कई चुनौतियां होंगी सामने - फोटो : SELF
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मध्य प्रदेश में एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान। मुख्यमंत्री के रूप में चौथी पारी। बचे हैं क़रीब क़रीब साढ़े तीन साल। तीसरी पारी शिवराज ने बेशक़ बड़े तनाव में खेली थी और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में वे अंत तक पिच पर डटे रहे। पार्टी के अंदर अपने सारे विरोधियों को चित करते हुए।वह भी तब जबकि उनके सारे आलोचक बीजेपी आला कमान के क़रीब तथा भरोसे मंद थे।

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शिवराज ने किस किसको ख़फ़ा नहीं किया। सूची लंबी है - उमाभारती , प्रभात झा, नरेंद्र सिंह तोमर ,कैलाश विजयवर्गीय ,राकेश सिंह ,नरोत्तम मिश्रा ,लक्ष्मी नारायण शर्मा ,रघुनन्दन शर्मा और गोपाल भार्गव जैसे अनेक नाम। चौथी बार उनके मुखिया बनने के समय भी कमोबेश यही प्रतिस्पर्धी थे। लेकिन इस बार आलाकमान ने उनका ही चुनाव किया। इस बार उन्होंने कमलनाथ जैसे दिग्गज की सरकार गिराकर बीजेपी की सरकार बनाने में जो भूमिका निभाई है ,उसने उनके आलोचकों की बोलती बंद कर दी है। आज की तारीख़ में भारतीय जनता पार्टी के भीतर इतना मज़बूत प्रोफाइल किसी और नेता का नहीं है।
   
लेकिन पिछली तीन पारियों से यह पारी सर्वथा भिन्न है। इस बार उन्होंने कांग्रेस की तलवार से अपने विरोधियों को पटखनी दी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को साथ लेकर उन्होंने अपने दलीय सहयोगियों/आलोचकों को साफ़ सन्देश दे दिया है कि राष्ट्रीय स्तर पर भले ही उनकी ढाल के रूप में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली नहीं रहे मगर अब सिंधिया का साथ उनके राजनीतिक भविष्य को संरक्षित करने वाला हो सकता है।
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फ़िलहाल तो नहीं ,पर आने वाले दिन शिवराज के लिए निस्संदेह चुनौती भरे होने वाले हैं। उनके लिए आने वाले दिनों में विधानसभा के चौबीस स्थानों पर होने वाले उप चुनाव सबसे बड़ी परीक्षा होंगे। न केवल शिवराज ,बल्कि सिंधिया का भी वे भविष्य सुरक्षित करेंगे। इसकी एक वजह यह भी है।

चंबल और मध्य भारत इलाक़े में विधानसभा की अनेक सीटें ज्योतिरादित्य के असर वाली हैं या यूंं कहें कि सिंधिया राजपरिवार के प्रभाव क्षेत्र की हैं। महल आगे आगे चलता है ,पार्टी पीछे पीछे। चाहे वह कांग्रेस हो अथवा भारतीय जनता पार्टी। पिछले चालीस बरस से यहांं की सियासत कांग्रेस केंद्रित थी। माधवराव सिंधिया के रहते महल-कांग्रेस ही पनपी। यद्यपि विजयाराजे सिंधिया उन दिनों जीवित थीं मगर वे बेटे की राह में रोड़ा कभी नहीं बनीं। ज्योतिरादित्य के बीजेपी में आते ही महल-कांग्रेस के कट्टर समर्थक धर्मसंकट में हैं।
 

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शिवराज सिंह चौहान-ज्योतिरादित्य सिंधिया (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
ठीक ऐसा ही संकट बीजेपी के उन समर्पित कार्यकर्ताओं के सामने आ खड़ा हुआ है ,जिन्होंने रात दिन एक करके पार्टी को इलाक़े में बचाए रखा है। इसी कांग्रेस विरोध की धारा से नरेंद्र सिंह तोमर,प्रभात झा और नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता निकले हैं। अब उनके कार्यकर्ता ही उनके सामने सवाल खड़े कर रहे हैं क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया कह चुके हैं कि उनके समर्थक सभी बाईस विधायकों को टिकट मिलेगा। याने अब बीजेपी ही बीजेपी से लड़ेगी। शिवराज की यह आसमानी चुनौती है। 

दूसरी चुनौती शिवराज के लिए ख़ुद ज्योतिरादित्य सिंधिया बन जाएंंगे। मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें ज्योतिरादित्य के हर छोटे बड़े काम करने होंगे। सिंधिया घराने की यह परंपरा रही है। अर्जुनसिंह और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री होते हुए भी महल का विरोध करने का साहस कभी नहीं जुटा पाए। तब सिंधिया परिवार की हरी झंडी के बिना पत्ता नहीं हिलता था।

अतीत में ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी ने जब संविद सरकार बनाई और अपना मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह को बनाया तो 36 विधायक लेकर कांग्रेस से आए गोविन्द नारायण सिंह को लंबे समय तक महल के रिमोट पर चलना पड़ता था।

अंत में एक स्थिति ऐसी भी आई कि उन्होंने विजयाराजे सिंधिया से यह कहते हुए हाथ जोड़ लिए कि वे अब उनके इशारे पर काम नहीं कर पाएंंगे। इसके बाद पूरी संविद सरकार गोविन्द नारायण सिंह के नेतृत्व में वापस कांग्रेस में चली गई। शिवराज को देखना होगा कि वे भी अपनी पार्टी के सौ से अधिक विधायकों के बहुमत से बने मुख्यमंत्री हैं। यह बेमेल ब्याह कब तक चलता है - यह भी एक बड़ा प्रश्न है। 

तीसरी चुनौती सरकार का वह ख़ाली खज़ाना है, जो खुद शिवराज सिंह चौहान कमलनाथ को देकर गए थे। उनकी लोक लुभावन नीतियों से कर्मचारी और जनता बहुत खुश नहीं माने जाते। किसान ,व्यापारी, कर्मचारी और नौजवान सारे वर्गों को संतुष्ट करना आसान काम नहीं है।बेरोज़गारी की भयावह तस्वीर यह राज्य पेश कर रहा है। असल में 2013 और 2018 में बीजेपी ने जो भी प्रदर्शन किया,उसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है। उनके नाम पर ही आम आदमी ने वोट किया, इसलिए अगले विधानसभा चुनाव तक क्या हाल होंगे होंगे -कहा नहीं जा सकता।

शिवराज को अब एकदम नए सिरे से अपनी राजनीतिक पारी खेलनी होगी। पार्टी के भीतर ढेर सारे असंतुष्टों को साथ लेकर चलना शिवराज के लिए बहुत टेढ़ी खीर है। कुल मिलकर शिवराज की चौथी पारी शिवराज के लिए अब तक की सबसे कठिन पारी होगी। कांंटों भरा सफ़र है। कठिन डगर है। अगर इस पारी के चक्रव्यूह को भेदकर वे बाहर निकल आए तो भारतीय जनता पार्टी की अग्रिम पंक्ति में अपनी स्थाई सीट सुरक्षित कर लेंगे।  


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।      
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