मंत्री के रूप में उन्होंने साफ कहा कि हमारा विभाग आज भी अमीरी- गरीबी में विभाजन की रेखा को मजबूत करता है।
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इमरती देवी ने बताया कि उनके मन मे यह कसक काफी समय से थी इसलिए उन्होंने अपने अधिकारियों से कहा कि गरीब के बच्चे भी प्राइवेट स्कूल जैसी आंगनवाड़ी में जाएं ऐसा कुछ कीजिए। इमरती देवी की स्वयं भोगी गई यह पीड़ा उनकी प्राथमिकता थी इसलिए कुछ समय पहले मध्य प्रदेश के सभी 313 ब्लॉकों में एक एक आंगनबाड़ी को प्ले स्कूल में तब्दील कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि कोई गरीब मां बाप अगर बच्चे से काम कराता है तो आप लोग उसे पकड़वाकर बन्द करा देते है पर उसके बाद वह खायेगा क्या? ऐसा कुछ कीजिये ताकि गरीब का पेट भर सके। आपका कानून बच्चों को काम करने से तो रोकता है पर पेट की आग बुझाने पर चुप हो जाता है। इमरती देवी के इन सवालों का किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
उन्होंने सिंधिया को मप्र कांग्रेस अध्यक्ष न बनाकर महाराष्ट्र का प्रभारी बनाए जाने पर यह भी सार्वजनिक रुप से ही कहा था न कि उन्हें (सिंधिया) वहां (महाराष्ट्र) कौन पूछता है?
आप सवाल उठा सकते हैं कि इसमें नया क्या है जो मंत्री ने उठाया है? गहराई से सोचेंगे तो आपको समझ आएगा कि व्यवस्थाजनित जड़ता और अफसरी शिकंजे ने मध्य प्रदेश की इस अनुसूचित मंत्री को उसकी जड़ों से कटने नहीं दिया है, वह सियासत में सच बोल रही है।
सच बोलने का साहस कौन कर पाता है आजकल? वह अनुसूचित महिला और बिना पढ़ी लिखी न होने के बाबजूद अपने विभाग में उस गरीबी और दर्द को सुनाना चाह रही है जिसे पढ़े लिखे नेताजी सुनने के लिये तैयार नहीं है।
संभव है इमरती अपने प्रयास में आगे जाकर असफल साबित हो जाएं पर उनकी ईमानदार कोशिश को आप खारिज नहीं कर सकते हैं। सियासत में सार्वजनिक रूप से मन की बात बोलना हर किसी के वश की बात नहीं है। इसलिए इमरती बेशर्म और निर्मम तंत्र में भले मनोरंजन की पात्र बन जाती हो पर उनके उठाए मुद्दे जमीन पर आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्ति देते हुए लगते है।
वह जब पटवारियों को रिश्वतखोर कहती है या फिर सबके सामने यह कहती है कि ट्रांसफर कराने में पैसे लगते हैं तब वह इस व्यवस्था की हकीकत को बयान नहीं करती है क्या। आज मप्र में सबसे बदनाम बिरादरी है पटवारी। हर आमो खास इनसे परेशान है इसलिए इमरती इन्हें मंत्री होने के बाबजूद रिश्वतखोर कहती है तो क्या वह आम आदमी की भाषा नहीं बोलती है? सरकार में ट्रांसफर कैसे होते है? ये किसको नहीं पता है। इसके बाबजूद इन सभी मामलों में जिम्मेदार चुप रहने के साथ इस व्यवस्थागत अन्याय का बचाव कर आखिर कौन सी काबिलियत का मुजायरा करते है?
आरक्षण के सहारे सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले जनप्रतिनिधियों को हम हमेशा अफसरों की करतूतों को ढकते हुए ही देखते हैं। कुछ समय के लिए मंत्री बनने वाले लोग जब तक पद पर रहते है अपने अफसरों की लिखी इबारत पढ़ते है इस लिहाज से हमें इमारती देवी का अभिनंदन करना चाहिये क्योंकि वह अक्सर इस इबारत की जगह गरीब और वंचित की बात तो उठाती ही रहती है भले ही उनकी बातों का परिणाम न निकले। साथ ही वह काले अंग्रेजो को भी आईना दिखाती रहती है। वह अपने नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी सीमाओं का अहसास कराने से नहीं हिचकती है।
उन्होंने सिंधिया को मप्र कांग्रेस अध्यक्ष न बनाकर महाराष्ट्र का प्रभारी बनाए जाने पर यह भी सार्वजनिक रूप से ही कहा था न कि उन्हें (सिंधिया) वहां (महाराष्ट्र) कौन पूछता है? बनाना है तो राहुल गांधी मप्र का अध्यक्ष बनाएं। जाहिर है इमरती हकीकत बोल देती है शायद यही उनके जीत के मार्जिन को हर बार बढ़ाने वाला कारक है। वस्तुतः सच और आम आदमी की बात करने के लिए पढा लिखा होना जरूरी नही।देश की समस्याओं को पढ़े- लिखे लोगों ने ही उलझाया है। पीली बस- वाले स्कूल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की सूरत नहीं देखने वालों ने नहीं।
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