मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
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यानी इससे यह पता चला कि जनता की दिलचस्पी इसमें कतई नहीं थी कि सिंधिया ने कांग्रेस सरकार गिराकर कुछ गलत किया, बल्कि उसने तो इस बात पर मोहर लगाई कि कांग्रेस सरकार गिराना जरूरी व सही था।
ये उप चुनाव मर्यादाहीनता, निजी आरोप-प्रत्यारोप और मुद्दाविहीन रहे, जिसके लिए कांग्रेस ज्यादा दोषी है, क्योंकि विपक्ष में होने के नाते उसे इस बात का खास ध्यान रखना था कि वह भाजपा सरकार की खामियों को उजागर करे।
अपने अल्प कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाएं और साथ में सिंधिया समर्थकों द्वारा की गई पाला बदली को भी मर्यादित तरीके से अनैतिक ठहराए। तब शायद इसका असर भी होता, लेकिन कांग्रेस ने सारा फोकस सिंधिया पर कर दिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि वह यह देख-समझ ही नहीं पाई कि जनमत किस ओर जा रहा है।
भाजपा ने एक तरह से कांग्रेस को खून के प्यासे उस हिंसक पशु की तरह ललचाया जो पिंजरे में कैद शिकार को पाने के लिये खुद पिंजरे में कैद हो जाता है और आसपास खुले में घूम रहे आसान शिकार पर ध्यान ही नहीं दे पाता है।
इन नतीजोंं ने कांग्रेस को मप्र की राजनीति में एक बार फिर काफी पीछे धकेल दिया है। उसके लिए 2023 की राह और भी मुश्किल हो गई है। उसे 2018 की बनिबस्त दुगनी ताकत से काम करना होगा। अभी तक निर्विवाद रहे कमलनाथ पर अंगुलिया उठेंगी, जो कांग्रेस में रस्साकसी ही बढ़ाएगी।
अब वे नेता प्रतिपक्ष व प्रदेश अध्यक्ष जैसी दो नाव की सवारी शायद ही कर पाएं। उनकी उम्र के मद्देनजर 2023 के चुनाव का नेतृत्व तो वे नहीं कर पाएंगे। ऐसे में नए नेतृत्व की तलाश भी कांग्रेस में तकरार ही बढ़ाएगी। इस समय जितने भी नाम हैं, यथा दिग्विजय सिंह,कमलनाथ, सुरेश पचौरी,अरूण यादव,अजय सिंह,कांतिलाल भूरिया में से 2023 में कुछ उम्र दराज हो चुके होंगे तो कुछ अस्वीकार्य।
तब बड़ा संकट यही होगा कि क्या जीतू पटवारी जैसे बचकाना व्यवहार वाले नेताओं को आगे किया जाएगा या प्रियव्रत सिंह, दिग्गी पुत्र जयवर्धन सिंह, कमलनाथ पुत्र नकुलनाथ या आदिवासी के नाम पर उमंग सिंघार या भूरिया के बेटे विक्रांत को आगे लाया जाएगा? यदि ऐसा हुआ भी तो क्या ये लोग भाजपा जैसी कार्यकर्ता आधारित, संघ दीक्षित, मजबूत जनाधार वाली पार्टी से लोहा लेने का माद्दा जुटा पाएंगे?
इन उप चुनाव के परिणामों ने एक बात बेहद साफ कर दी है कि जनता किसी भ्रामक प्रचार से विचलित नहीं होती। वह निजी लड़ाई को भी ठीक नहीं मानती। दलबदल भी उसके लिए मुद्दा नहीं है। वह देखती है नेतृत्व की सौम्य व लोकप्रिय छवि, जातिगत समीकरण, जीतने की संभावना, लंबी राजनीतिक पारी खेलने वाला दल और साथ में यह भी कि उसके भले के लिए किसके पास क्या मुद्दे हैं।
उसके इन पैमानों पर निश्चित ही भाजपा खरी उतरी है और कांग्रेस को खारिज किया है। इसलिए बेहतर तो यह होगा कि कांग्रेस यदि मध्यप्रदेश में अपनी जमीन को फिर से मजबूती देना चाहती है तो उसे जनता के मन में कर्मठता,सौम्यता,निजी मसलों से दूरी और वास्तविक मायनों में जन कल्याणकारी योजनाओं की प्रस्तुति करनी होगी। केवल राजनीतिक बयानबाजी, ट्वीटर,फेसबुक,सोशल मीडिया पर आरोपों की बौछार से वह प्रभावित तो नहीं होती,उलटे आपको उलटा कर देने में जरूर जुट जाती है।
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