सागर और लहरों का संबंध चंद्रमा के साथ निर्धारित करने के पीछे बड़ी वजह है। मानव शरीर भी 70% पानी से बना है, ऐसे में जाहिर है चंद्रमा का प्रभाव मानव शरीर पर भी पड़ता होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि सोडियम, पोटाशियम और कैल्शियम की जो मात्रा समुद्र के जल में पाई जाती है, लगभग वैसी ही मात्रा हमारे शरीर में खून(रक्त) में भी होती है।
इसलिए समुद्र के ज्वार-भाटे की तरह मानव शरीर में भी उतार-चढ़ाव होता है। शरीर में जैव रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं। शरीर और दिमाग में इन उफान मारती तरंगों का ही असर होता है कि पूर्णिमा के दिन अपराध करने की प्रवृत्ति भी बढ़ जाती है।
पूर्णिमा के दिन अपराधों की संख्या बढ़ने के पीछे चंद्रमा के चुंबकीय प्रभाव से पैदा हुई मानवीय ज्वार तरंगें होती है। सर्वे और अध्ययनों के अनुसार, इस दिन ज्यादातर मामले जहर खाने या देने संबंधी होते हैं। इस दिन या इसके बाद अस्पतालों में भी जहर खाने या खिलाने वाले मामले अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा आते हैं।
इस दिन नशीले पदार्थों का भी अपेक्षाकृत ज्यादा असर होता है। मादक पदार्थ इस दिन तेज प्रभाव छोड़ते हैं। आपराधिक घटनाओं में वृद्धि का एक कारण यह भी होता है।
महिलाओं के जीवन में मासिक चक्र अहम भूमिका निभाता है। चिकित्सक बताते हैं कि महिलाओं में होने वाला मासिक धर्म भी चंद्रमा से प्रभावित होता है। स्त्री रोग विशेषज्ञ और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की सदस्य डॉ विनीता सिन्हा के अनुसार, अधिसंख्य महिलाओं में मासिक धर्म अमावस्या या पूर्णिमा के आसपास ही होता है।
मासिक चक्र में ज्यादा रक्तस्नाव (खून बहना) और हार्मोन में कमी और वृद्धि महिलाओं के स्वास्थ्य और व्यवहार को काफी प्रभावित करती है। यह उनका चिड़चिड़ापन भी बढ़ा देता है। वहीं, अमावस्या के दिन मासिक धर्म होने वाली महिलाएं पूर्णिमा के दिन मासिक धर्म होने वाली महिलाओं की अपेक्षा कम चिड़चिड़ी होती हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि पूर्णिमा के दिन का चंद्रमा महिलाओं में अवसाद और मानसिक तनाव पैदा करता है। पूर्णिमा को जन्म लेने वाली महिलाएं ज्यादातर पूर्णिमा के दिन ही गर्भवती होती हैं।
हम अपने जीवन में चंद्रमा के प्रभाव का स्पष्ट अनुभव करते हैं। कई अन्य अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि चंद्रमा का सृष्टि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संपूर्ण प्रकृति, भले ही वह जड़ हो या चेतन, उसमें कंपन, धड़कन या स्पंदन होता है और वह परिवर्तनशील है।