'न भूतों न भविष्यते'- तीनों लोकों में हनुमान जैसा सर्व ज्ञानी-अतुलित बल का धाम-प्रभु का अनन्य सेवक-राक्षसी प्रवृत्ति का नाश करने वाले संकटों का मोचन करने वाले भगवान श्री हनुमान जी महाराज हर सद्बु्द्धि मनुष्य का सहयोग करते हैं। उन्होंने तुलसी दास जी का भी सहयोग किया और उनके सहयोग से ही भगवान श्री राम के चरित्र की व्याख्या करने में वे सफल हो सके। रामचरित्र मानस की रचना से पूर्व गोस्वामी तुलसी दास जी ने हनुमान-चालीसा में लिखा है-
'संकट कटे मिटे सब पीरा- जो सुमरहिं अनुमत बल बीरा'
ऐसी अद्भुत शक्ति संपन्न श्री हनुमान जी महाराज के लिए शास्त्रों में त्रिकाल चिंतन के लिए सुन्दर निर्देश दिया गया है।
सर्वदा वै त्रिकाल चं पठनियमिंद स्तवम्।
सर्वान कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।
प्रातः काल के लिए: -
प्रातः स्मरामि हनुमन्तमानन्तवीर्य श्रीरामचन्द्र चरणाम्बुजजचंचरीकम्।
लंकापुरी दहनन्दित देववृन्दं स्वार्थसिद्धसदनं प्रथित प्रभावम्।।
जो रामचंद्र जी के चरण-कमलों के भ्रमर हैं, जिन्होंने लंका पुरी के दग्ध करके देवगण को आनन्द प्रदान किया है, जो सम्पूर्ण अर्थ सिद्धियों के आगार और लोकविश्रुत प्रभावशाली हैं, उन अनंत पराक्रमशाली हनुमान जी का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूं।
मध्य माल यानी दोपहर के लिए -
मध्यं नमामि वृजिनार्णवतारणैकाधारं शरण्यमुदतानुपमप्रभवम्। सीताधिसिन्धुपरिषोषण कर्मदक्षं वन्दारूकल्पतरु मव्ययकामांजनेयम्।।
जो भव सागर से उद्धार करने के एकमात्र साधन और शरणागत के पालक हैं, जिनका अनुपम प्रभाव लोक विख्यात है, जो सीता जी की मानसिक पीड़ा रूपी सिन्धु के शोषण कार्य में परम प्रवीण और वन्दना करने वालों के लिए कल्पवृक्ष हैं, उन अविनाशी अंजनानन्दन हनुमान जी को मैं मध्यान काल में प्रणाम करता हूं।
संध्या काल के लिए -
सायं भजामि शरणोपसृताखिलार्ति पुंजप्रणाषनविधौ प्रथितप्रतापम्।
अक्षान्तकं सकल राक्षसवंषधूमकेतुं प्रमोदितविदेहसुतं दयालुम्।।
शरणागतों के सम्पूर्ण दुःख समूह का विनाश करने में जिनका प्रताप लोक प्रसिद्ध है, जो अक्षय कुमार का वध करने वाले और समस्त राक्षस वंश के लिए धूमकेतु हैं एवं जिन्होंने विदेहनन्दिनी सीता जी को आनन्द प्रदान किया है, उन दयालु हनुमान जी का मैं सायंकाल भजन करता हूं।
तुलसी दास जी लिखते हैं: -
अतुलित बलधामं हैमषैलाभ्देहं-दनुजवनकृषानुं ज्ञानिनामग्रग्यम्।
सकल गुण निधानं वानरामधिषं-रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि।।
जो अतुलित बलों के धाम, सोने के पर्वत यानी सुमेरु के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन को ध्वंस करने के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी और श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त हैं, उन पवन पुत्र हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूं। भगवान श्री राम के भक्त हनुमान जी महाराज वैद्य भी थे। इसीलिए भगवान श्री राम ने उन्हें जड़ी-बूटी लाने हिमालय भेजा था। उसकी भी अलग कथा है। फिलहाल भगवान के भक्त श्री हनुमान जी महाराज के जन्म दिन पर हम कोरोना नामक महामारी को जड़-मूल से मिटाने का प्रण लें।
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