मुड़-मुड़ के देखः आने वाले पल पर हो नजर
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जैसे-जैसे मैं जीवन में आगे बढ़ी, मैंने महसूस किया कि उम्र का बढ़ता हर साल अपने साथ एक नई कहानी लेकर आता है। जब मैं चालीसवें पड़ाव पर पहुंची, तो सबसे ज्यादा यही सवाल मुझसे पूछा गया कि क्या तुम्हें चालीस साल का होने से डर नहीं लगता? मैंने मुस्कुराकर खुद से पूछा, ‘आखिर डर किस बात का?’ मुझे एहसास हुआ कि उम्र बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि मुझे जीने के लिए एक और साल मिला है। मैं इसके लिए दिल से आभारी हूं, क्योंकि बहुत-से लोग उस उम्र तक पहुंच ही नहीं पाते, जहां वे अपने अनुभवों की रोशनी में जीवन को नए नजरिये से देख सकें।
मैंने जाना कि जीवन की सबसे बड़ी थकान उम्र बढ़ने में नहीं, बल्कि उस सच्चाई से लड़ने में है, जिसे बदला ही नहीं जा सकता। जब हम समय को रोकने की कोशिश करते हैं, तब हम अपनी शांति खो देते हैं। लेकिन, जिस दिन हम बदलती उम्र को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, उसी दिन जीवन का बोझ हल्का लगने लगता है और मन पहले से कहीं ज्यादा मुक्त हो जाता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि जवानी की खूबसूरती कम हो जाती है। मेरे लिए युवावस्था हमेशा जीवन का एक अनमोल अध्याय रहेगी, क्योंकि वहीं मैंने सपने देखे, गलतियां कीं, सीखा, गिरी, संभली और कई यादें बनाईं।
जो समय बीत गया, उसे सम्मान के साथ विदा करना चाहिए और जो नया आने वाला है, उसका खुले दिल से स्वागत। इसी सोच ने मुझे यह समझाया कि आगे का रास्ता भले ही अनजान हो, पर हर कदम मुझे अपने ही व्यक्तित्व की गहराइयों तक ले जाता है। हर नया वर्ष मुझे कुछ ऐसा सिखा देता है, जो पहले मैं नहीं जानती थी। इसलिए, आज मैं खुद से कुछ सवाल पूछती हूं। क्या मैं दस साल पहले की तुलना में ज्यादा समझदार नहीं हूं? क्या मेरे अनुभव मुझे पहले से ज्यादा मजबूत नहीं बनाते? क्या मैं अब अपनी जरूरतों, अपनी खुशियों और उन लोगों को बेहतर नहीं समझती, जिनसे मैं प्रेम करती हूं? इनके जवाबों से मुझे एहसास होता है कि उम्र ने मुझसे कुछ छीना नहीं, बल्कि बहुत कुछ दिया है।