मुड़-मुड़ के देख: उम्र तो सिर्फ समय का हिसाब है
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जब मैं छोटा था, तब मुझे जल्दी से बड़ा होने की बहुत इच्छा थी। लेकिन, एक दिन ऐसा भी आया, जब किसी ने मुझे पहली बार ‘बुजुर्ग’ कहकर संबोधित किया। सच कहूं तो यह सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा। और शायद हममें से ज्यादातर लोग ऐसा ही महसूस करते हैं। बचपन में हमें बड़ा होने की जल्दी होती है, पर उम्र के उस पड़ाव तक पहुंचने की नहीं, जहां समाज हमें ‘बुजुर्ग’ कहना शुरू कर देता है। इसकी एक वजह यह भी है कि हमारे मन में वृद्धावस्था की तस्वीर कमजोरी, अकेलेपन व जीवन के ढलने से जुड़ी होती है।
हालांकि, समय के साथ मेरी सोच बदली। मुझे एहसास हुआ कि ‘बुजुर्ग’ होना कोई नकारात्मक पहचान नहीं है। यह उन अनुभवों का सम्मान है, जिन्हें हासिल करने में पूरी जिंदगी लग जाती है। अनुभव और समझदारी किसी किताब या ग्रंथ से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए जिंदगी को जीना पड़ता है, गलतियां होती हैं, उनसे सीखते हुए कई उतार-चढ़ाव से होकर गुजरना पड़ता है। हमें तीन बातों पर खास ध्यान देना चाहिए। पहली, अपने जीवन का संपादक बनना।
जिंदगी के शुरुआती वर्षों में हम लगातार चीजें जोड़ते रहते हैं-जिम्मेदारियां, उपलब्धियां, रिश्ते, पहचान और अनुभव। लेकिन, एक समय ऐसा आता है, जब यह देखना भी जरूरी हो जाता है कि इनमें से हमारे लिए अब क्या जरूरी है और क्या केवल बोझ बन चुका है। दूसरी बात है, अपनी महारत को पहचानना। इतने वर्षों में हमने जो सीखा है, वह सिर्फ हमारा निजी अनुभव नहीं है। हमारी सफलताएं, गलतियां व संघर्ष किसी और को रास्ता दिखा सकते हैं। इसलिए, अपने अनुभव को अगली पीढ़ी के साथ बांटना चाहिए। तीसरी और सबसे जरूरी बात-अपने लोगों व समुदाय से जुड़े रहना, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ रिश्तों और संवाद की अहमियत और बढ़ जाती है।
मेरे लिए अब बढ़ती उम्र का मतलब जीवन से दूर होना नहीं, बल्कि जीवनभर सीखी बातों को समझना, दूसरों के साथ बांटना और अपने आसपास के लोगों के साथ जुड़े रहना है। आखिर उम्र तो सिर्फ समय का हिसाब है; असली बात यह है कि उस समय में हमने जीवन को कितना समझा और कितना जिया।