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दूसरी पारी: शब्द नहीं, भाव देखिए; क्योंकि हर रिश्ते में शब्दों से अधिक उनका भाव मायने रखता है

Fri, 10 Jul 2026 08:41 AM IST
Pavan अमर उजाला

सार

मेरे बेटे ने मुझे छुट्टियां बिताने के लिए अपने पास विदेश बुलाया, पर बातचीत के दौरान बार-बार मेरे आने पर होने वाले खर्च का जिक्र करता रहा। उसकी यह बात मेरे मन को खटक रही है। मैं क्या करूं? बेटे के व्यवहार से आहत सीतापुर के रामेश्वर जी को मनोवैज्ञानिक नीलकंठ ने कुछ यों सलाह दी...
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दूसरी पारी: शब्द नहीं, भाव देखिए - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हर रिश्ते में शब्दों से अधिक उनका भाव मायने रखता है। बेटे का विदेश आने का निमंत्रण देना किसी भी माता-पिता के लिए खुशी का कारण होता है, लेकिन यदि उसी बातचीत में बार-बार खर्च का जिक्र होने लगे, तो मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं मैं उस पर बोझ तो नहीं बन रहा हूं। हालांकि, किसी एक घटना के आधार पर पूरे रिश्ते को परखना भी उचित नहीं होगा। कई बार परिस्थितियां, तनाव या अभिव्यक्ति का तरीका ऐसा होता है कि सामने वाला कहना कुछ और चाहता है, पर संदेश कुछ और पहुंच जाता है। इसलिए, ऐसी स्थिति में सबसे पहले अपनी भावनाओं को स्वीकार करना जरूरी है। यह सोचना कि ‘शायद मैं ही ज्यादा सोच रहा हूं’ या ‘मुझे बुरा नहीं मानना चाहिए’ मन की पीड़ा को कम कर सकता है।
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क्या आपको पता है कि कई बार विदेश में रहने वाले बच्चे वहां की महंगी जीवनशैली और सीमित बजट के दबाव में आर्थिक पक्ष पर अधिक बात करते हैं। उनका उद्देश्य माता-पिता को ठेस पहुंचाना नहीं होता, बल्कि वे अपनी वास्तविक परिस्थितियों को साझा कर रहे होते हैं। हालांकि, यदि यही बात बार-बार दोहराई जाए, तो सामने वाले को यह संदेश मिल सकता है कि उसका आना आर्थिक बोझ तो नहीं बन रहा। इसलिए, इस असहजता को मन में दबाकर रखने के बजाय शांत और सहज तरीके से बेटे से साझा करना बेहतर होगा।

आप उससे कह सकते हैं कि उसके पास आने की इच्छा तो बहुत है, पर खर्च की बार-बार चर्चा सुनकर आपको संकोच होने लगा है और आप यह जानना चाहते हैं कि क्या वास्तव में यह उसके लिए सुविधाजनक है। जब बात शिकायत के बजाय अपनी भावना व्यक्त करने के अंदाज में कही जाती है, तो सामने वाला भी बिना रक्षात्मक हुए अपनी बात स्पष्ट कर पाता है। संभव है कि उसे एहसास ही न हो कि उसकी बातों से आपको ऐसा महसूस हो रहा है। यदि आपकी आर्थिक स्थिति इसकी अनुमति देती है, तो यात्रा के कुछ खर्च स्वयं उठाने की पेशकश भी की जा सकती है। इससे बेटे पर दबाव कम होगा और आपके मन का संकोच भी घटेगा। लेकिन, ऐसा केवल इसलिए न करें कि आप बेटे को सबक सिखाना चाहते हैं। माता-पिता का अपने बच्चों के पास जाना कोई एहसान नहीं, बल्कि रिश्तों की स्वाभाविक जरूरत होती है।
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किसी भी निर्णय से पहले यह देखें कि बेटे के व्यवहार में अपनापन अधिक दिख रहा है या खर्च की चिंता। यदि बातचीत के बाद भी आपको लगातार यह महसूस हो कि आपका स्वागत पूरे मन से नहीं हो रहा, तो यात्रा कुछ समय के लिए टाल देना बेहतर हो सकता है। किसी भी मुलाकात का आनंद तभी है, जब उसमें आत्मीयता हो। रिश्ते तभी मजबूत रहते हैं, जब उनमें सम्मान, स्पष्ट संवाद और एक-दूसरे की परिस्थितियों के प्रति संवेदनशीलता बनी रहे।

जिंदगी की दूसरी पारी बहुत महत्वपूर्ण होती है। हर शुक्रवार इस पर आपको नया पढ़ने को मिलेगा। आप अपने विचार, अनुभव या समस्याएं edit@amarujala.com पर भेज सकते हैं, विशेषज्ञों की मदद से हम कोशिश करेंगे कि संवाद का पुल बन सके।  
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