बहुत कुछ पहली बार हो रहा है, इस आम चुनाव के दौरान। पहली दफा किसी पदासीन मुख्यमंत्री की घोटाले के आरोप में और वो भी देश में आदर्श आचार संहिता लागू रहते गिरफ्तारी हुई है। खुद को बेकसूर मानने वाले और फिलहाल ईडी की हिरासत में एक मुख्यमंत्री ने जेल से कार्यकारी आदेश जारी किया है। पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी ने देश की राष्ट्रपति के खिलाफ याचिका दायर की है तो संभवत: पहली बार कोई प्रधानमंत्री आचार संहिता लागू रहते ही विदेश यात्रा पर गया है तो पहली दफा आचार संहिता लागू रहते किसी राज्य में मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ है।
पहली बार एक राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद एक मंत्री को पद की शपथ दिलाई है तो पहली दफा देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ने गुहार लगाई है कि सत्तारूढ़ भाजपा ने उसके खाते सील कर दिए हैं, पार्टी के पास प्रचार तक के पैसे नहीं हैं।
पहली बार आचार संहिता के दौरान भी ईडी, सीबीआई के विपक्षी नेताओं पर छापे जारी हैं। पहली बार घोड़ा और घास की यारी की तर्ज पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस साथ हैं। पहली दफा विपक्ष के मन में यह डर है कि यह आम चुनाव कहीं आखिरी साबित न हों तो पहली बार मतदाताओं के मन में भी यह शंका कुलबुला रही है कि भविष्य विपक्ष ही नहीं बचा तो सरकार चुनने का अर्थ क्या रह जाएगा?
कुछ गौरतलब बातें और भी हैं। मसलन पहली बार चुनावों में एआई का प्रयोग हो रहा है तो पहली दफा यह है कि राजनीतिक पार्टियों के मुखौटों में परिवारवादी नेतृत्व और व्यक्तिवादी नेतृत्व में सीधा आमना-सामना है तो यह पहली बार है कि एक सत्तारूढ़ गठबंधन जीत के प्रति आश्वस्त होने के बाद भी बंपर जीत के लिए प्रयत्नों की पराकाष्ठा किए दे रहा है।
यह भी पहली बार ही है कि अपने अस्तित्व पर आसन्न खतरे को भांप कर भी विपक्ष क्षुद्र स्वार्थों के जाल से पूरी तरह निकल नहीं पा रहा है। और यह भी कि देश के राजनीतिक फलक पर मूल्यविहीन टिकटजीवियों के सम्प्रदाय का निरंतर विस्तार होता जा रहा है।
गोया समूचा परिदृश्य ‘न भूतो’ जैसा है ‘भविष्यति’ होगा या नहीं, कहना मुश्किल है। इसके पहले 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में ऐसी स्थिति बनी थी, ‘जब करो या मरो’ की भावना के साथ विपक्ष एकजुट हुआ था और उसने श्रीमती इंदिरा गांधी की अजेय समझी जाने वाली सत्ता को उलट दिया था। ये अलग बात है कि विपक्ष की वो एकता सतही थी। लेकिन उसी के साथ भविष्य में कांग्रेस के धीरे- धीरे हाशिए पर जाने की पूर्व पीठिका तैयार हो गई थी।
अगले तीन दशकों तक कांग्रेस केन्द्र में कभी अपने दम पर तो कभी गठबंधन की बैसाखी के सहारे सत्ता में आती रही। लेकिन 2014 में उसकी सत्ता में वापसी पर लंबा ब्रेक लग गया। अभी भी वह ऐसे मुद्दों की तलाश में है, जो उसे वापस सत्ता दिला सके। वो भरोसा, जिसके बूते खुद कांग्रेसी ही अपनी पार्टी में न्याय मिलने को लेकर आश्वस्त हो सकें। वो विश्वास, जो कांग्रेस के प्रति अल्पसंख्यकों से भी ज्यादा बहुसंख्यकों में था, कैसे लौट सके। कैसे पार्टी तुष्टिकरण के पूर्वाग्रह को लांघ कर सर्वजन हिताय के रथ में सवार हो सके। कैसे वह अपने ही अंतर्विरोधों को गटककर एक मजबूत और प्रतिबद्ध सेना के रूप में मतदाता के सामने आ सके।
खतरे तो भाजपा के सामने भी हैं। महासागर का रूप ले चुकी पार्टी अब विचारों से ज्यादा सत्ताग्रही आचारों से नियंत्रित और संचालित हो रही है। अगर कांग्रेस को किसी दमदार नायक की तलाश है तो भाजपा के सामने एक अधिनायक की विराट छवि में खुद के गुम जाने का खतरा है।
एक चेहरे पर अति निर्भरता उसे भविष्य में कांग्रेस की राह पर ले जा सकती है। भाजपा और संघ ने एक सुचिंतित रणनीति और लक्ष्य के तहत धर्मनिरपेक्षता की परतें उधेड़ कर उसमें बहुसंख्यक समाज की हैसियत और वर्चस्व को संस्थापित किया, लेकिन इसका अतिवाद खुद उसके अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी बन सकता है। क्योंकि एकजुटता में ही अंतर्विरोधों के बीज छुपे होते हैं।
बेशक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज देश के सबसे लोकप्रिय और दमदार नेता हैं। देश के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उनसे सम्मोहित है। लेकिन यह स्थिति भाजपा के सत्ता में लौटने की आश्वस्ति से ज्यादा पार्टी संगठन के हाशिए पर चले जाते जाने का अलार्म भी है, जिसे भाजपा और संघ में अंदरूनी तौर पर महसूस किया जा रहा है।
अधिनायकत्व का बड़ा कारण अक्सर आत्ममुग्धता और अति आत्म विश्वास होता है। लेकिन पैरों से नीचे खिसकती जमीन का अहसास उसके खिसक जाने के बाद ही होता है, बशर्तें कि संगठन के कील कांटे समय पर ही दुरूस्त न कर लिए जाएं। वोटों की किसी भी कीमत पर गोलबंदी अगर लोकतंत्र की अनिवार्य बुराई है तो जनता के मानस का बदलना भी ठोस सच्चाई है।
लोगों की बदलती, बढ़ती चेतना, अपेक्षाएं आशा और निराशा का भाव ही किसी न किसी राजनीतिक विचार के आवरण में जनाकांक्षा के रूप में उभरता है और मतदातााओं, समूहों को नए सिरे से गोलबंद करता है। यह गोलबंदी एक सीमा तक विस्तारित होते जाने के बाद अपने चरम पर जाकर नया मोड़ लेती है, जो किसी नए राजनीतिक, सामाजिक अथवा आर्थिक आंदोलन, हिंसा और सत्ता परिवर्तन के रूप में रूप में भी हो सकता है। अयोध्या में रामलला मंदिर और कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति के रूप में चरम पर पहुंचा एक राजनीतिक और धार्मिक चेतना से उपजा ज्वार अब उतार पर है।