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हेमंत करकरे शहीद नहीं होते तो क्या साध्वी प्रज्ञा के मामले में उन पर कार्रवाई हो सकती थी?

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आखिर क्यों साध्वी प्रज्ञा ने दिया शहीद हेमंत करकरे पर विवादित बयान? - फोटो : अमर उजाला
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आखिरकार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने ‘शहीद हेमंत करकरे के सर्वनाश’होने कथित श्राप वाले बयान को दिनभर मचे हंगामे के बाद वापस ले लिया और बीजेपी ने उसे उनका निजी बयान मानकर उनसे किनारा कर लिया। लेकिन भोपाल से बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहीं साध्वी के इस बयान से देश की राजनीति में एक बार फिर से उबाल आ गया है। इस राजनीति के केंद्र में एक बार फिर से हेमंत करकरे, मालेगांव ब्लास्ट के आरोपियों और हिंदू आतंकवाद का मामला सामने उठकर आया है।

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दरअसल, साध्वी प्रज्ञा की शहीद हेमंत करकरे पर बयानबाजी के बीच जो सवाल सामने आए हैं उनमें सबसे अहम यह है कि क्या  मुंबई आतंकी हमले के दौरान अगर लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी अजमल कसाब और अबु इस्माइल की गोली से करकरे मारे न गए होते तो हिंदू आतंकवाद का छद्म हव्वा खड़ा करने के आरोप में उनके ख़िलाफ़ जांच हो सकती और वह जेल भी जा सकते थे? 

 

साध्वी प्रज्ञा दोषी भी हैं और बेकसूर भी? 
दरअसल, कोई भी आरोपी, चाहे वह स्त्री या पुरुष, किसी मुक़दमे में या तो कसूरवार होता है या बेकसूर। कोई आरोपी कसूरवार और बेकसूर दोनों नहीं हो सकता है? लेकिन मालेगांव बम कांड 2008 की मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर दोषी भी हैं और बेकसूर भी। जब दिल्ली और महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार थी, तब वह दोषी थीं। अब दोनों जगह बीजेपी सरकार है, तब वह बेकसूर हैं। मतलब यहां कसूरवार या बेकसूर होने का फैसला अदालत से नहीं, राजनीतिक दलों के हिसाब से हो रहा है।

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संभवतः ऐसी विचित्र मिसाल भारत जैसे देश में ही देखने को मिल सकती है, जहां किसी केस में कोई दोषी है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस आरोपी की वफादारी किस राजनीतिक दल के प्रति है। 

बहरहाल, जैसा कि सब जानते हैं, न्यायिक हिरासत में क़रीब आठ साल से जेल में रहीं साध्वी प्रज्ञा को नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) की ओर से 13 मई 2016 को दायर पूरक आरोपपत्र में क्लीनचिट दी जा चुकी है। उसके बाद ही कानूनी औपचारिकता पूरी होते ही साध्वी को ज़मानत मिल गई। साध्वी को क्लीनचिट देने का अर्थ है कि बमकांड में उनके ख़िलाफ़ जांच एजेंसियों के पास ऐसे सबूत नहीं थे, जिससे उन्हें दोषी साबित किया जा सकता। इसका यह भी मतलब होता है कि साध्वी और अन्य दूसरे पांच आरोपियों को बिना ठोस सबूत के ही गिरफ़्तार कर लिया गया था। यानी जिस अपराध ने उनकी ज़िंदगी के आठ कीमती साल छीन लिए, उस अपराध को उन्होंने किया ही नहीं था।

इसी तरह ब्लास्ट के दूसरे आरोपी सैन्य अफसर लेफ़्टिनेंट कर्नल प्रसाद, श्रीकांत पुरोहित सहित मकोका की कठोर धारा के तहत अरेस्टेड 11 में से 10 आरोपियों के ख़िलाफ़ मकोका लगाने के सबूत ही नहीं था। लिहाज़ा, एनआईए ने सभी आरोपियों को मकोका मुक्त कर दिया। 

साध्वी प्रज्ञा-दिग्विजय सिंह भोपाल सीट पर आमने-सामने हैं। - फोटो : PTI
एटीएस का काम और एनआईए का गठन
दरअसल, कांग्रेस के शासन में इतने ज़्यादा आतंकी हमले हुए कि जांच एजेंसियों पर लोड बढ़ गया। उस लोड को कम करने के लिए एनआईए का गठन कांग्रेस शासन में मुंबई आतंकी हमले के बाद 31 दिसंबर 2008 को किया गया और उसे 2008 के मालेगांव बमकांड की जांच का कार्य एक अप्रैल 2011 को सौंपा गया था। तब तक जांच महाराष्ट्र एटीएस ही कर रही थी और एटीएस दो आरोपपत्र (मुख्य और पूरक) दायर भी कर चुकी थी। यानी एनआईए को केस दिए जाने तक क़रीब ढाई साल प्रज्ञा (गिरफ्तारी- 23 अक्टूबर 2008) और पुरोहित (गिरफ़्तारी- 5 नवबंर 2008) एटीएस की कस्टडी या न्यायिक हिरासत में थे।

हालांकि, पुरोहित की पत्नी अपर्णा पुरोहित आरोप लगाते हुए कहती हैं, "एटीएस पुरोहित को 29 अक्टूबर 2008 से ही हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही थी। पुरोहित के साथ थर्ड डिग्री और अमानवीय तरीके से इंटेरोगेशन हुआ। पूछताछ ने नाम पर कर्नल आरके श्रीवास्तव के अलावा करकरे, खानविलकर, परमवीर सिंह और शेखर बागड़े जैसे पुलिस अफसर पुरोहित को टॉर्चर करते रहे। इतना टॉर्चर किया कि पुरोहित का घुटना फिर से क्षतिग्रस्त हो गया। गौरतलब है पुरोहित कश्मीर में एक आतंकी मुठभेड़ में घायल हुए थे और उनके घुटने की बड़ी सर्जरी हुई थी।"

बहरहाल, इसी तरह के आरोप एटीएस पर साध्वी प्रज्ञा भी लगाती हैं। उनका आरोप है कि कस्टडी के दौरान उऩहें थर्ड डिग्री टॉर्चर किया गया और एक महिला के रूप में उनकी मर्यादा को तार-तार किया गया।

तो फिर करकरे जिंदा होते तो सवालों के घेरे में होते? 
अब सवाल उठता है कि इतनी लंबी कस्टडी के बावजूद आख़िर एटीएस की टीम कथित तौर पर थर्ड डिग्री टॉर्चर और मर्यादा भंग का इस्तेमाल करने के बावजूद प्रज्ञा, पुरोहित और दूसरे नौ आरोपियों के ख़िलाफ़ ऐसे सबूत क्यों नहीं जुटा पाई, जिनसे उनकी गिरफ़्तारी को न्यायोचित ठहराया जा सकता और बमकांड में उनकी संलिप्तता साबित की जा सकती। ले-देकर सबूत के रूप में एटीएस के पास क्षतिग्रस्त बाइक और सभी आरोपियों एवं गवाहों के एकबालिया बयान थे, जिसे, जैसा कि आरोपियों और गवाहों का आरोप है, एटीएस ने थर्ड डिग्री इंटेरोगेशन के ज़रिए ज़बरदस्ती कबूलवाया था। यानी बिना पुख़्ता सबूत के एक महिला और सैन्य अधिकारी को जेल में रखने का क्या औचित्य था? इस सवाल का जवाब करकरे अगर ज़िंदा होते तो उन्हें देना ही पड़ता।

साध्वी प्रज्ञा जेल में खुद के साथ प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाती हैं। - फोटो : फाइल फोटो
आखिर क्यों सवालों के घेरे में आते करकरे? क्या कहते हैं आरोप-पत्र?  
दो साल पहले साध्वी और पुरोहित के लगाए आरोपों के बाद यह सवाल भी उठा था, क्या करकरे अपने पद का दुरुपयोग कर रहे थे? क्या वह निष्पक्ष नहीं, बल्कि पूर्वाग्रहित और पक्षपाती पुलिस अधिकारी थे? क्या हर केस की जांच वह इसी तरह कर रहे थे? क्या साध्वी और पुरोहित को गिरफ्तार कर उन्होंने ब्लंडर किया था? क्या उन्होंने किसी व्यक्ति या व्यक्तियों अथवा राजनीतिक दल के इशारे पर ‘हिंदू आतंकवाद’का हव्वा खड़ा किया? जिसका इस्तेमाल अब पाकिस्तान भारत के खिलाफ अकसर करता है।

इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िर करकरे सारी सूचनाएं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के साथ क्यों शेयर करते थे? वह एटीएस चीफ के रूप में तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को रिपोर्ट करते थे या फिर दिग्विजय सिंह को? अगर वह दिग्विजय सिंह को रिपोर्ट नहीं करते थे, तब उन्हें अक्सर फोन क्यों करते थे? इन यक्ष प्रश्नों के उत्तर एटीएस और एनआईए की ओर से दायर तीनों आरोपपत्रों में भी नहीं मिलता है।

कुछ और भी सवाल उठते हैं? 
यह भी सवाल उठता है कि जब करकरे की जान को वाक़ई ख़तरा था, जैसा कि दिग्विजय सिंह दावा करते हैं कि करकरे ने उनसे कहा था कि उनकी जान को ख़तरा है, तब करकरे ने दिग्विजय को ही यह बात क्यों बताई? करकरे की जान को अगर वाक़ई खतरा था तब, उन्होंने राज्य के मुखिया चीफ मिनिस्टर या विभाग के मुखिया गृहमंत्री अथवा स्टेट पुलिस के मुखिया पुलिस महानिदेशक या मुंबई पुलिस के मुखिया मुंबई पुलिस कमिश्नर को बताने की बजाय दिग्विजय सिंह को बताना क्यों उचित समझा? जबकि दिग्विजय उस समय संसद सदस्य भी नहीं थे। क्या इस तरह की कोई मिसाल मिलती है? जब किसी शीर्ष पुलिस अफसर को जान का ख़तरा हो और उसने किसी नेता से गुहार लगाई हो? क्या किसी पुलिस अफसर के ऑफिशियल फोन से कभी किसी ऐसे नेता को फोन किया गया है, जिस नेता से उसका कोई फ़ॉर्मल कनेक्शन ही न हो।

क्या है दिग्विजय सिंह की भूमिका? 
बतौर सबूत दिग्विजय सिंह टेलीफोन कॉल के बिल भी सार्वजनिक कर चुके हैं, जिससे साबित हो जाता है कि करकरे उन्हें अपने ऑफिशियल लैंडलाइन से वाक़ई कॉल किया करते थे। करकरे की इस कांग्रेस नेता से इतनी ज़्यादा आत्मीयता थी कि वह उनसे निजी बातें भी शेयर करते थे।

दरअसल, करकरे के शहीद हो जाने के एक साल बाद दिग्विजय ने छह दिसंबर 2010 को मुंबई में एक सभा में यह दावा किया था कि मुंबई आतंकी हमले में शहीद होने से पहले करकरे ने उन्हें फोन किया था और कहा था कि मालेगांव बमकांड में ‘हिंदू आतंकवादियों’को पकड़ने से उनकी जान को दक्षिणपंथी यानी हिंदू संगठनों से ख़तरा है।

दिग्विजय सिंह का बयान इतना विवादास्पद था कि कांग्रेस को आधिकारिक रूप से उनके बयान को उनका निजी विचार बताना पड़ा। यहां तक कि करकरे की पत्नी कविता करकरे ने भी बयान जारी करके दिग्विजय सिंह के दावे की निंदा की थी। 

इतना ही नहीं, दिग्विजय सिंह ने उर्दू के पत्रकार अज़ीज़ बर्नी की किताब ‘आरएसएस की साज़िशः 26/11’का विमोचन भी किया, जिसमें बर्नी ने भी साबित करने की हर संभव कोशिश की है कि 1993 के बाद देश में जितने ब्लास्ट हुए, सब ‘हिंदू आतंकवादी’कर रहे हैं। हालांकि, बाद में इसके लिए बर्नी को माफ़ी मांगनी पड़ी थी।

इसी दौरान तीन दशक महाराष्ट्र पुलिस सेवा में रहे आईपीएस एसएम मुश्रीफ़ की किताब ‘हू किल्ड करकरे’ आई, जिसमें में भी दावा किया गया कि करकरे की हत्या कसाब ने नहीं की, बल्कि आरएसएस के इशारे पर इंटेलिजेंस ब्यूरो ने करवाई।

बहरहाल, ऐसी अतार्किक बात किताब में लिखने वाले बर्नी और मुश्रीफ़ के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न तो कांग्रेस सरकार ने की और न ही भाजपा सरकार ने।
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हेमंत करकरे शहीद नहीं हुए होते तो क्या उन पर कार्रवाई संभव थी? - फोटो : फाइल फोटो
क्यों हो सकती थी करकरे पर कार्रवाई़? 
इसमें दो राय नहीं कि दिग्विजय सिंह का बयान और करकरे से उनकी बातचीत के सबूत मालेगांव बमकांड में करकरे की भूमिका संदिग्ध बनाते हैं। इस मामले से जुड़े वकीलों और पत्रकारों का तो यहां तक कहना है कि अगर करकरे ज़िंदा रहे होते तो गलत जांच के आरोप में उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई संभव थी, जिनमें उनकी गिरफ़्तारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता था। एनआईए के पूरक आरोपपत्र से पूरी जांच व्यवस्था पर सवालिया निशान पैदा होता है। 

इधर, साध्वी और पुरोहित की रिहाई के बाद राजनीतिक गलियारे में यह सवाल कौंधने लगा था कि तथाकथित ‘हिंदू आतंकवाद’का हव्वा खड़ा करने के लिए एक महिला को झूठी साज़िश में क्यों फंसाया गया? जब क्लीनचिट देना था, उसे बिना किसी पुख़्ता सबूत के आठ साल जेल में क्यों रखा गया? दूसरा सवाल है कि अगर साध्वी वाकई तथाकथित हिंदू टेरर मॉड्यूल से जुड़ी और मालेगांव बमकांड में शामिल हैं तो उन्हें और दूसरे आरोपियों को एनआईए की ओर से राहत क्यों दी गई? इतना ही नहीं, सवाल यह भी है कि पुरोहित समेत 11 में से दस आरोपियों पर से मकोका क्यों हटा लिया गया?

एटीएस और एनआईए आमने-सामने? 
इधर, पूरक आरोपपत्र में एनआईए ने एटीएस पर कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं। आरोप इतने ज्यादा संगीन हैं कि एटीएस की भूमिका की ही जांच की ज़रूरत है। यहां फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी कर्नाटक के डायरेक्टर रह चुके बीएम मोहन के दावे पर गौर करना होगा, क्योंकि उनके कार्यकाल में कई अहम नार्को टेस्ट हुए थे।

बीएम मोहन ने कुछ साल पहले मीडिया से बातचीत के दौरान दावा किया था कि सिमी के कुछ आतंकियों का नार्को टेस्ट करते समय समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव ब्लास्ट के बारे में अहम् जानकारियां मिली थीं। मोहन का दावा था कि इन इनपुट्स के आधार पर जांच एजेंसियां अगर सबूत जुटातीं, तो आतंकवादी धमाकों की कहानी कुछ और होती। उनका कहना है कि नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग, लाइडिटेक्टर तीनों ही टेस्ट में सिमी के आतंकियों ने समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव ब्लास्ट में हाथ होने की बात स्वीकारी थी। इन लोगों ने सिमी चीफ सफदर नागौरी की पूरी साज़िश का ख़ाका तैयार किए जाने की बात भी कही थी।
 
तो फिर करकरे पर क्यों उठते हैं सवाल? 
हेमंत करकरे ने आख़िर एफएसएल के इनपुट्स पर ध्यान देकर जांच क्यों नहीं की? जब साध्वी व अन्य के ख़िलाफ़ सबूत नहीं मिले तो दूसरे एंगल की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? करकरे काबिल अफसर माने जाते थे। वह सात साल रॉ अधिकारी के रूप में ऑस्ट्रिया में रह चुके थे और कहा जाता है कि कंधार विमान हाइजैक में आतंकियों से संपर्क स्थापित करने में अहम रोल निभाया था और आईबी के अजित डोवाल की मदद की थी, जिससे यात्री सुरक्षित भारत लाए जा सके थे। संभवतः इसीलिए जनवरी 2008 में उन्हें केपी रघुवंशी की जगह एटीएस प्रमुख बनाया था।

बहरहाल, मालेगांव ब्लास्ट की सुनवाई फिलहाल मुंबई कोर्ट में चल रही है। लिहाजा, अदालत को ही तय करना होगा कि इनमें से किन तथ्यों के आधार पर केस की सुनवाई आगे बढ़ाई जाए, क्योंकि अंततः मालेगांव ब्लास्ट में दूध का दूध पानी का पानी अदालत को ही करना है। ताकि साध्वी को क्लीनचिट देने से उठे सवालों का जवाब मिल सके।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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