कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी
कांग्रेस के मथुरा के उम्मीदवार महेश पाठक के कहने पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन नेताओं को दोबारा पार्टी में शामिल करा दिया। प्रियंका ने जैसा ट्विटर पर लिखा, वो इस फैसले से बहुत दुखी थीं। मैं 3 दिन पहले मथुरा में था, स्थानीय पत्रकारों और आम लोगों ने जो बताया, उसके मुताबिक महेश पाठक दूर-दूर तक लड़ाई में नहीं है। वो ब्राह्मण वोटों की लामबंदी करके अधिक से अधिक हेमामालिनी का नुकसान कर सकते हैं, इससे अधिक की फिलहाल उनकी हैसियत नहीं।
दरअसल, राजनीति नफे-नुकसान का खेल होती है। फिलहाल मथुरा में कांग्रेस की जो हालात हैं, उसे देखते हुए अगर वो नैतिक आधार पर प्रियंका चतुर्वेदी के साथ खड़ी नहीं हो सकती थी तो कम से कम नफे और नुकसान के आधार पर ही सोचना चाहिए था। उन उद्दंड किस्म के नेताओं को बहाल कर पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर यही मैसेज दिया कि उसके लिए महिला सम्मान से अधिक महत्वपूर्ण चुनाव जीतना है। चूंकि कांग्रेस मथुरा में चुनाव जीतने से रही, इसलिए पार्टी ने एक साथ दो मोर्चों पर अपना नुकसान करा लिया। प्रियंका चतुर्वेदी की सार्वजनिक नाराज़गी से उसने महिला सम्मान के मसले पर राष्ट्रीय स्तर पर एक नैरेटिव खो दिया और मथुरा तो कभी उसका था ही नहीं।
राजनीतिक दल कंपनियों जैसे हो गए हैं, उनमें काम कर रहे नेता, प्रवक्ता, कार्यकर्ता, एम्प्लॉयीज जैसे।
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बहरहाल, जिस भी रणनीतिकार ने ये सलाह दी होगी कांग्रेस को उसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करना चाहिए। बात करते हैं प्रियंका में शामिल होने की। एक बात क्लियर है राजनीतिक दल कंपनियों जैसे हो गए हैं, उनमें काम कर रहे नेता, प्रवक्ता, कार्यकर्ता, एम्प्लॉयीज जैसे। करियर ग्रोथ के लिए एम्प्लॉयीज लगातार कंपनियां बदलते रहते हैं, जिसे वो जम्प लेना कहते हैं। वैसे ही नेता, प्रवक्ता भी ग्रोथ के हिसाब से तय करते हैं कि किस दल में कब तक रुकना है। अब दरी बिछाने या पार्टी का इतिहास पढ़ते के बजाय अपनी सीवी अपडेट करते रहते होंगे और स्किल सेट पर काम करते होंगे।
पार्टियों को भी अब खुदको बदलना होगा
दलों को भी अब ख़ुद को अपग्रेड करना चाहिए। बाकायदा HR की टीम रखनी चाहिए, CTC तय करनी चाहिए। इससे नेताओं, प्रवक्ताओं और कार्यकर्ताओं को आवाजाही में सुविधा होगी। प्राइवेट नौकरी में ऐसे ही होता है। बहुत से किस्से हैं कि आदमी सुबह में मॉर्निंग मीटिंग कहीं अटेंड करता है और शाम में कहीं और जाकर काम करता है। तो क्या राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट कल्चर अपनाना चाहिए, आम आदमी को भी समझने में सुविधा होगी?
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