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कहीं अपना सियासी नुकसान तो नहीं कर बैठीं ममता? आखिर क्या मिला धरने से?

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क्या ममता ने भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता को कम किया या उसे और बढ़ा दिया? - फोटो : PTI
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आठ फरवरी तक चलने वाला ममता बनर्जी का धरना अफरा-तफरी में तीन दिन पहले ही खत्म करना पड़ा। महागठबंधन के इकलौते प्रतिनिधि के तौर पर चंद्रबाबू नायडू उस वक्त ममता के साथ खड़े दिखे। सुबह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही यह लगने लगा था कि ममता बनर्जी को अब हथियार डालना पड़ेगा।

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पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के समर्थन में अचानक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रातोंरात धरने पर बैठकर और सीबीआई से जंग के सवाल पर मोदी के खिलाफ अपनी नाराज़गी को इस तरह जाहिर करके ममता ने क्या खोया और क्या पाया? क्या उनके इस कदम से महागठबंधन मज़बूत हुआ या फिर इस सवाल पर उसमें और दरार नज़र आ गई? ं

क्या इस धरने और ममता के गुस्से भरे तेवर ने भाजपा की पश्चिम बंगाल में बढ़ती लोकप्रियता को कम किया या उसे और बढ़ा दिया? यह जानते हुए भी कि चुनावी वक्त में तमाम भाजपा विरोधी नेताओं से जुड़े सारे मामले और तेजी से खुलेंगे और  शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर जिस तरह की राजनीति चलती रही है, वह और मुखर होगी, ममता ने खुलकर राजीव कुमार का साथ क्यों दिया, ये सारे सवाल अब हर खेमे में गंभीरता से उठाए जाने लगे हैं।
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आखिर क्या मिला ममता बनर्जी को
तो क्या ममता बनर्जी सचमुच अपने राज्य में भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता और रैलियों में जुटने वाली जबरदस्त भीड़ से घबरा गई हैं या फिर इस बहाने दो दिनों तक लगातार मीडिया पर छाकर उन्होंने जिस तरह मोदी सरकार के खिलाफ एक माहौल बनाने की कोशिश की वह आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति में कोई बदलाव ला सकता है? अगर आपने टीवी चैनलों पर लगातार दो दिनों तक इस बारे में बहसें सुनी हों, तो साफ हो जाता है कि इतनी जबरदस्त कवरेज के बावजूद ममता भाजपा के खिलाफ वो माहौल नहीं बना पाईं, जिसकी उन्हें उम्मीद थी।
 

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इस मामले का असर आने वाले चुनाव पर होगा। - फोटो : फाइल फोटो
सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह राजीव कुमार को सीबीआई के सामने पेशी का हुक्म दिया और उनपर जांच से भागने के आरोप लगे, दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल सरकार ने शारदा चिटफंड घोटाले के बारे में बार-बार जो सफाइयां पेश कीं, लेकिन राजीव कुमार के पक्ष में मजबूत दलीलें नहीं पेश कर पाई, उससे कहीं न कहीं ममता बनर्जी का आत्मविश्वास डगमगाया है। जाहिर है, इस स्थिति का फायदा भाजपा हर तरीके से उठाने वाली है और अपनी आगामी रैलियों में ममता और महागठबंधन के नेताओं के खिलाफ माहौल बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाली है।

लेकिन इस पूरे मामले में अगर सबसे ज्यादा किसी की विश्वसनीयता और राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं तो वह है सीबीआई और कोलकाता पुलिस, जिस तरह दोनों के बीच टकराव को लेकर सियासत हुई, उससे इतना साफ हो गया कि सीबीआई की इस कार्रवाई को हर हाल में चुनावी चश्मे से ही देखा जाएगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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