कांग्रेस की समस्या यह है कि वह भाजपा पर हमला करने के बजाय केवल एक नरेंद्र मोदी पर हमला करने को मजबूर है।
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सबसे पहले यूपीए की बात करते हैं। कांग्रेस कह रही है कि वह जुमला नहीं बल्कि ' हम निभाएंगे' की कसम खा रहे हैं। उनके मुद्दों में गरीबी उन्मूलन से लेकर सामाजिक क्षेत्रों पर अधिकाधिक जोर और देश में अमन-चैन का माहौल कायम करना शामिल है। साथ ही कांग्रेस ने एएफएसपीए (अस्पा) में मानवीय दृष्टिकोण से बदलाव करने तथा उसे नागरिकोन्मुख बनाने तथा देशद्रोह कानून के प्रावधानों में बदलाव का वादा किया है।
कांग्रेस की समस्या यह है कि वह भाजपा पर हमला करने के बजाय केवल एक नरेंद्र मोदी पर हमला करने को मजबूर है। फिर चाहे वह राफेल का सवाल हो या फिर नोटबंदी या जीएसटी का। यानी वह भाजपा को कटघरे में खड़ा कर ही नहीं पा रही है।
इसका एक संदेश यह जा रहा है कि कांग्रेस और उसके गठबंधन के घटक दल सब मिलकर एक अकेले नरेंद्र मोदी पर टूट पड़े हैं। भाजपा इसे समझ चुकी है और वह कर भी ऐसा ही रही है ताकि आम जनता को यह लगे कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम सभी विपक्षी हैं।
भाजपा के लिए सकारात्मक पक्ष यह है कि वह राष्ट्रवाद, सेना, विकास आदि के सवाल पर कांग्रेस पर भारी पड़ रही है। वह यह संदेश देने में लगभग कामयाब हो गयी है कि महंगाई, गरीबी, रोजगार, मॉब लिंचिंग, राफेल, भ्रष्टाचार आदि के सवाल गौण हैं। यहां तक कि वह लोगों के मन से 15 लाख का जुमला भी लगभग निकाल चुकी है।
जातिगत समीकरणों के लिहाज से भी देखें तो दोनों गठबंधनों में कोई खास फर्क नहीं है।
लिहाजा, चुनाव के दौरान जनता किसके पक्ष में वोट करेगी, एक सवाल है और इसका जवाब 23 मई को ही मिलेगा। लेकिन सवाल यह है कि लोकसभा चुनाव 2019 क्या भारत के लोकतंत्र के लिहाज से सकारात्मक चुनाव साबित हो सकेगा? सकारात्मक चुनाव का मतलब यह कि चुनाव परिणाम के बाद देश में लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास बढ़े, संविधान की रक्षा हो और देश जनता के हितों के दृष्टिकोण से विकास के रास्ते पर आगे बढ़े।
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