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ये है चुनावों का असली गणित, भाजपा-कांग्रेस जानती है जनता की ये सच्चाई?

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लोकसभा चुनाव-2019 अब अहम मोड़ पर है। - फोटो : PTI
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लोकसभा चुनाव-2019 अब अहम मोड़ पर है। अहम मोड़ का मतलब यह कौन सी पार्टी किसी गठबंधन का हिस्सा होगी, कौन नेता किस दल को छोड़कर किस दूसरे दल में जाएगा, कौन पार्टी किस जाति/समुदाय/धर्म के हिसाब से किस स्थान पर किस जाति/समुदाय/धर्म के आधार उम्मीदवार तय करेगी आदि सब लगभग तय हो चुके हैं। 

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मुख्य रूप से दो गठबंधन हैं जिनमें से एक चुनाव के बाद देश पर राज करेगा। एक गठबंधन है भाजपा का। इसका नाम नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन। दूसरा गठबंधन है कांग्रेसनीत यूपीए यानी यूनाईटेड प्रोग्रेसिव एलायंस। हिंदी में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन। 

दोनों गठबंधनों के नामों में छिपे तिकड़मों/रणनीति/मकसद को छोड़ दें तो आम जनता के पास अहम सवाल यह है कि वह किस गठबंधन के पक्ष में मतदान करे। उसके पास वजहें क्या हैं।
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कांग्रेस की समस्या यह है कि वह भाजपा पर हमला करने के बजाय केवल एक नरेंद्र मोदी पर हमला करने को मजबूर है। - फोटो : अमर उजाला
सबसे पहले यूपीए की बात करते हैं। कांग्रेस कह रही है कि वह जुमला नहीं बल्कि ' हम निभाएंगे' की कसम खा रहे हैं। उनके मुद्दों में गरीबी उन्मूलन से लेकर सामाजिक क्षेत्रों पर अधिकाधिक जोर और देश में अमन-चैन का माहौल कायम करना शामिल है। साथ ही कांग्रेस ने एएफएसपीए (अस्पा) में मानवीय दृष्टिकोण से बदलाव करने तथा उसे नागरिकोन्मुख बनाने तथा देशद्रोह कानून के प्रावधानों में बदलाव का वादा किया है।

कांग्रेस की समस्या यह है कि वह भाजपा पर हमला करने के बजाय केवल एक नरेंद्र मोदी पर हमला करने को मजबूर है। फिर चाहे वह राफेल का सवाल हो या फिर नोटबंदी या जीएसटी का। यानी वह भाजपा को कटघरे में खड़ा कर ही नहीं पा रही है। 

इसका एक संदेश यह जा रहा है कि कांग्रेस और उसके गठबंधन के घटक दल सब मिलकर एक अकेले नरेंद्र मोदी पर टूट पड़े हैं।  भाजपा इसे समझ चुकी है और वह कर भी ऐसा ही रही है ताकि आम जनता को यह लगे कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम सभी विपक्षी हैं।

भाजपा के लिए सकारात्मक पक्ष यह है कि वह राष्ट्रवाद, सेना, विकास आदि के सवाल पर कांग्रेस पर भारी पड़ रही है। वह यह संदेश देने में लगभग कामयाब हो गयी है कि महंगाई, गरीबी, रोजगार, मॉब लिंचिंग, राफेल, भ्रष्टाचार आदि के सवाल गौण हैं। यहां तक कि वह लोगों के मन से 15 लाख का जुमला भी लगभग निकाल चुकी है।

जातिगत समीकरणों के लिहाज से भी देखें तो दोनों गठबंधनों में कोई खास फर्क नहीं है। 

लिहाजा, चुनाव के दौरान जनता किसके पक्ष में वोट करेगी, एक सवाल है और इसका जवाब 23 मई को ही मिलेगा। लेकिन सवाल यह है कि लोकसभा चुनाव 2019 क्या भारत के लोकतंत्र के लिहाज से सकारात्मक चुनाव साबित हो सकेगा? सकारात्मक चुनाव का मतलब यह कि चुनाव परिणाम के बाद देश में लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास बढ़े, संविधान की रक्षा हो और देश जनता के हितों के दृष्टिकोण से विकास के रास्ते पर आगे बढ़े।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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