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राष्ट्रवाद की कोख से उपजी राजनीतिक क्रांति की सुनामी

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मोदी की 2019 के चुनावों में जीत कई मायनों में ऐतिहासिक है। - फोटो : अमर उजाला
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हुआ तो आखिर वही जिसकी बहुतों को उम्मीद थी, कइयों को आशंका और कुछ को भय। उम्मीदें और सपने भी सच हुए, आशंकाएं भी सही थीं और भय भी सोच से अधिक डरावना निकला। नरेंद्र मोदी नाम की सुनामी ने अपने समर्थकों की उम्मीदों को पूरा किया और विरोधियों के सपनों को धराशायी कर दिया।

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2014 में सत्ता का विरोध कर महाविजय हासिल करने वाले मोदी 2019 में अपनी सत्ता कायम रखते हुए उससे भी प्रचंड विजय के साथ फिर अपने लोकतिलक के लिए तैयार हैं। 2014 में 10 साल की संप्रग सरकार के भ्रष्टाचार और नाकामी पर जबर्दस्त हमले करने वाले मोदी 2019 में बालाकोट होते हुए अपने लक्ष्य पर सटीक निशाना लगाने में कामयाब हुए हैं। 

मोदी विजय की अनोखी कहानी 
मतदान के अंतिम चरणों में सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस संदेश में कोई अतिशयोक्ति नहीं दिखाई देती कि पूरी 542 सीटों पर केवल एक ही व्यक्ति चुनाव लड़ रहा था- नरेंद्र मोदी। भाजपा के उम्मीदवार सब गौण हो गए थे। उम्मीदवार को अनदेखा कर लोग सिर्फ मोदी को जिताने के लिए वोट कर रहे थे।

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पूरी 542 सीटों पर केवल एक ही व्यक्ति चुनाव लड़ रहा था- नरेंद्र मोदी। - फोटो : अमर उजाला
मोदी ने भारत के चुनावों का प्रारूप ही बादल दिया। इसे उन्होंने “प्रेसिडेंशियल फॉर्म ऑफ इलेक्शन” में तब्दील कर दिया। जैसा कि आज ट्विटर पर मुझे कुमार सिद्धार्थ ने लिखा– पॉलिटिकल साइंस में पढ़ा था कि सांसद मिलकर प्रधानमंत्री चुनते हैं पर आज देखा कि प्रधानमंत्री अपने सांसद चुन रहा है। ऐसे अनगिनत किस्से हैं जिनमें लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर सफर कर सिर्फ इसलिए वोट देने गए कि कहीं मोदीजी हार ना जाएं। जैसे पुणे से 19 मई को इंदौर आईं वो मां-बेटी जो मतदान करते ही तुरंत लौट गईं। पर उन्हें उस वक्त ये डर सता रहा था कि मोदीजी कहीं हार ना जाएं। 

जनमानस पर मजबूत पकड़ 
इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के मानस में मौजूद बारीक तत्वों को बहुत करीने से पकड़ा है। भारतीय समाज जिस नायकत्व को तलाशता है उसकी उन्हें पहचान है। भारत को सारे दु:खों को हर लेने वाला एक मसीहा चाहिए। ऐसा मसीहा जो वर्षों के संत्रास हरने वाला हो। एक ऐसी खूंटी जिस पर हम अपनी सारी समस्याएं टांग कर निश्चिंत हो सकें। जो केवल साहसी ही नहीं हो बल्कि दुस्साहस भी दिखा सके। मोदी ने वर्ग संघर्ष और जातीय समीकरणों में उलझे समाज को भी झकझोरा।

मुगल शासन और ब्रितानी हुकूमत के बाद बने 47 के नये भारत को अलग-अलग तरीके से परिभाषित करने की कोशिशों और उनके बीच निहित विरोधाभास को भी उन्होंने बखूबी समझा। ना तो नेहरू का समाजवादी गणतंत्र, ना जेपी-लोहिया का समतामूलक समाज और ना ही नरसिम्हा राव-मनमोहन की उदारवादी नीतियां उस भारत को आवाज दे पा रही थीं जो अपनी पहचान की तलाश में 70 साल से भी ज्यादा का सफर तय कर चुका था।

धर्म के नाम पर खींची गई लकीर के घाव गहरे भी हो रहे थे और रिस-रिस कर जख्मों को हरा भी रख रहे थे। इन जख्मों पर लगाए गए नमक को साफ करने की प्रक्रिया भी उन्हें कुरेदने का ही काम कर रही थी। लोग इन्हें भरने के लिए मरहम की तलाश में थे। 

विपक्षी कुनबे में बिखराव और विकल्पहीनता का भी मोदी-शाह की जोड़ी ने पूरा फायदा उठाया। - फोटो : विवेक निगम
बिखरे विपक्ष का फायदा 
विपक्षी कुनबे में बिखराव और विकल्पहीनता का भी मोदी-शाह की जोड़ी ने पूरा फायदा उठाया। अगर मोदी नहीं तो फिर कौन? इस सवाल के जवाब में सामने दिखाई दे रहे सभी चेहरे अपने बायो-डेटा से देश को अपील नहीं कर पा रहे थे। जाति, वोट बैंक और प्रधानमंत्री की कुर्सी के लालच में उलझे विपक्ष को चित करने के सारे दांव मोदी-शाह के पास मौजूद थे। 

धर्म के नाम पर तगड़ा ध्रुवीकरण था भी और दिखाई भी दे रहा था। इसके लिए भाजपा को ज्यादा कुछ करना नहीं था। धर्म और जाति के संघर्ष में बंटे समाज के लिए एक ऐसा फेविकोल चाहिए था जो बिखराव के बिंदुओं को जोड़ते हुए पहचान के संकट को भी दूर कर सके। ये जोड़ने वाला घोल राष्ट्रवाद को बनाया गया। और जीत का ये आंकड़ा बता रहा है कि इस घोल ने अपना काम बहुत अच्छे से किया है।

इस घोल की कामयाबी की शर्त ही यही थी कि वो मंच के नारों तक सीमित ना रह कर दिलों पर लेप बनकर लग जाए। ऐसा कर सकने के लिए उसमें राजनीति और रणनीति के द्रव्य को बराबर मात्रा में मिलाना जरूरी था। नतीजे बता रहे हैं कि मिश्रण सही बना। इसी घोल से राजनीतिक क्रांति की नई इबारत लिखी गई। ऐसी क्रांति जो जीत की सुनामी बन कर विरोध की आवाजों को दबाते हुए वर्ग और वोट बैंक की दीवारों को भी तोड़ने में कामयाब हुई। 
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भारत की अधिसंख्य जनता ने अपने नायक को तमाम कमियों के साथ स्वीकार करना भी सीख लिया है। - फोटो : social Media
जनता ने नायक में कमियों को स्वीकार करना सीख लिया है? 
इन नतीजों ने ये भी साबित कर दिया कि भारत की अधिसंख्य जनता ने अपने नायक को तमाम कमियों के साथ स्वीकार करना भी सीख लिया है। नोटबंदी, जीएसटी, रोजगार जैसे मुद्दों, तथ्यों की प्रस्तुति में मानवीय भूलों को दरकिनार करते हुए उन्होंने पूरी ताकत से मोदी जी को दूसरी पारी का मौका दिया। किंतु-परंतु की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। पूर्ण बहुमत के अभाव के बहाने का भी कोई मौका नहीं दिया। एक और मुद्दा जिसमें भारत के मतदाता अधिक परिपक्व होते दिखे हैं वो है- स्थानीय, विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में अंतर कर पाना। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में भाजपा की हार के बाद भी लोकसभा में कोई संशय चयन को लेकर नहीं रहा। 

बहरहाल, नरेंद्र मोदी एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री बनेंगे, 2024 तक। ऐसे में 2014 की जीत के तुरंत बाद उनके द्वारा बड़ौदा में दिया गया भाषण याद करना चाहिए जब उन्होंने कहा था कि जीत के लिए आभारी हूं पर मुझे काम पूरे करने के लिए 10 साल का समय चाहिए, 2024 तक का समय चाहिए। तब शायद किसी ने इस पर गौर नहीं किया, पर उनकी निगाह अर्जुन की तरह ही लक्ष्य पर टिक गई थी। 

इस प्रचंड जीत की बधाई देने और भारत के लोकतंत्र के लिए शुभकामना व्यक्त करते समय ये भी व्यक्त करना महत्वपूर्ण है कि बेहतर लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना भी बहुत आवश्यक है। प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी अब पूरे पांच साल का समय है जब कि वो ना केवल अपने अधूरे कामों को पूरा करें, बल्कि राष्ट्रवाद के इस घोल को देश के विकास का ईंधन बना कर नए भारत के विकास को गति दें।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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