जानें-मानें मोटिवेशनल स्पीकर शिवखेड़ा ने ‘सूरत कांड’ के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है
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लोकतांत्रिक अधिकार और मूल्य
यहां बड़ा मुद्दा लोकतंत्र में मतदाता किसी को भी चुनने अथवा न चुनने के अधिकार का है। लोकतंत्र की विशेषता यही है कि इसमें मतदान के रूप में हर नागरिक की राजनीतिक सहभागिता होती है। यह एक बड़ा महत्वपूर्ण अधिकार है, जो हमे संविधान ने दिया है।
यह अधिकार इस सकारात्मक भाव से जन्मा है कि देश की सत्ता का निर्धारण सामान्य नागरिक भी बराबरी से करे। यानी यह अधिकार चुनने के लिए है, खारिज करने के लिए नहीं।
बावजूद इसके अगर कोई वोटर चुनाव मैदान में मौजूद सभी प्रत्याशियों को अयोग्य अथवा अप्रिय मानकर नकारना चाहे तो उसके पास दो ही विकल्प बचते हैं। एक तो वह वोट करने ही न जाए। या फिर जाए तो ईवीएम/ बैलेट पेपर में कोई ऐसा प्रावधान हो कि वह किसी को वोट नहीं देना चाहता।
अंग्रेजी के नोटा संक्षिप्त रूप का अर्थ ही है ‘ नन ऑफ द अबोव’ यानी उपरोक्त में कोई भी नहीं। इसकी शुरुआत 1976 में अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की सांता बारबरा काउंटी की म्यूनिसिपल इंफॉर्मेशन काउंसिल में लागू करने से हुई थी। बाद में भारत में पीयूसीएल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर यहां भी नोटा लागू करने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकारते हुए आदेश दिया। जिसके बाद चुनाव आयोग ने पहली बार 2013 के विधानसभा चुनावों में चार राज्यों, जिनमें मध्य प्रदेश भी शामिल था, उसे लागू किया। बाद में इसे सभी चुनावों की ईवीएम में शामिल किया गया।
अब विवाद इस बात को लेकर है कि क्या नोटा को भी प्रत्याशी माना जाना चाहिए है या नहीं। अभी तक चुनाव आयोग नोटा को काल्पनिक प्रत्याशी मानता आया है, इसलिए उसका प्रतीकात्मक महत्व ही है। नोटा में पड़े वोटों से नतीजों पर असर नहीं पड़ता।
इधर, बहुत से लोगों का मानना है कि नोटा का विचार ही मूलत: नकारात्मक अथवा किसी को चिढ़ाने की सोच से उपजा है, ठीक वैसे ही कि भारत में कुछ चुनावो मतदाता ने किसी स्थापित राजनेता अथवा नए चेहरे के बजाए किन्नर को चुना। लेकिन समाज का एक वर्ग नोटा को भी ‘राइट टू रिजेक्ट’ के तहत पूर्ण प्रत्याशी मनवाने का आग्रही है।
जानें-मानें मोटिवेशनल स्पीकर शिवखेड़ा ने ‘सूरत कांड’ के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है कि नोटा को भी वास्तविक प्रत्याशी माना जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट क्या निर्णय देता है, देखने की बात है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिकाकर्ता की बात मान ली तो सूरत जैसे मामलों में भी चुनाव प्रत्याशी और नोटा के बीच होगा, भले ही एक को छोड़ बाकी प्रत्याशी नाम वापस ले लें।
जहां तक मतदाताओं में नोटा की लोकप्रियता की बात है तो शुरू में इसके प्रति रूझान थोड़ा ज्यादा दिखाई पड़ा था। मध्यप्रदेश के 2018 के विधानसभा चुनाव में दो प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर 1 प्रतिशत से भी कम था। इससे ज्यादा वोट नोटा को मिले थे। अगर ये वोट किसी एक पार्टी के पक्ष में जाते तो उसे पूर्ण बहुमत मिल सकता था।
2014 के लोकसभा चुनाव में जब पहली बार नोटा का प्रावधान किया गया था, उस वक्त नोटा में कुल वोटों का 1.08 फीसदी वोट पड़े थे। लेकिन 2019 में पहले की तुलना में ज्यादा वोटिंग के बावजूद नोटा की हिस्सेदारी घटकर 1.06 फीसदी रह गई। इस लोस चुनाव में कितने लोग नोटा को पसंद करते हैं, यह देखने की बात है। अगर ये शेयर ज्यादा बढ़ा तो राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी होगा।
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