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Lok Sabha Election 2024 Result: NDA या INDIA? कौन बनाएगा सरकार? क्या लौट आया गठबंधन सरकारों का दौर?

सार

यदि किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो एकबार फिर जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू होगी। फिलहाल यही लग रहा है कि भाजपा के नेतृत्व में सरकार का गठन होगा, क्योंकि सबसे बड़ा दल वही है, लेकिन जनता दल (यू) की जो छवि रही है, वह इधर से उधर जाने की है, तेलुगू देशम पार्टी भी आंध्र प्रदेश में अच्छी सीटें लेकर आई है।

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कांग्रेस अपने दम पर 100 सीटें लाती दिख रही है। यूपी में समाजवादी पार्टी ने बड़ा उल्टफेर करते हुए 35 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाई है। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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एग्जिट पोल एकबार फिर गलत साबित हुए हैं और लोकसभा चुनाव में देश की तस्वीर करीब-करीब साफ नजर आने लगी है। किसी भी दल को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरती दिख रही है। अभी चल रहे ट्रेंड में भाजपा 240 से अधिक सीटें अकेले दम पर लेकर आ रही है। उसके नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बहुमत के साथ 290 से अधिक सीटों के साथ बहुमत हासिल करता दिख रहा है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन ने बेहद मजबूती से चुनाव लड़ा है।

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कांग्रेस अपने दम पर 100 सीटें लाती दिख रही है। यूपी में समाजवादी पार्टी ने बड़ा उल्टफेर करते हुए 35 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाई है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने एकतरफा जीत दर्ज की है।


आखिर कहां नुकसान हुआ भाजपा को? 

भारतीय जनता पार्टी को सबसे अधिक नुकसान उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल बंगाल जैसे राज्यों में हुआ है, जहां पार्टी को उम्मीद थी कि इस बार फिर वो करिश्माई प्रदर्शन दोहराएगी। पार्टी ने हरियाणा और कर्नाटक में भी अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। इन्हीं राज्यों के कारण भारतीय जनता पार्टी अपने अकेले के दम पर पूर्ण बहुमत लाने से चूकती नजर आ रही है।

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हालांकि, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, गुजरात, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, उत्तर पूर्व के राज्यों में पार्टी में अच्छा प्रदर्शन किया है। केरल में भी अपना खाता खोल लिया है, लेकिन तमिलनाडु में पार्टी को निराश होना पड़ा है, जहां लंबे समय से पार्टी अपने संसाधन झोंकती आ रही है।
 

दूसरी ओर, इंडी गठबंधन ने यूपी, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पंजाब जैसे राज्यों में बेहतरीन प्रदर्शन किया है, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। विशेष का उत्तर प्रदेश में यही माना जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी वर्ष 2019 के प्रदर्शन को दोहराएगी। 


पहले चरण के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास के नाम पर चुनाव लड़ा, लेकिन जैसे ही कम वोटिंग हुई तो दूसरे चरण से विकास का मुद्दा छोड़कर नरेंद्र मोदी हिंदुत्व, कांग्रेस की कमजोरी, इंडी गठबंधन, मुस्लिम तुष्टीकरण, संपत्ति के बंटवारे जैसे मुद्दे पर उतर आए। दूसरे से सातवें चरण तक आते-आते चुनाव बेहद आरोप-प्रत्यारोपों में बदलता दिखा।
 

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भाजपा से कहीं ना कहीं प्रत्याशियों के चयन में भी चूक हुई है। - फोटो : self
नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले 400 पार का नारा दिया था और अब लग रहा है कि यही नारा पार्टी के गले की फांस बना, क्योंकि भाजपा के कई नेताओं ने 400 पार के नारे को संविधान से जोड़ दिया और यहां तक कह दिया कि पार्टी संविधान बदलेगी। इसी मुद्दे को इंडी गठबंधन ने जोर-शोर से पूरे चुनाव में पकड़े रखा। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने जनता को यह विश्वास दिलाया कि अगर तीसरी बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो संविधान बदल देंगे, आरक्षण खत्म कर देंगे, तानाशाही आ जाएगी।

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नुकसान का बड़ा कारण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर विपक्ष का फैलाया भ्रम भी रहा, जिसमें विपक्ष बार-बार यह कह रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते हैं। शायद जनता को यह बात स्वीकार नहीं हुई।

यूपी में जिस तरीके से पिछले 7 सालों से योगी आदित्यनाथ कानून व्यवस्था के मुद्दे पर आगे बढ़ रहे हैं तो उनकी छवि एक राष्ट्रीय नेता की हो गई है। योगी आदित्यनाथ को महिलाओं का भरपूर समर्थन मिला है, लेकिन अब लोकसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि जनता में कहीं ना कहीं यह बात घर कर गई है कि योगी आदित्यनाथ को हटा सकते हैं।
 
भाजपा से कहीं ना कहीं प्रत्याशियों के चयन में भी चूक हुई है। खासकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पार्टी ने अपने पुराने चेहरों पर ही दांव लगाया। उत्तर प्रदेश में तो बाहर से आए नेताओं को भी टिकट दिए गए। फिर जिस तरह से कांग्रेस के नेताओं ने लाइन लगाकर भाजपा ज्वाइन की, उससे भी पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा फैली।

पहले चरण से ही दिख रहा था कि पार्टी कार्यकर्ता उस जोश से चुनाव में नहीं लगे हैं, जैसा 2014 और 2019 में देखने को मिला था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका में भी यही देखने को मिला, क्योंकि चुनाव में संघ भी उस तरीके से जमीन पर नजर नहीं आया, जैसा पिछले दो चुनाव में दिखा था।

कांग्रेस इस बार विपक्षी दलों को एकजुट रखने में कामयाब रही। ममता बनर्जी को छोड़ दें तो इंडी गठबंधन में अपने-अपने राज्यों में सहयोगी दलों को सीटें दीं। भले पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने थे, लेकिन कांग्रेस यहां शुरू से मजबूत नजर आई। राहुल गांधी के साथ उनकी बहन प्रियंका गांधी ने भी जोर-शोर से प्रचार किया।

इंडी गठबंधन के सभी सहयोगी दल, विशेष कर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव हिंदी पट्टी में पूरे जोश खरगोश के साथ चुनाव में जुटे और सबने मिलकर बड़ी रैलियां कीं।

यदि किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो एकबार फिर जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू होगी। फिलहाल यही लग रहा है कि भाजपा के नेतृत्व में सरकार का गठन होगा, क्योंकि सबसे बड़ा दल वही है, लेकिन जनता दल (यू) की जो छवि रही है, वह इधर से उधर जाने की है, तेलुगू देशम पार्टी भी आंध्र प्रदेश में अच्छी सीटें लेकर आई है। अभी से ऐसी खबरें आ रही हैं कि इंडी गठबंधन एनडीए के दलों पर डोरे डाल रहा है। अगले दो-तीन दिन बेहद उतार-चढ़ाव के रहने वाले हैं। अंतिम सवाल, क्या यह माना जाए कि दोबारा से गठबंधन की सरकारों का दौर शुरू हो गया है?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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