भाजपा से कहीं ना कहीं प्रत्याशियों के चयन में भी चूक हुई है।
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नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले 400 पार का नारा दिया था और अब लग रहा है कि यही नारा पार्टी के गले की फांस बना, क्योंकि भाजपा के कई नेताओं ने 400 पार के नारे को संविधान से जोड़ दिया और यहां तक कह दिया कि पार्टी संविधान बदलेगी। इसी मुद्दे को इंडी गठबंधन ने जोर-शोर से पूरे चुनाव में पकड़े रखा। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने जनता को यह विश्वास दिलाया कि अगर तीसरी बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो संविधान बदल देंगे, आरक्षण खत्म कर देंगे, तानाशाही आ जाएगी।
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नुकसान का बड़ा कारण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर विपक्ष का फैलाया भ्रम भी रहा, जिसमें विपक्ष बार-बार यह कह रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते हैं। शायद जनता को यह बात स्वीकार नहीं हुई।
यूपी में जिस तरीके से पिछले 7 सालों से योगी आदित्यनाथ कानून व्यवस्था के मुद्दे पर आगे बढ़ रहे हैं तो उनकी छवि एक राष्ट्रीय नेता की हो गई है। योगी आदित्यनाथ को महिलाओं का भरपूर समर्थन मिला है, लेकिन अब लोकसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि जनता में कहीं ना कहीं यह बात घर कर गई है कि योगी आदित्यनाथ को हटा सकते हैं।
भाजपा से कहीं ना कहीं प्रत्याशियों के चयन में भी चूक हुई है। खासकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पार्टी ने अपने पुराने चेहरों पर ही दांव लगाया। उत्तर प्रदेश में तो बाहर से आए नेताओं को भी टिकट दिए गए। फिर जिस तरह से कांग्रेस के नेताओं ने लाइन लगाकर भाजपा ज्वाइन की, उससे भी पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा फैली।
पहले चरण से ही दिख रहा था कि पार्टी कार्यकर्ता उस जोश से चुनाव में नहीं लगे हैं, जैसा 2014 और 2019 में देखने को मिला था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका में भी यही देखने को मिला, क्योंकि चुनाव में संघ भी उस तरीके से जमीन पर नजर नहीं आया, जैसा पिछले दो चुनाव में दिखा था।
कांग्रेस इस बार विपक्षी दलों को एकजुट रखने में कामयाब रही। ममता बनर्जी को छोड़ दें तो इंडी गठबंधन में अपने-अपने राज्यों में सहयोगी दलों को सीटें दीं। भले पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने थे, लेकिन कांग्रेस यहां शुरू से मजबूत नजर आई। राहुल गांधी के साथ उनकी बहन प्रियंका गांधी ने भी जोर-शोर से प्रचार किया।
इंडी गठबंधन के सभी सहयोगी दल, विशेष कर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव हिंदी पट्टी में पूरे जोश खरगोश के साथ चुनाव में जुटे और सबने मिलकर बड़ी रैलियां कीं।
यदि किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो एकबार फिर जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू होगी। फिलहाल यही लग रहा है कि भाजपा के नेतृत्व में सरकार का गठन होगा, क्योंकि सबसे बड़ा दल वही है, लेकिन जनता दल (यू) की जो छवि रही है, वह इधर से उधर जाने की है, तेलुगू देशम पार्टी भी आंध्र प्रदेश में अच्छी सीटें लेकर आई है। अभी से ऐसी खबरें आ रही हैं कि इंडी गठबंधन एनडीए के दलों पर डोरे डाल रहा है। अगले दो-तीन दिन बेहद उतार-चढ़ाव के रहने वाले हैं। अंतिम सवाल, क्या यह माना जाए कि दोबारा से गठबंधन की सरकारों का दौर शुरू हो गया है?
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