संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विपक्षी नेता
- फोटो : पीटीआई
इसी के चलते अपने-अपने इलेक्शन नरेटिव को स्थापित करने के लिए सोशल मीडिया पर काफी मेहनत और पैसा खर्च किया जा रहा है। एक ब्लॉगर ने तो यू-ट्यूब पर चौथे चरण के बाद प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ‘बीबीसी वर्ल्ड’ के कथित सर्वे के आधार पर इंडिया गठबंधन की जीत सुनिश्चित कर डाली। सर्वे के बैक ड्रॉप में बीबीसी वर्ल्ड का लोगो भी दिखाया जा रहा था। लेकिन जब बीबीसी ने अपनी अधिकृत वेबसाइट पर उसके द्वारा ऐसा कोई चुनावी सर्वे नहीं करने की बात स्पष्ट की तो ब्लॉगर ने अपने वीडियो से चुपके से बीबीसी वर्ल्ड का लोगो हटा दिया। लेकिन तब तक उसे डेढ़ लाख से ज्यादा व्यूज मिल चुके थे। यह डिजिटल दुस्साहस का एक उदाहरण है।
जीत के दावों में कितनी सच्चाई?
यहां सवाल यह कि इंडिया गठबंधन की जीत के दावों में सच्चाई कितनी है? अगर आंकड़ों के आधार पर बात करें तो यह कठिन जरूर है, मगर असंभव नहीं है। इंडिया गठबंधन में कुल 36 दल शामिल हैं और अगर टीएमसी को भी मिला लिया जाए तो यह संख्या 37 होती है। इनमें से कांग्रेस के अलावा 6 पार्टियां ऐसी हैं, जो चुनाव में 5 से लेकर 25 तक सीटें जीतने की स्थिति में हैं।
अगर कांग्रेस चुनाव में अपनी जीती हुई सीटों का आंकड़ा 125 तक ले जा सकी तो बाकी सहयोगियों की मदद से वह किसी तरह 272 तक पहुंच सकती है। लेकिन कांग्रेस के लिए वर्तमान में 52 सीटों का आंकड़ा 125 तक पहुंचाना एवरेस्ट सर करने जैसा है। ‘दो लड़कों’ की बातों में इतना जबर्दस्त करंट भी नहीं दिख रहा कि जो मोदी विरोधी करंट को डीसी से एसी करंट में तब्दील कर दे।
दूसरी तरफ भाजपा के एनडीए गठबंधन में संख्या के लिहाज से राजनीतिक दल ज्यादा यानी 41 हैं, लेकिन इनमें भाजपा के अलावा कोई पार्टी ऐसी नहीं है, जो अपने दम पर 20 से ज्यादा सीटें निकाल पाए। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि अव्वल तो भाजपा ने आंध्र प्रदेश को छोड़कर सभी जगह ज्यादातर सीटें अपने खाते में रखी हैं।
ऐसे में अगर भाजपा का इंजन अपने ही यार्ड में फेल हो गया तो एनडीए की गाड़ी मैजिक नंबर के आउटर पर जाकर अटक जाएगी। हालांकि ऐसा होने की संभावना कम है। इस चुनाव में कोई आंधी भले नजर न आए, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई, विकास, किसानों की नाराजगी, सड़क पानी बिजली, जातिवाद और आरक्षण आदि मुद्दे यथावत हैं।
मोदी और राम मंदिर फैक्टर
इन मुद्दों को मोदी और राम मंदिर फैक्टर किस स्तर तक काउंटर कर पाते हैं, उसी से काफी कुछ चुनाव नतीजे तय होंगे। अमूमन सामान्य मतदाता भी इतना तो समझता ही है कि ये लोकसभा चुनाव देश की सरकार के लिए हो रहे हैं, ऐसे में उसके निजी दुख दर्द के अनुपात में राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर वोट ज्यादा करने की संभावना है। ऐसा विवेक वोटर ने हर चुनाव में दिखाया भी है।
गठबंधन सरकारों के कामकाज, मजबूरियों, अंतर्विरोधों और उससे पैदा होने वाली राजनीतिक अराजकता को भी उसने देखा है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का थोड़ा बहुत अहसास उसे भी है। राष्ट्रहित का अंदाजा उसे भी है। लिहाजा वोटर जो भी जनादेश देगा, अपने विवेक से देगा। वह अनपढ़ हो सकता है, नासमझ नहीं है। हमें उस के विवेक पर भरोसा करना चाहिए। भरोसा करना चाहिए।
-------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।