इस देश में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते नेताओं का दल बदलना और युद्ध के दौरान ही घोड़ा बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन चलते चुनाव में एक पार्टी प्रवक्ता का अचानक घोर विरोधी पार्टी का दामन थाम कर उसका स्तुतिगान शुरू कर देना, जरा नया ट्रेंड है। ट्रेंड क्या बल्कि यूं कहें कि नैतिक पतन की पराकाष्ठा है। कुछ घंटों पहले तक आप जिस पार्टी को दुनिया की सबसे घटिया और अनैतिक पार्टी बताते रहे, दिल बदलते ही उसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ और नीतिवान पार्टी बताने सकने के लिए जिगर के साथ-साथ आत्मा को भी ट्रांसप्लांट करने की हिम्मत चाहिए।
हाल में कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता और अर्थशास्त्री गौरव वल्लभ ने जिस तरह अपनी पार्टी को बीच मझधार धता बताकर विपक्षी भाजपा के डेरे में प्रभु गुण गान शुरू किया, उससे कांग्रेस की लाचारी तो उजागर हुई ही, साथ में यह भी साबित हुआ कि दुनिया में हर पेशे की अपनी नैतिकता और लक्ष्मण रेखाएं होती है, सिवाय पार्टी के अधिकृत प्रवक्ता के।
दरअसल, पार्टी प्रवक्ता ऐसा पद है, जो किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने कार्यकर्ता को उसकी तर्क-वितर्क शक्ति, खंडन- मंडन करने की काबिलियत, भाषा पर अधिकार और बेशरमी की हद तक कुतर्क करने की क्षमता के आधार पर दिया जाता है। प्रवक्ता के निजी विचार जो भी हों, लेकिन उसे अपनी ही पार्टी और उसके नेताओं की हर मूर्खता को भी महिमा मंडित करने और विरोधी पार्टी की जायज बात को भी ‘राजनीति से प्रेरित’ बताकर खारिज करने की प्रतिभा किसी को पार्टी प्रवक्ता बना सकती हैं। हकीकत में वो एक कठपुतली होता है, जिसके ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ होने का मुगालता खुद उसे और जनता को होने लगता है।
वो सुबह जो बात कह रहे होते हैं, शाम तक उस पर यू टर्न लेने में संकोच नहीं करते। आम तौर पर पार्टी प्रवक्ता आदर्श चुनाव आचार संहिता से बंधे होते हैं, लेकिन उनकी स्वयं की कोई आचार संहिता अथवा नीति निष्ठा नहीं होती। अमूमन माना जाता है कि पार्टी प्रवक्ता सम्बन्धित पार्टी की विचारधारा, रणनीति, कार्यशैली और अनुशासन के मीडिया पैरोकार होते हैं। माना जाता है कि प्रवक्ता जो कहता है, वो किसी भी मुद्दे पर पार्टी की अधिकृत लाइन होती है, जो दल के शीर्ष नेतृत्व की सोच और रणनीतिक समझ से तय होती है। इस अर्थ में पार्टी प्रवक्ता राजनीतिक ध्वज वाहक होता है, लेकिन तभी तक जब तक कि वह फलां दल में है। पार्टी बदलते ही जबान फेरने में वह वक्त जाया नहीं करता।
इसका एक रोचक उदाहरण प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी का है। वो जब तक कांग्रेस की प्रवक्ता थीं, तब तक शिवसेना पर हमलावर थी। लेकिन जैसे उनके गृह राज्य महाराष्ट्र में शिवसेना गठबंधन के साथ सत्ता में आई, वो रातो रात शिवसेना (उद्धव) की खैरख्वाह बन गईं। मध्यप्रदेश में भी पूर्व में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक प्रवक्ता महाराज के पाला बदलते ही कांग्रेसियों के जानी दुश्मन बन गए।
वैसे भी इन दिनों भाजपा में आने वालो की संख्या, भाजपा छोड़कर जाने वालों की संख्या की तुलना में बहुत कम है, क्योंकि सत्ता का फेविकोल यहां ज्यादा मजबूत है। इस मायने में प्रवक्ताओं का शब्दकोश सामान्य शब्द कोशों से अलग अर्थ रखता है। प्रवक्ताओं के शब्दकोश में राजनीतिक मौका परस्ती को आस्था परिवर्तन कहा जाता है।
मुखौटे बदलने में ये किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए आइकन हो सकते हैं। दरअसल सत्ताकांक्षा से उपजी बेचैनी उन्हें दलबदल और नए घर की पहरेदारी पर विवश करती है। राजनीतिक निर्गुणिया से सियासी सगुणिया होने का यह अद्भुत चमत्कार है। यानी जिस पार्टी में वो बरसो भजन करते रहे, वह अचानक उन्हें नास्तिक लगने लगती है।
तो क्या पार्टी प्रवक्ता होने की कोई मर्यादा या मापदंड नहीं हैं? देश के जाने माने प्रबंधन विशेषज्ञ हेमंत गवले ने किसी राजनीतिक पार्टी प्रवक्ता के कुछ मापदंड तय किए हैं। पहला है, पार्टी का मानवीकरण करने की योग्यता खासकर अति संवेदनशील मानवीय मुद्दों पर, दूसरा विरोधी को जिम्मेदार ठहराना, तीसरा, पार्टी के रुख को सही ठहराना, चौथा, हर मुद्दे पर पार्टी का संदेश प्रत्येक मीडिया प्लेटफार्म से लोगों तक पहुंचाना (यह तकनीकी काम ज्यादा है)।
इसी तरह अगर पाटी प्रवक्ता की योग्यता का पैमाने देखे जाए तो उसे स्ट्रीट स्मार्ट’ यानी अपनी पार्टी और सरकार का बचाव करने में सक्षम होना चाहिए, दूसरा हवा को अपने पक्ष में पलटना, मोटी चमड़ी का होना, ज्ञानी और विश्वसनीय होना तथा हाजिर जवाब और मोहक होना। कई पाटी प्रवक्ता इन तमाम मानकों पर खरा भी उतरते हैं। लेकिन ज्यादातर का आचरण इन मानकों से परे होता है। अलबत्ता पार्टी प्रवक्ता होना या बनना भी एक ‘प्रोफेशन’ बन चुका है। किसी भी पार्टी का श्रेष्ठ प्रार्टी प्रवक्ता कौन, इसको लेकर एक मीडिया प्लेटफार्म e4m ने पिछले दिनो विभिन्न राजनीतिक दलों के 50 श्रेष्ठ राष्ट्रीय प्रवक्ताओं की सूची जारी की थी।