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चुनाव के बीच इन मुद्दों को भूल गए राजनीतिक दल, बिना तैयारी के प्रचार में उतरे नेता?

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क्या बुनियादी मुद्दों को उठाना भूल गए हैं राजनीतिक दल? - फोटो : social Media
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भारत जैसे जनतांत्रिक देश में इस समय एक पर्व मनाया जा रहा है जिसे आम चुनाव कहते हैं। इस पर्व का उत्साह तो राजनैतिक लोगों और जनता दोनों में है। किन्तु इस बार यह आम चुनाव कुछ खास है, क्योंकि यहां एक तरफ तो सत्ता पक्ष की हाहाकार है तो दूसरी तरफ विपक्ष की भूमिका नगण्य है। असल मायनों में इस बार चुनाव में देश हितार्थ मुद्दों की प्रांसगिकता खो गई है।

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सच भी यही है कि कोई सेना, मंदिर, हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद पर चुनाव लड़ रहा है तो कोई राफेल, चौकीदार चौर और हिन्दू होने के प्रमाण तक ही सीमित हो गया है। आखिर इन सबके बावजूद भारतीय और राष्ट्र का सर्वांगणीय विकास, प्रगति, व्यापार, बढ़ती बेरोजगारी, आंतरिक सुरक्षा, देश का अर्थशास्त्र और विकसित राष्ट्र की तरफ बढ़ते क़दमों का थम जाना को दिखाई नहीं दे रहा।

सत्ता पक्ष के पास चेहरा है जिसे भुनाया भी गया और इस बार भी वही चेहरा जनता के बीच ले जाया गया, किन्तु इस मामले में विपक्ष थोड़ा कमजोर सिद्ध हो गया, उनके पास जो चेहरा है वही जनता की नापसन्दगी का कारण है। परन्तु क्या वर्तमान में राजनीति का मकसद केवल सत्ता हथियाना ही शेष रह गया है?

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जमीनी मुद्रद - फोटो : PTI
राम मंदिर, धारा 370 चौकीदार चोर, राफेल घोटाला या साध्वी का बयान, स्त्री के अंतःवस्त्र का रंग ऐसे ही मुद्दों के बीच देश की असल समस्या और मुद्दे गौण हो चुके है। जनता के बीच मत मांगने जाने वाले प्रत्याशी भी इस बात का सही जवाब नहीं दे पा रहे है कि वो किन मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे है या जीत गए तो क्या करेंगे देश के लिए।

हर पांच वर्षों में एक बार आए इस लोकतंत्र के महापर्व में जनता सहभागिता को जताना चाहती है, किन्तु वही जनता चुनाव के बाद ठगी हुई सी रह जाती है और मलाल के सिवा जनता के हाथ कुछ नहीं बचता। लोकतंत्रीय गरिमा में सवाल पूछने का अधिकार जनता के पास भी होता है, लेकिन इस बार इसमें भी वह चूक गई, क्योंकि जवाब मौन है। राजनीति का सूर्य अस्तांचल की तरफ बढ़ने लगा है क्योंकि जनता की उपेक्षा और प्रगति का आधार खोखला होता जा रहा है।

किन मुद्दों पर क्या है चुनाव प्रचार का हाल? 
अमेरिकी चुनाव का आंकलन करें तो पाएंगे कि वह राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों से चुनाव लड़ने के समय ही जनता पूछती है कि क्यों चुने आपको ? आपके पास देश की उन्नति के लिए क्या योजना है? कैसे आप वर्तमान समस्याओं पर काबू करेंगे ? कैसे आप राष्ट्र का सम्पूर्ण विकास करेंगे? आपकी रक्षानीति क्या है? विदेश नीति और अर्थनीति का आधार क्या है? आर्थिक सशक्तिकरण के लिए क्या ब्लूप्रिंट है?

इन सवालों के जवाब के बाद ही जनता तय करती है कि कौन राष्ट्रपति बनेगा अमेरिका का। इसके उलट हमारे देश में मुफ्तखोरी की योजनाएं, 72000 वार्षिक घर बैठे जैसे वादों और 15 लाख जैसे जुमलों में ही चुनाव परिणाम आ जाता है। थोड़ा आगे बड़े तो अगड़ी-पिछड़ी जाति, कुल-कुनबे में ही मतदान हो जाता है। आखिर किस दिशा में जा रहा है हमारा राष्ट्र?
 
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क्या चुनाव प्रचार का तरीका भी भूल गए हैं नेता? - फोटो : अमर उजाला
इन सब के पीछे शिक्षा का गिरता स्तर भी उतना ही उत्तरदायी है जितना की राष्ट्र का माहौल। इस बार चुनावों में जनता भी नीरसता का अनुभव कर रही है क्योंकि राष्ट्र मुद्दा विहीन चुनाव झेल रहा है।

आमचुनाव में किसी भी राजनैतिक दल के पास कोई ब्लूप्रिंट नज़र नहीं आ रहा जो देश की प्रगति का मापक तय कर सके। किसी के पास कोई विदेशनीति, वित्तनीति, रक्षानीति जैसे गंभीर चयन का कोई आधार नहीं है। न तो सत्ताधारी दल इस पर कुछ बोल रहा है न ही विपक्ष की तरफ से कोई पहल। क्या ऐसे ही देश क्षणे-क्षणे अवनति के मार्ग को चुनेगा? स्तरहीन बयानबाजी, कमर के नीचे की राजनीति और परियोजना रहित घोषणा-पत्र वर्तमान में राजनीति का चेहरा बन चुका है। इसी तरह देश चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत वैश्विक पटल पर हासिल अपने सम्मान को खो देगा।

(लेखक डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु 
हस्ताक्षर बदलो अभियान,भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं) 

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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