राम मंदिर, धारा 370 चौकीदार चोर, राफेल घोटाला या साध्वी का बयान, स्त्री के अंतःवस्त्र का रंग ऐसे ही मुद्दों के बीच देश की असल समस्या और मुद्दे गौण हो चुके है। जनता के बीच मत मांगने जाने वाले प्रत्याशी भी इस बात का सही जवाब नहीं दे पा रहे है कि वो किन मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे है या जीत गए तो क्या करेंगे देश के लिए।
हर पांच वर्षों में एक बार आए इस लोकतंत्र के महापर्व में जनता सहभागिता को जताना चाहती है, किन्तु वही जनता चुनाव के बाद ठगी हुई सी रह जाती है और मलाल के सिवा जनता के हाथ कुछ नहीं बचता। लोकतंत्रीय गरिमा में सवाल पूछने का अधिकार जनता के पास भी होता है, लेकिन इस बार इसमें भी वह चूक गई, क्योंकि जवाब मौन है। राजनीति का सूर्य अस्तांचल की तरफ बढ़ने लगा है क्योंकि जनता की उपेक्षा और प्रगति का आधार खोखला होता जा रहा है।
किन मुद्दों पर क्या है चुनाव प्रचार का हाल?
अमेरिकी चुनाव का आंकलन करें तो पाएंगे कि वह राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों से चुनाव लड़ने के समय ही जनता पूछती है कि क्यों चुने आपको ? आपके पास देश की उन्नति के लिए क्या योजना है? कैसे आप वर्तमान समस्याओं पर काबू करेंगे ? कैसे आप राष्ट्र का सम्पूर्ण विकास करेंगे? आपकी रक्षानीति क्या है? विदेश नीति और अर्थनीति का आधार क्या है? आर्थिक सशक्तिकरण के लिए क्या ब्लूप्रिंट है?
इन सवालों के जवाब के बाद ही जनता तय करती है कि कौन राष्ट्रपति बनेगा अमेरिका का। इसके उलट हमारे देश में मुफ्तखोरी की योजनाएं, 72000 वार्षिक घर बैठे जैसे वादों और 15 लाख जैसे जुमलों में ही चुनाव परिणाम आ जाता है। थोड़ा आगे बड़े तो अगड़ी-पिछड़ी जाति, कुल-कुनबे में ही मतदान हो जाता है। आखिर किस दिशा में जा रहा है हमारा राष्ट्र?
क्या चुनाव प्रचार का तरीका भी भूल गए हैं नेता?
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इन सब के पीछे शिक्षा का गिरता स्तर भी उतना ही उत्तरदायी है जितना की राष्ट्र का माहौल। इस बार चुनावों में जनता भी नीरसता का अनुभव कर रही है क्योंकि राष्ट्र मुद्दा विहीन चुनाव झेल रहा है।
आमचुनाव में किसी भी राजनैतिक दल के पास कोई ब्लूप्रिंट नज़र नहीं आ रहा जो देश की प्रगति का मापक तय कर सके। किसी के पास कोई विदेशनीति, वित्तनीति, रक्षानीति जैसे गंभीर चयन का कोई आधार नहीं है। न तो सत्ताधारी दल इस पर कुछ बोल रहा है न ही विपक्ष की तरफ से कोई पहल। क्या ऐसे ही देश क्षणे-क्षणे अवनति के मार्ग को चुनेगा? स्तरहीन बयानबाजी, कमर के नीचे की राजनीति और परियोजना रहित घोषणा-पत्र वर्तमान में राजनीति का चेहरा बन चुका है। इसी तरह देश चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत वैश्विक पटल पर हासिल अपने सम्मान को खो देगा।
(लेखक डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु
हस्ताक्षर बदलो अभियान,भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं)
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