क्या साध्वी को संगठन और पार्टी से सहयोग नहीं मिल रहा?
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इधर भाजपा के चुनाव अभियान कार्यालय पर भी कोई खास गहमा-गहमी का माहौल नहीं दिखता। हां, साध्वी के इस चुनाव अभियान में अनिल सौमित्र जैसे कुछ जमीनी कार्यकर्ता रात-दिन एक जरूर किए हुए हैं, लेकिन अधिकतर नेता भोपाल और आसपास की भयंकर गर्मी एवं धूल भरे वातावरण में अपने आप को बचाते हुए दिखे।
भाजपा कार्यालय के एक नेता नाम ना छापने की शर्त पर कहते हैं- ''हम केवल सुबह और शाम को संपर्क में निकल पाते हैं। गर्मी के कारण परेशानी हो रही है।'' जाहिर है कार्यकर्ताओं की इन बातों से यह साबित हो रहा है कि जिस करो और मरो के नारे के साथ साध्वी को भोपाल से भाजपा ने अपना चेहरा बनाया है उसकी स्थिति स्थानीय अंतरविराधों के कारण कमजोर दिख रही है।
शिवराज सिंह चौहान और साध्वी प्रज्ञा सिंह
दूसरी बात यह है कि पहले तो यह प्रचारित किया गया कि साध्वी को टिकट देने का प्रस्ताव पूरे संघ परिवार में व्यापक मंथन के बाद दिया गया, लेकिन असली बात यह है कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ही साध्वी प्रज्ञा के नाम पर मुहर लगवाने में अहम भूमिका निभाई है। खास बात यह है कि भोपाल से साध्वी को लड़ाने की जैसी योजना बनी है वैसा स्थानीय स्तर पर कुछ भी नहीं दिखता है।
संघ के एक और वरिष्ठ प्रचारक नाम ना छापने की शर्त पर सवाल उठाते हुए कहते हैं- ''साध्वी के मामले में एक खास और अच्छी बात यह है कि वो हिन्दुत्व का चेहरा बनाकर उभरी हैं और संघ के उद्देश्यों को मजबूत करती हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब संघ परिवार ने मंथन कर साध्वी को खड़ा करवाया है तो फिर क्यों नहीं चुनाव प्रचार व प्रबंधन की जिम्मेदारी भी ली? दूसरी बात यदि ज़िम्मेदारी ले रखी है तो अनुषांगिक क्षेत्र के कार्यकर्ता कहां लगे हुए हैं? वे यदि क्षेत्र में लगे हैं तो उसका प्रबंधन कौन देख रहा है?''
इधर साध्वी के यहां रिवेरा टाउनशिप वाले आवास और अस्थायी कार्यालय में संघ व भाजपा के बहुत कम कार्यकर्ता दिखाई देते हैं। वहां ज्यादातर बाहर से आए संत और साध्वी के अपने जानने वाले लोगों की भीड़ दिखती है जो स्थानीय स्तर पर किसी भी ढंग से प्रभावी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं है।
हालांकि भाजपा की ओर से व्यवस्थाएं जबरदस्त हैं। चाय, नाश्ता, भोजन, आगंतुक प्रचारकों के लिए आवास, उनके लिए गाड़ी की व्यवस्था की गई है, लेकिन साध्वी के पास व्यक्तिगत रूप से पैसे का भी अभाव दिखता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि साध्वी अभी भी नेता किसी भी एंगल से नहीं दिख रही हैं। बेधड़क कोई-सा भी बयान दे बैठती हैं।
भोपाल के लोग दिग्विजय का साथ देंगे या साध्वी का?
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क्या भोपाल के लोग साध्वी को वोट देंगे?
पिछले दिनों शहीद हेमंत करकरे का बयान साध्वी के लिए मंहगा साबित हुआ और भोपाल का मराठी समाज नाराज हो गया। स्थानीय वोटर राघवेन्द्र बताते हैं- ''भोपाल बेहद शांत शहर है। देशभर में हिन्दू-मुस्लिम दंगों के वक्त भी यह शहर अमूमन शांत रहा। यहां किसी प्रकार का कोई लफड़ा नहीं होता है। यह दिल्ली या उत्तर प्रदेश, बिहार वाला शहर नहीं है।''
वे कहते हैं- लोग शांतिप्रिय हैं। यहां लाखों की संख्या में आईटी एक्सपर्ट, इंजीनियर, डॉक्टर, सरकारी पदाधिकारी-कर्मचारी निवास करते हैं। उन्हें विकास का एक मॉडल चाहिए। साध्वी हिन्दुत्व और अपनी पीड़ा का बयान तो सतत कर रही हैं पर उन्हें साथ ही विकास की बात भी करनी चाहिए। उनका आव्हान अपील कर सकता है, पर समग्र रूप में नहीं। यही नहीं भाजपा के अंदर से अंतरघात और भीरघात का भी यहां खतरा उत्पन्न हो सकता है।
क्या चल रहा है साध्वी को लेकर स्थानीय स्तर पर?
स्थानीय स्तर पर चर्चा तो यह भी है कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहले साध्वी को आगे कर साध्वी उभा भारती को कमजोर किया और अब उनकी टीम निष्क्रिय सी हो गई है। समय जगत हिन्दी दैनिक के संपादक अशोक त्रिपाठी कहते हैं- ''साध्वी स्थानीय राजनीति का शिकार हो रही हैं। यदि सचमुच यह चुनाव जीतना है तो पूरे संघ परिवार को एकत्रित होकर चुनाव लड़ना पड़ेगा नहीं तो दिग्विजय सिंह इस सीट पर लगभग 2 लाख वोट से जीत जाएंगे।''
त्रिपाठी कहते हैं- जिस प्रकार वामधारा की राजनीति करने वालों के लिए कन्हैया का जीतना बेहद जरूरी है उसी प्रकार दक्षिणपंथ की राजनीति करने वालों के लिए साध्वी का जीतना बेहद जरूरी है। यदि किसी कारण से साध्वी हार गई तो दुनिया भर में यही संदेश जाएगा कि आरएसएस की राजनीति को जनता ने नकार दिया और वहां से सॉफ्ट हिन्दू की राजनीति करने वाले दिग्विजय को लोगों ने स्वीकार कर लिया। मतलब साफ है कि यदि साध्वी हारी तो संघ परिवार जिस हिन्दुवाद की बात करता है वह भोपाल में हार जाएगा और कांग्रेस पार्टी जिस हिन्दुवाद की बात करती है वह वहां से जीत जाएगा। मसलन भोपाल से साध्वी की हार पूरे संघ की हार होगी।
साध्वी प्रज्ञा की हार के अहम और बड़े संकेत आरएसएस के लिए होंगे?
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भोपाल लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभा का क्षेत्र पड़ते हैं। इसमें से बैरसिया, कोलार, नरेला और गोविन्दपुर विधानसभा पर भाजपा का कब्जा है, जबकि भोपाल मध्य, भोपाल दक्षिण पश्चिम, भोपाल उत्तर और सिरोर पर कांग्रेस का कब्जा है। यानी आधे-आधे पर दोनों पर्टियां हैं। इसके अलावा जब वोटों की बात करते हैं तो क्षेत्र में लगभग 4 लाख वोटर मुसलमान हैं। इसके अलावा 2 लाख वोटर ठाकुर यानी राजपूत हैं।
ब्राह्मण वोटरों की संख्या भी अच्छी खासी है। वैसे तो महाराष्ट्र के लोग भाजपा के ज्यादा निकट हैं, लेकिन दिग्विजय भी अपने संपर्क रखते हैं। साथ ही दिग्विजय के बहुत से मौन प्रशंसक भाजपा में भी हैं। दिग्विजय ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में भाजपा के कई नेताओं को उपकृत भी किया है। वो दिग्विजय के पक्ष में खुलकर नहीं आएंगे पर साध्वी को लेकर उनकी निष्क्रियता भी भाजपा को भारी पड़ जाएगी। ऐसे में साध्वी के लिए जीत की राह आसान नहीं होगी।
कुल मिलाकर भोपाल में एक साथ बहुत कुछ दांव पर है। चुनाव के चाणक्य माने जाने वाले दिग्विजय अगर यहां से हारते हैं तो ना केवल कांग्रेस के भीतर उनकी साख कमजोर होगी, उनका पूरा राजनीतिक करियर भी दांव पर होगा। कांग्रेस के भीतर ही उनके जो विरोधी हैं वो उन्हें राघौगढ़ के किले से बाहर निकालने में सफल हो गए हैं। इसी चुनाव से तय होगा कि वो सचमुच कितने जमीनी नेता हैं।
दूसरी ओर साध्वी प्रज्ञा तो इस चुनाव में भाजपा, हिन्दुत्व और संघ का चेहरा हैं। वर्तमान में दिखाई दे रही भीतरी खींचतान अगर समय रहते ठीक नहीं हुई तो निश्चित ही ये ना केवल संघ-भाजपा परिवार बल्कि समूची दक्षिणपंथी राजनीति के लिए बड़ा झटका होगा।
जाहिर है 23 मई 2019 को तमाम नतीजों के साथ भोपाल की इस सीट पर देश ही नहीं, दुनिया की निगाहें लगी होंगी।
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