यूपी की राजनीति में कांग्रेस पिछले दो दशकों से निचले पायदान पर खड़ी है।
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कांग्रेस का बिगड़ेगा खेल, पिछड़ रही है पार्टी
यूपी की राजनीति में कांग्रेस पिछले दो दशकों से निचले पायदान पर खड़ी है। बावजूद इसके यूपी की कई लोकसभा सीटों पर उसकी मजबूत पकड़ और जनाधार को नकारा नहीं जा सकता है। दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले दम पर 71 सीटों के साथ 42.63 फीसदी वोट शेयर हासिल किया था। समाजवादी पार्टी को कुल 22.35 फीसदी वोटों के साथ पांच सीटें मिली थी।
बहुजन समाज पार्टी को 19.7 फीसदी वोट तो मिले, लेकिन उसका खाता नहीं खुल पाया। इसके उलट कांग्रेस महज 7.53 फीसदी वोट हासिल कर दो सीटें अमेठी व रायबरेली जीतने में कामयाब रही थीं। कांग्रेस का पश्चिम उत्तर प्रदेश की सहारनपुर, गाजियाबाद और मुरादाबाद की लोकसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। ऐसे में एक बड़े वोटर समूह में अपनी पैठ बनाने वाली कांग्रेस अगर सपा-बसपा के बिना चुनाव मैदान में उतरेगी तो इसका सीधा लाभ बीजेपी को होना तय है।
2009 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए अकेले दम पर 21 सीटें हासिल की थीं।
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कांग्रेस के लिए आगे होंगी मुश्किलें?
2014 में कांग्रेस ने यूपी में लोकसभा की दो सीटें जीती थीं। 2009 के लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए अकेले दम पर 21 सीटें हासिल की थीं। यहां सपा ने 23 और बसपा ने 20 सीटें हासिल की थीं, जबकि बीजेपी को 10 सीटें मिली थीं। वोटिंग प्रतिशत पर गौर करें तो मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस ने यूपी की करीब दो दर्जन सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था। दो सीटें जीतने के अलावा कुल छह सीटों पर कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी। यहां कांग्रेस प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे।
माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस आगामी वक्त में महागठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ती है तो गठबंधन के वोटबैंक पर इसका बड़ा असर पड़ेगा। वहीं मायावती और अखिलेश के महागठबंधन से बाहर होने की स्थिति में पश्चिम यूपी की सहारनपुर, मेरठ, मुरादाबाद और गाजियाबाद जैसी सीटों पर इकट्ठा हो रहे वोटर बंटेंगे जिससे बीजेपी को फायदा होगा।
वास्तव में कांग्रेस में गठबंधन को लेकर प्रारम्भ से ही दो अलग राय थीं। एक राय यह है कि अकेले चुनाव लड़कर सभी सीटों पर पार्टी को मजबूती दी जाए। विधानसभा चुनाव में सपा से गठबंधन करने से सपा सरकार के खिलाफ चल रही लहर का नुकसान कांग्रेस को भी उठाना पड़ा। पड़ोसी तीन राज्यों में अकेले चुनाव लड़कर सरकार बनने के बाद यूपी में भी पार्टी नेता इसको लेकर मुखर हो गए थे।
सपा-बसपा के गठबंधन की घोषणा के बाद अब यह साफ हो गया है कि कांग्रेस अपने दम पर यूपी में मैदान में उतरेगी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूपी में कांग्रेस का जनधार लगातार गिरता जा रहा हैं। पार्टी के पास यूपी में मौजूद सात विधायकों में से दो पश्चिम उत्तर प्रदेश से हैं, लेकिन इन सब के बीच करीब तीन दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस संगठन की दृष्टि से काफी कमजोर दिखने लगी है। कांग्रेस के कई नेताओं व सियासी जानकारों का कहना है कि अगर पार्टी पश्चिम यूपी में एसपी और बीएसपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है तो उसके लिए अपना सियासी वजूद बचाना आसान होगा। वहीं अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में कांग्रेस को नुकसान जरूर होगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक, पिछले दिनों हुए फूलपुर, गोरखपुर, कैराना और नूरपुर के उपचुनाव ये साफ दिखाते हैं कि गठबंधन करके उत्तर प्रदेश में बीजेपी को आसानी से पटखनी दी जा सकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सभी दलों को एक साथ आना, खासकर कांग्रेस का। लेकिन जानकारों के मुताबिक, मौजूदा परिस्थिति में सपा-बसपा के गठबंधन से विपक्षी मतों का बिखराव होगा और बीजेपी को इसका सीधा फायदा होगा। सपा-बसपा ने कांग्रेस से किनारा करके राजनीतिक समझ-बूझ का परिचय दिया है या बड़ी गलती की है, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलवक्त, सपा-बसपा, कांग्रेस और भाजपा सब अपनी-अपनी राजनीति और रणनीति कामयाब होते देख रहे हैं।
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